फोन की आखिरी घंटी: पिता ने पूछा, कितने लोग सिर्फ तुम्हारी आवाज सुनने के लिए फोन करते हैं?

फोन की आखिरी घंटी: पिता ने पूछा, कितने लोग सिर्फ तुम्हारी आवाज सुनने के लिए फोन करते हैं?


Phone Ki Aakhri Ghanti: दिनभर की भागदौड़ के बाद रात होती है खुद के लिए कुछ पल निकालने की. इसी वक्त हम आपके लिए लेकर आ रहे हैं एक नई कहानी, जो हमारी-आपकी जिंदगी, रिश्तों और आज के बदलते माहौल से जुड़ी होगी. हर रात एक नई कहानी, एक नया अनुभव और एक छोटी-सी बात, जो सोने से पहले आपको सोचने पर मजबूर कर सकती है. पढ़िए हमारी खास सीरीज ‘सोने से पहले’.

आज की पहली कहानी: फोन की आखिरी घंटी

रात के साढ़े दस बज चुके थे. घर में सब अपने-अपने कमरों में थे. कोई मोबाइल पर रील देख रहा था, कोई ऑफिस के मैसेज का जवाब दे रहा था और कोई अगले दिन की चिंता में उलझा था.

घर के सबसे बुजुर्ग सदस्य, 72 साल के श्यामलाल जी, बरामदे में बैठे बार-बार अपना पुराना फोन देख रहे थे. उनके बेटे ने कमरे से आवाज लगाई, “पापा, अब सो जाइए. किसका इंतजार कर रहे हैं?”

श्यामलाल जी ने मुस्कुराकर कहा, “कुछ नहीं बेटा, बस ऐसे ही.”

बेटे को लगा कि पापा को फिर कोई पुरानी बात याद आ गई होगी. वह अपने फोन में व्यस्त हो गया. कुछ देर बाद श्यामलाल जी उठे और बेटे के कमरे में पहुंचे.

“बेटा, एक बात पूछूं?”
“हां पापा, बोलिए. बस दो मिनट, यह मैसेज भेज दूं.”

श्यामलाल जी वहीं कुर्सी पर बैठ गए. दो मिनट पांच मिनट में बदले, फिर दस मिनट हो गए. आखिरकार बेटे ने फोन नीचे रखा.

“हां पापा, बताइए.”

श्यामलाल जी ने पूछा, “तुम्हारे पास दिन भर में कितने फोन आते हैं?”

बेटा हंसकर बोला, “बहुत सारे. ऑफिस के, दोस्तों के, काम के. क्यों?”

“और उनमें से कितने लोग सिर्फ तुम्हारी आवाज सुनने के लिए फोन करते हैं?”

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बेटा कुछ पल चुप रहा.
श्यामलाल जी ने आगे कहा, “आज तुम्हारी मां की बरसी थी. सुबह से रिश्तेदारों के फोन आए, पुराने दोस्तों के मैसेज आए. लेकिन मुझे पूरे दिन एक फोन का इंतजार था.”

बेटे ने पूछा, “किसका?”
श्यामलाल जी ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, “तुम्हारा. यह पूछने के लिए कि पापा, आज आप कैसे हैं?” कमरे में खामोशी छा गई.

बेटे को याद आया कि सुबह उसने पिता के पैर छुए थे, मां की तस्वीर पर फूल चढ़ाए थे और फिर ऑफिस की मीटिंग में चला गया था. उसने हर जरूरी काम किया था, बस उस एक इंसान से बात करना भूल गया था जिसके लिए वह आज भी बच्चा था.

उसने पिता का हाथ पकड़ लिया. “पापा, माफ कर दीजिए. कल से मैं रोज आपके साथ बैठूंगा.”

श्यामलाल जी मुस्कुराए. “कल से क्यों बेटा? आज तो अभी बाकी है.” बेटे ने फोन उठाकर साइलेंट मोड पर रखा और पिता के पास बैठ गया. उस रात पहली बार उसे लगा कि कुछ मिनट किसी के साथ बिताना भी उतना ही जरूरी है जितना किसी को जवाब देने के लिए टाइप किए गए सौ शब्द.

सोने से पहले श्यामलाल जी ने अपना फोन बंद किया. आज उन्हें किसी और की घंटी का इंतजार नहीं था.

कहानी की छोटी-सी बात: हम अक्सर उन लोगों को समय देना भूल जाते हैं जो हमारी जिंदगी में हमेशा मौजूद रहते हैं. लेकिन किसी का हमेशा साथ होना और उसका अकेलापन महसूस न करना, दोनों अलग बातें हैं. कभी-कभी किसी अपने का दिन अच्छा बनाने के लिए बड़े तोहफे की नहीं, बस एक सच्चे सवाल की जरूरत होती है – आप कैसे हैं?



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