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आज के दौर में जब कई पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं, तब सीवान का यह परिवार एक अलग मिसाल पेश कर रहा है. 100 वर्षों से अधिक समय से मां काली की प्रतिमा बनाने की परंपरा आज भी कायम है. दादा से पिता और पिता से बेटे-नाती तक पहुंची यह विरासत परिवार की मेहनत, आस्था और समर्पण की कहानी कहती है. वहीं, मोहल्ले के लोगों का सहयोग इस परंपरा को और मजबूत बनाता है. हर साल मां काली की प्रतिमा तैयार होती है, श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है और पूरा इलाका भक्तिमय हो जाता है.
मां काली के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है पूजा
सीवान: बिहार के सीवान में दुर्गा पूजा की रौनक देखते ही बनती है. शहर के अलग-अलग पंडालों में मां दुर्गा के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है. लेकिन यहां की महाकाली गली की बात ही कुछ और है. यहां मां काली की भव्य प्रतिमा स्थापित की जाती है. खास बात यह है कि इस प्रतिमा को बनाने की जिम्मेदारी पिछले 100 वर्षों से भी अधिक समय से एक ही परिवार निभा रहा है. दादा और पिता के बाद अब परिवार की नई पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है.
अब बेटे और नाती संभाल रहे जिम्मेदारी
महाकाली गली में मां काली की प्रतिमा बनाना इस परिवार के लिए सिर्फ एक काम नहीं है. यह उनकी आस्था और विरासत का हिस्सा है. परिवार के बुजुर्गों ने जिस परंपरा की शुरुआत की थी, उसे आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जा रहा है. पहले परिवार के दादा प्रतिमा बनाते थे. इसके बाद उनके पिता ने यह जिम्मेदारी संभाली. अब परिवार के बेटे और नाती भी प्रतिमा बनाने में हाथ बंटाते हैं. इस तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक यह परंपरा पहुंच रही है. मूर्ति बनाने वाले प्रीतम बताते हैं कि उनके परिवार में लंबे समय से मां काली की प्रतिमा बनाई जा रही है. परिवार के सदस्य घर पर ही प्रतिमा तैयार करते हैं. इसमें सभी लोग मिलकर काम करते हैं. मां की प्रतिमा को तैयार करने में करीब डेढ़ से दो महीने का समय लगता है.
रक्षाबंधन के बाद शुरू हो जाता है काम
मां काली की प्रतिमा तैयार करने का काम काफी पहले शुरू हो जाता है. परिवार के सदस्य बताते हैं कि रक्षाबंधन के दिन सिंहासन की पूजा की जाती है. इसके बाद प्रतिमा बनाने का काम शुरू हो जाता है. मूर्ति को तैयार करने में काफी मेहनत लगती है. परिवार के सदस्य लगातार जुटे रहते हैं. धीरे-धीरे मां काली की प्रतिमा आकार लेने लगती है. पूजा का समय नजदीक आने पर प्रतिमा को अंतिम रूप दिया जाता है. इस काम में परिवार के युवा भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं. उनके लिए यह सिर्फ धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों की विरासत को बचाए रखने का अवसर भी है.
मोहल्ले के लोग मिलकर उठाते हैं खर्च
मां काली की प्रतिमा स्थापित करने और पूजा आयोजित करने में काफी खर्च होता है. इसके लिए परिवार के सदस्य और मोहल्ले के लोग मिलकर सहयोग करते हैं. चंदे से मिलने वाली राशि का इस्तेमाल प्रतिमा, सजावट, पूजा, विसर्जन और अन्य आयोजनों में किया जाता है. स्थानीय युवाओं की भी इसमें अहम भूमिका रहती है. वे आयोजन की तैयारियों से लेकर भीड़ संभालने तक की जिम्मेदारी निभाते हैं. सभी के सहयोग से हर साल पूजा धूमधाम से आयोजित की जाती है.
मां काली के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है पूजा
सीवान की महाकाली गली में स्थापित मां काली की प्रतिमा श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था रखती है. यहां केवल स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि दूर-दराज के इलाकों से भी भक्त दर्शन करने पहुंचते हैं. स्थानीय लोगों का मानना है कि जिस तरह माता वैष्णो देवी के दर्शन के बाद भैरव बाबा के दर्शन को महत्वपूर्ण माना जाता है, उसी तरह सीवान में दुर्गा पूजा के दौरान मां काली के दर्शन करना भी जरूरी माना जाता है. कई श्रद्धालु शहर के अलग-अलग पंडालों में घूमने के बाद महाकाली गली जरूर पहुंचते हैं. उनके लिए मां काली के दर्शन के बिना दुर्गा पूजा अधूरी रहती है.
संकरी गली में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
महाकाली गली काफी संकरी है. इसके बावजूद पूजा के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. भीड़ को संभालना समिति और स्थानीय लोगों के लिए बड़ी चुनौती होती है. इस परेशानी को कम करने के लिए आने और जाने के रास्तों की अलग-अलग व्यवस्था की जाती है. श्रद्धालुओं को एक तरफ से प्रवेश कराया जाता है और दूसरी तरफ से बाहर निकाला जाता है. इससे भीड़ को नियंत्रित करने में मदद मिलती है.