बागेश्वरः उत्तराखंड की लोककला ऐपण आज अपनी पारंपरिक पहचान के साथ आधुनिक दौर में भी लोगों को आकर्षित कर रही है. घरों की देहरी से लेकर पूजा स्थलों और त्योहारों तक अपनी खास पहचान रखने वाली इस कला को आगे बढ़ाने में बागेश्वर की कंचन उपाध्याय जुटी हुई हैं. मंडलसेरा निवासी कंचन पिछले 10 सालों से ऐपण बनाने का काम कर रही हैं. अब वह अपने अनुभव और हुनर को दूसरी महिलाओं के साथ साझा कर रही हैं. वह महिलाओं को निशुल्क ऐपण कला का प्रशिक्षण दे रही हैं, ताकि पारंपरिक कला को संरक्षित करने के साथ ही महिलाएं इसे आजीविका का साधन भी बना सकें.
पूर्वजों से सीखी है ये परंपरा
कंचन उपाध्याय का कहना है कि ऐपण उत्तराखंड की प्रमुख लोककलाओं में से एक है. यह केवल सजावट का माध्यम नहीं, बल्कि प्रदेश की सांस्कृतिक परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं से भी जुड़ी हुई है. पुराने समय में घरों के आंगन, पूजा स्थल और देहरी पर ऐपण बनाने की परंपरा रही है. अलग-अलग शुभ अवसरों पर विशेष आकृतियां बनाई जाती थीं. समय के साथ इस कला के स्वरूप और इस्तेमाल में बदलाव आया है, लेकिन इसके प्रति लोगों का आकर्षण आज भी बना हुआ है.
कंचन बताती हैं कि उन्होंने यह कला अपने पूर्वजों से सीखी है. उनका मानना है कि यदि पारंपरिक कलाओं को अगली पीढ़ी तक नहीं पहुंचाया गया, तो धीरे-धीरे इनसे जुड़ी जानकारी और तकनीक कम होती जा सकती है. इसी सोच के साथ उन्होंने महिलाओं को ऐपण सिखाने की पहल की है. वह चाहती हैं कि अधिक से अधिक महिलाएं इस कला को सीखें और अपनी संस्कृति से जुड़ी रहें.
घर बैठे महिलाएं सीखें हुनर, स्वरोजगार के खुलें रास्ते
कंचन उपाध्याय की इस पहल का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करना भी है. कई महिलाएं घर और परिवार की जिम्मेदारियों के कारण बाहर जाकर काम नहीं कर पाती हैं. ऐसे में ऐपण जैसी कला सीखकर वे अपनी सुविधा के अनुसार काम करने की दिशा में आगे बढ़ सकती हैं. ऐपण का इस्तेमाल पारंपरिक पूजा सामग्री और सजावटी वस्तुओं के अलावा नामपट्ट, थालियों, लकड़ी के सामान और अन्य हस्तनिर्मित उत्पादों पर भी किया जा सकता है. आधुनिक समय में पारंपरिक कला से तैयार वस्तुएं उपहार और घर की सजावट के लिए भी पसंद की जाती हैं. ऐसे में प्रशिक्षण प्राप्त करने वाली महिलाएं अपनी रुचि और कौशल के अनुसार छोटे स्तर पर काम शुरू करने की संभावनाएं तलाश सकती हैं. हालांकि, इससे नियमित आमदनी के लिए उत्पादों की गुणवत्ता, बाजार तक पहुंच और ग्राहकों की मांग को समझना भी जरूरी है.
लोककला के संरक्षण के साथ महिलाओं को आगे बढ़ाने का प्रयास
कंचन उपाध्याय की पहल स्थानीय संस्कृति और महिला सशक्तीकरण को जोड़ने का प्रयास है. निशुल्क प्रशिक्षण के माध्यम से उनका उद्देश्य है कि आर्थिक कारणों से कोई महिला इस पारंपरिक कला को सीखने से वंचित न रहे. उनके अनुभव का लाभ उठाकर महिलाएं ऐपण की बारीकियां सीख सकती हैं, और अपनी रचनात्मकता को नया रूप दे सकती हैं.
उत्तराखंड की लोककलाओं को जीवित रखने के लिए जरूरी है कि इन्हें केवल त्योहारों और विशेष अवसरों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि नई पीढ़ी के बीच भी लोकप्रिय बनाया जाए. बागेश्वर की कंचन उपाध्याय इसी दिशा में प्रयास कर रही हैं. उनका यह कदम बताता है कि यदि पारंपरिक हुनर को सीखने-सिखाने की पहल की जाए, तो संस्कृति के संरक्षण के साथ महिलाओं के लिए रोजगार की नई संभावनाएं भी तैयार हो सकती हैं.