डोनाल्ड ट्रंप ने 3 नवंबर से पहले ईरान पर बड़े हमलों पर एक तरह का ब्रेक लगा दिया है. अमेरिका में मिडटर्म चुनावों को देखते हुए वो कोई बड़ा जोखिम मोल लेना नहीं चाहते. चुनाव के बाद ही अमेरिका-ईरान जंग पर कोई बड़ा फैसला लिया जाएगा है. अमेरिका-ईरान चाहे जो राजनीतिक समीकरण बिठा लें, इस खेल में दुनिया की तेल सप्लाई बुरी तरह अटकी है क्योंकि होर्मुज का ब्लॉकेड अभी भी जस का तस बना हुआ है. इन हालातों के बीच, भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने ईरानी सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सेक्रेटरी मोहसिन रजाई से सीधे फोन पर बात की है. दो दिग्गजों के बीच ये इमरजेंसी कॉल कई मायनों में अहम है.
डोभाल और रजाई की सीक्रेट बातचीत: क्या है माजरा?
ईरानी दूतावास की ओर से जारी एक आधिकारिक बयान में इस बात की पुष्टि की गई है कि भारत के NSA अजीत डोभाल और ईरान के टॉप सिक्योरिटी टीफ मोहसिन रजाई के बीच फोन पर लंबी और गंभीर चर्चा हुई है.
हालांकि, कूटनीतिक मर्यादाओं के चलते दोनों देशों ने बातचीत के सटीक डीटेल्स को सीक्रेट रखा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये कोई सामान्य या औपचारिक बातचीत नहीं थी. ईरानी दूतावास के बयान के मुताबिक, दोनों सुरक्षा प्रमुखों ने क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के साथ-साथ भारत और ईरान के आपसी हितों के कई अहम मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान किया. ये फोन कॉल ऐसे समय में आया है जब लाल सागर से लेकर फारस की खाड़ी तक बारूद फैल चुका है.
‘होर्मुज जलडमरूमध्य’: असली विवाद की जड़
इस पूरे तनाव के केंद्र में एक छोटा सा समुद्री रास्ता ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ है. होर्मुज में आए दिन जहाजों पर अटैक की खबरें आ रही हैं. जिसमें आर्थिक नुकसान के साथ-साथ कई भारतीयों की जानें भी गई हैं.
खाड़ी देशों में रह रहे 80 लाख से ज्यादा भारतीयों की सुरक्षा पर भी बड़ा खतरा मंडराने लगा है. कमर्शियल जहाजों के लिए सुरक्षित रास्ता न मिलने पर मालभाड़ा और मरीन इंश्योरेंस में भारी बढ़ोतरी हो रही है, जिससे ग्लोबल ट्रेड की कमर टूट रही है.
इन सबके बीच ईरान-अमेरिका के बीच अब शर्तों की लड़ाई शुरू हो गई है. ईरान का कहना है कि जब तक वाशिंगटन (अमेरिका) उसकी शर्तों को नहीं मानता, तब तक इस समुद्री रास्ते को पूरी तरह सुरक्षित नहीं होने दिया जाएगा. ईरान के प्रस्ताव पर अमेरिका का रुख अभी भी कड़ा बना हुआ है, जिसके कारण दोनों पक्षों के बीच बात बनने की गुंजाइश फिलहाल बहुत कम दिख रही है.
भारत के लिए ये जंग क्यों है बड़ी चिंता का विषय?
पश्चिम एशिया में भड़के बवाल की उसकी आंच सीधे भारत के रसोईघर और अर्थव्यवस्था तक पहुंचती है. अजीत डोभाल का अचानक फोन उठाना इस बात का सबूत है कि भारत सरकार इस स्थिति को हल्के में नहीं ले रही है. इसके पीछे तीन बड़े रणनीतिक और आर्थिक कारण हैं.
- तेल और गैस की सप्लाई पर खतरा: भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी मात्रा में खाड़ी देशों पर निर्भर है. अगर होर्मुज के रास्ते में रुकावट आती है, तो भारत में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दाम रातों-रात आसमान छूने लगेंगे, जिससे देश में महंगाई का बड़ा विस्फोट हो सकता है.
- लाखों भारतीयों की सुरक्षा का सवाल: पश्चिम एशिया के अलग-अलग देशों में करीब 80 लाख से ज्यादा भारतीय नागरिक काम करते हैं. वो न केवल वहां रहकर आजीविका कमाते हैं, बल्कि भारत में अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार भी भेजते हैं. युद्ध की स्थिति में इन नागरिकों की सुरक्षा भारत की पहली प्राथमिकता बन जाती है.
- समुद्री व्यापार और शिपिंग की लागत: अगर व्यापारिक जहाजों को सुरक्षित रास्ता नहीं मिलता, तो उन्हें अफ्रीका का चक्कर लगाकर लंबा रास्ता तय करना पड़ेगा. इससे मालभाड़े में भारी बढ़ोतरी होगी, जिससे भारत का आयात-निर्यात बुरी तरह प्रभावित होगा.
अजीत डोभाल और मोहसिन रजाई की फोन पर क्या हुई बात?
पीएम मोदी की ‘बैलेंसिंग कूटनीति’ का हिस्सा है ये बातचीत
अजीत डोभाल का ये कदम कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है, बल्कि ये भारत की सोची-समझी विदेश नीति का हिस्सा है. हाल ही में ब्रिक्स सम्मेलन के इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से मुलाकात की थी.
पीएम मोदी ने कहा था कि भारत हमेशा संवाद, कूटनीति और नेविगेशन की आजादी का पक्षधर है. भारत का रुख बहुत साफ है. वो न तो किसी युद्ध का समर्थन करता है और न ही अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं से समझौता कर सकता है.
डोभाल ने ईरान को सीधे फोन करके ये मैसेज दिया है कि भारत क्षेत्र में शांति चाहता है और किसी भी बड़े आर्थिक या रणनीतिक संकट को टालने के लिए हर संभव कूटनीतिक रास्ते का इस्तेमाल करने को तैयार है.
ईरान-अमेरिका के माइंडगेम में भारत की भूमिका
ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच छिड़े इस माइंड गेम में भारत एक रेयर भूमिका में है. भारत के संबंध इजरायल और अमेरिका से भी उतने ही मजबूत हैं, जितने कि ईरान के साथ.
ऐसे में अजीत डोभाल की ये कूटनीतिक पहल सिर्फ एक बातचीत नहीं है, बल्कि भारत के हितों की रक्षा करने की एक ‘मास्टर चाल’ है. माना जा रहा है कि डोभाल की ये बैक-चैनल कूटनीति पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को कम करने में कोई न कोई सकारात्मक भूमिका निभाएगी.