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Burhanpur 400 year old Balaji Maharaj temple: बुरहानपुर में स्थित 400 साल पुराने भगवान बालाजी महाराज मंदिर में एक ही परिवार की 13 पीढ़ियों से सेवा और पूजा-अर्चना की परंपरा निभाई जा रही है. यह प्राचीन मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सेवा, समर्पण और पारिवारिक परंपरा का भी प्रतीक है.
बुरहानपुर. मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में भगवान बालाजी महाराज का एक प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है. इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां एक ही परिवार की 13 पीढ़ियों से भगवान की सेवा और पूजा-अर्चना की परंपरा निभाई जा रही है. करीब 400 साल पुराने इस मंदिर से जुड़ी मान्यताएं और परंपराएं आज भी लोगों को आकर्षित करती हैं.
लोकल 18 की टीम को मंदिर समिति के चंद्रकांत बालाजी वाले मोहन बालाजी वाले ने जानकारी देते हुए बताया कि मंदिर से जुड़ी मान्यता के अनुसार, परिवार की एक पीढ़ी के प्रमुख बुजुर्ग ने संतान प्राप्ति के लिए भगवान बालाजी महाराज से मन्नत मांगी थी. मन्नत पूरी होने के बाद उन्होंने तिरुपति बालाजी से भगवान की प्रतिमा पैदल लाकर बुरहानपुर में स्थापित की थी. इसके बाद से परिवार की पीढ़ी-दर-पीढ़ी भगवान की सेवा करने की परंपरा चली आ रही है. आज भी परिवार की युवा पीढ़ी इस प्राचीन परंपरा और मंदिर की विरासत को संजोकर रखे हुए है.
रथ खींचने की है परंपरा
इस मंदिर की एक और खास पहचान यहां आयोजित होने वाला वार्षिक उत्सव है. हर साल भगवान बालाजी महाराज के उत्सव के दौरान भव्य आयोजन और मेले का आयोजन किया जाता है. जिसमें भक्त भगवान बालाजी महाराज का रथ खींचते हैं. और बालाजी महाराज को नगर भ्रमण पर लेकर जाते हैं भगवान बालाजी महाराज भक्तों को दर्शन देते हैं. उत्सव की सबसे बड़ी विशेषता भगवान का नगर भ्रमण है. इस दौरान भगवान बालाजी महाराज रथ पर सवार होकर भक्तों को दर्शन देने के लिए नगर भ्रमण पर निकलते हैं. जगह-जगह श्रद्धालु भगवान का स्वागत करते हैं और पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद लेते हैं. इस बार भी मंदिर में 15 दिवसीय भगवान बालाजी महाराज उत्सव की शुरुआत हो गई है इसे लेकर श्रद्धालुओं में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है.
बुरहानपुर का यह प्राचीन मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सेवा, समर्पण और पारिवारिक परंपरा का भी प्रतीक है. यही वजह है कि भगवान बालाजी महाराज के दर्शन के लिए स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ दूर-दराज से भी भक्त पहुंचते हैं.