Yemen VS Saudi Turkey: यमन में घुसी तो गाजर-मूली की तरह कटेगी तुर्की की फौज? सऊदी में सेना भेजने से पहले एर्दोगन पढ़ ले इतिहास- Ottomean Empire News

Yemen VS Saudi Turkey: यमन में घुसी तो गाजर-मूली की तरह कटेगी तुर्की की फौज? सऊदी में सेना भेजने से पहले एर्दोगन पढ़ ले इतिहास- Ottomean Empire News


सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता करने के बावजूद तुर्की यमन में हूतियों से लड़ने के लिए अपनी सेना भेजने को तैयार नहीं है. 8 अक्टूबर को तुर्की के विदेश मंत्री हकान फिदान ने साफ कहा कि मक्का रक्षा समझौते का मतलब यह नहीं है कि तुर्की किसी देश पर हमला करने में शामिल होगा. लेकिन सवाल है कि जब सऊदी अरब को मदद की जरूरत है और हूती लगातार हमले कर रहे हैं, तो तुर्की अपने सैनिकों को सीधे लड़ाई में क्यों नहीं उतारना चाहता? इसकी एक वजह युद्ध का खतरा है, तो दूसरी यमन का इतिहास भी है. यहां कभी ऑटोमन साम्राज्य (तुर्की) की सेना को लंबे समय तक विद्रोहियों ने गाजर मूली की तरह काटा था. लाखों सैनिकों की कब्र यमन में ही बन गई. अब सवाल है कि क्या तुर्की आज भी यमन में लंबे युद्ध के जोखिम से बचना चाहता है?

मक्का पैक्ट क्या है और तुर्की के सामने मुश्किल क्या है?

7 अगस्त 2026 को तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच मक्का रक्षा समझौता हुआ था. इसका मकसद तीनों देशों की सुरक्षा में एक-दूसरे की मदद करना है. हूतियों के ताजा हमलों के बाद 5 अक्टूबर को तीनों देशों के प्रतिनिधियों की रियाद में इमरजेंसी मीटिंग की थी. इस बीच सऊदी अरब के समर्थन वाली यमन की सरकारी सेना ने ‘ऑपरेशन यमन डॉन’ शुरू किया. उसका कहना है कि वह मोखा, धुबाब और बाब अल-मंदेब के ऊंचाई वाले इलाकों पर फिर से कब्जा करने की कोशिश कर रही है. उसके मुताबिक, हूतियों ने पिछले महीने इन इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत की थी. ऐसे में उम्मीद थी कि तुर्की भी सऊदी अरब के साथ मिलकर हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई कर सकता है. लेकिन विदेश मंत्री हकान फिदान ने पहले ही साफ किया कि समझौता दूसरे देशों पर हमला करने के लिए नहीं, बल्कि सदस्य देशों की रक्षा के लिए है.

यानी अगर सऊदी अरब पर मिसाइल या ड्रोन हमला होता है, तो तुर्की उसकी सुरक्षा में मदद कर सकता है. लेकिन पाकिस्तान, अमेरिका और तुर्की मिलकर सऊदी की रक्षा भी नहीं कर सके. हूतियों ने रविवार को सऊदी के किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हमला किया, जिसमें 12 लोगों की मौत हो गई. वहीं तुर्की के लिए अपनी सेना को यमन भेजकर हूतियों से सीधे लड़ना अलग बात है. एक और बात समझना जरूरी है. इस समझौते को तुर्की की संसद से मंजूरी मिलना बाकी है. इतिहास को देखते हुए शायद ही तुर्की की संसद सेना को हूतियों के गढ़ नें भेजने को तैयार हो.

हूती कौन हैं, जिनसे लड़ने में बड़े-बड़े देश उलझ गए?

यमन की लड़ाई को समझने के लिए हूतियों को समझना जरूरी है. उनका आधिकारिक नाम ‘अंसार अल्लाह’ है. हूती नाम उनके संस्थापक परिवार अल-हूती से आया है. वे जायदी शिया समुदाय से जुड़े हैं. जायदी समुदाय की धार्मिक मान्यताएं ईरान के ज्यादातर शियाओं से अलग हैं.

हूतियों का सबसे मजबूत गढ़ उत्तरी यमन का सादा प्रांत है. इस इलाके में सदियों तक जायदी धार्मिक नेताओं का प्रभाव रहा. 1990 के दशक में हुसैन अल-हूती ने ‘बिलीविंग यूथ’ नाम से एक आंदोलन शुरू किया. उनका आरोप था कि तत्कालीन राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह की सरकार भ्रष्ट है और सऊदी अरब और अमेरिका के प्रभाव में काम करती है.

2004 में सरकारी सेना ने हुसैन अल-हूती को मार दिया. इसके बाद हूतियों और सरकार के बीच लड़ाई तेज हो गई. 2004 से 2010 के बीच दोनों पक्षों में छह बार संघर्ष हुआ. इन लड़ाइयों में सऊदी अरब भी शामिल हुआ. 2011 में अरब देशों में सरकारों के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हुए, जिन्हें अरब स्प्रिंग कहा जाता है. इसका असर यमन पर भी पड़ा. राष्ट्रपति सालेह की सत्ता कमजोर हुई और उनके हटने के बाद देश राजनीतिक संकट में फंस गया. इसका फायदा उठाकर हूतियों ने अपनी ताकत बढ़ाई और सितंबर 2014 में राजधानी सना पर कब्जा कर लिया. मार्च 2015 में सऊदी अरब की अगुवाई वाला गठबंधन उन्हें पीछे धकेलने के लिए यमन में उतरा. लेकिन सालों की लड़ाई और हवाई हमलों के बावजूद हूती सना और उत्तरी यमन के बड़े हिस्से पर अपना नियंत्रण बनाए रखने में कामयाब रहे. हूतियों को ईरान का समर्थन मिलता है, हालांकि ईरान सीधे सैन्य मदद देने के आरोपों से इनकार करता रहा है. तुर्की की ओर से सेना न भेजने के पीछे उसे इतिहास में मिला दर्द भी है.

ऑटोमन साम्राज्य यमन क्यों पहुंचा था?

अब करीब 500 साल पीछे चलते हैं. उस समय तुर्की आज की तरह एक गणराज्य नहीं था, बल्कि ऑटोमन साम्राज्य का केंद्र था. यह साम्राज्य यूरोप, एशिया और अफ्रीका के बड़े इलाकों तक फैला था. मक्का और मदीना जैसे इस्लाम के पवित्र शहर भी उसके कंट्रोल में थे. 1517 में मिस्र पर कब्जे के बाद ऑटोमन साम्राज्य का प्रभाव लाल सागर और अरब प्रायद्वीप तक बढ़ गया. उसी समय पुर्तगाल के जहाज हिंद महासागर और लाल सागर के समुद्री रास्तों पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे थे.

ऑटोमन साम्राज्य मिस्र पर कब्जे के बाद. (AI जेनेरेटेड इमेज)

ये रास्ते व्यापार के साथ-साथ हज पर जाने वाले यात्रियों के लिए भी जरूरी थे. अगर कोई विरोधी ताकत लाल सागर और अरब प्रायद्वीप के दक्षिणी हिस्से पर कब्जा कर लेती, तो ऑटोमन साम्राज्य के व्यापार और धार्मिक हितों को नुकसान हो सकता था. इसी वजह से ऑटोमन सेना ने यमन में अपनी मौजूदगी बढ़ाई. 1538 में उसने अदन पर कब्जा किया. बाद के वर्षों में तिहामा के तटीय इलाकों और सना जैसे शहरों में भी उसका प्रभाव बढ़ा.

स्वेज नहर न बनने से पहले का व्यापारिक रास्ता. (AI जेनेरेटेड इमेज)

यमन का मोका बंदरगाह कॉफी के कारोबार के लिए भी मशहूर हुआ. लेकिन यहां एक बड़ी परेशानी थी. बंदरगाहों और शहरों पर कब्जा करना आसान था, मगर पहाड़ों और दूर-दराज के गांवों पर लंबे समय तक नियंत्रण बनाए रखना मुश्किल था. ऑटोमन सेना किसी इलाके पर कब्जा तो कर लेती थी, लेकिन वहां के सभी कबीलों और स्थानीय नेताओं को अपने शासन के अधीन रखना आसान नहीं था.

AI जेनेरेटेड इमेज.

1872 में सना पर फिर कब्जा

1839 में अंग्रेजों ने एडन पर कब्जा कर लिया. इसके बाद 1869 में स्वेज नहर खुलने से यूरोप और एशिया के बीच समुद्री रास्ता और महत्वपूर्ण हो गया. लाल सागर अब दुनिया के बड़े व्यापारिक रास्तों में शामिल हो गया था. ऑटोमन साम्राज्य को डर था कि अगर ब्रिटेन या इटली ने अरब तट पर अपना प्रभाव बढ़ाया, तो उसके हितों को नुकसान पहुंचेगा. इसी वजह से 1872 में ऑटोमन सेना ने सना पर दोबारा कब्जा किया और यमन में अपना प्रशासन मजबूत करने की कोशिश की.

लेकिन जमीन पर हालात मुश्किल थे. जायदी धार्मिक नेता और स्थानीय कबीले बाहरी शासन को आसानी से स्वीकार नहीं कर रहे थे. कई इलाकों में विद्रोह हुए. सेना को बार-बार और भी ज्यादा सैनिक भेजने पड़े. एक जगह हालात संभलते, तो दूसरी जगह फिर लड़ाई शुरू हो जाती. 1904-05 में इमाम याह्या के नेतृत्व में बड़ा विद्रोह हुआ. अप्रैल 1905 में जायदी विद्रोहियों ने सना को घेर लिया और ऑटोमन सेना पर दबाव बढ़ा दिया.

कुछ ऐतिहासिक विवरणों में इस संघर्ष के दौरान ऑटोमन सेना को 25,000 से ज्यादा हताहत होने का जिक्र है. लेकिन हताहतों में मारे गए सैनिकों के साथ घायल और लापता लोग भी शामिल हो सकते हैं. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि 25,000 सैनिक मारे गए थे. आखिरकार 1911 की दान्न संधि के तहत ऑटोमन साम्राज्य को जायदी इलाके में इमाम याह्या को काफी हद तक अपने तरीके से शासन करने की छूट देनी पड़ी. वर्ल्ड वार 1 में ऑटोमन साम्राज्य की हार के बाद 1918 में उसकी सेना यमन से चली गई.

इसके बाद इमाम याह्या ने वहां अपनी राजशाही स्थापित की. यानी 100 साल पहले ही तुर्की की सेना आखिरी बार वहां मौजूद थी. इतिहास से एक बात साफ होती है. किसी इलाके पर कब्जा करना और वहां लंबे समय तक शांति बनाए रखना दो अलग चीजें हैं. यमन में ऑटोमन सेना को बार-बार इसी मुश्किल का सामना करना पड़ा.

यमन में ऑटोमन सैनिकों को इतनी परेशानी क्यों हुई?

इतने बड़े साम्राज्य की सेना को यमन में बार-बार मुश्किलों का सामना क्यों करना पड़ा? इसकी कई वजहें थीं.

पहली वजह: पहाड़ और संकरे रास्ते. उत्तरी यमन ऊंचे पहाड़ों, गहरी घाटियों और दुर्गम बस्तियों से भरा है. बड़ी सेना और भारी हथियारों के साथ यहां तेजी से आगे बढ़ना मुश्किल था. स्थानीय लड़ाके इलाके को अच्छी तरह जानते थे. वे अचानक हमला करके पहाड़ों में छिप सकते थे और सेना के रास्ते रोक सकते थे.

दूसरी वजह: गर्मी और बीमारियां. यमन के तटीय इलाकों में गर्मी और उमस बहुत ज्यादा होती है. मलेरिया, पेचिश, टाइफाइड और हैजा जैसी बीमारियां भी सैनिकों के लिए खतरा थीं. साफ पानी, दवाइयों और इलाज की कमी से मुश्किलें और बढ़ जाती थीं. यानी सैनिक सिर्फ लड़ाई में ही नहीं, बीमारी के कारण भी जान गंवाते थे.

यमन में फंस जाती हैं सेनाएं. (AI जेनेरेटेड इमेज)

तीसरी वजह: स्थानीय कबीलों का विरोध. हाशिद और बक़ील जैसे बड़े कबायली समूह अपने इलाकों में बाहरी ताकत का दखल पसंद नहीं करते थे. इन समूहों के बीच अपने हितों के हिसाब से गठबंधन बदलते रहते थे. एक समूह से समझौता होने का मतलब यह नहीं था कि बाकी भी उस शासन को मान लेंगे.

चौथी वजह: धार्मिक और राजनीतिक विरोध. उत्तरी यमन में जायदी इमामों का धार्मिक और राजनीतिक प्रभाव था. स्थानीय लोगों का एक हिस्सा उन्हें अपना धार्मिक नेता भी मानता था. इसलिए ऑटोमन शासन के खिलाफ लड़ाई सिर्फ सत्ता के लिए नहीं, बल्कि बाहरी शासन का विरोध करने का तरीका भी थी.

AI जेनेरेटेड इमेज.

पांचवीं वजह: सामान पहुंचाने में मुश्किल. इस्तांबुल से हजारों किलोमीटर दूर तैनात सैनिकों तक भोजन, हथियार, दवाइयां और दूसरे जरूरी सामान पहुंचाना आसान नहीं था. समुद्र से तट तक पहुंचने के बाद भी सामान को पहाड़ी इलाकों में ले जाना पड़ता था. लंबा और मुश्किल रास्ता सेना को कमजोर बना देता था.

इन्हीं कारणों से ऑटोमन सेना कई बार विद्रोह दबाने में कामयाब होने के बावजूद पूरे यमन में स्थायी शांति कायम नहीं कर पाई.

ऑटोमन के बाद मिस्र और सऊदी भी यमन में उलझे

यमन में मुश्किलों का सामना सिर्फ ऑटोमन साम्राज्य ने नहीं किया. बाद में मिस्र और सऊदी अरब जैसी ताकतों को भी यहां लंबे संघर्ष में उलझना पड़ा. 1962 में उत्तरी यमन में राजशाही के खिलाफ क्रांति हुई और गृहयुद्ध शुरू हो गया. मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने गणतंत्र का समर्थन करने वाले पक्ष की मदद के लिए सैनिक भेजे. मिस्र के पास आधुनिक हथियार और हवाई ताकत थी, लेकिन उसकी सेना भी यमन के पहाड़ी इलाकों में उलझ गई. युद्ध लंबा खिंचा और मिस्र पर भारी सैन्य तथा आर्थिक बोझ पड़ा. इस ऑपरेशन को कई बार ‘मिस्र का वियतनाम’ कहा जाता है. 1967 के युद्ध के बाद मिस्र ने यमन से अपने सैनिक वापस बुला लिए.

मिस्र भी यमन में फंसा. (AI जेनेरेटेड इमेज)

इसके बाद 2015 में सऊदी अरब की अगुवाई वाला गठबंधन हूतियों के खिलाफ युद्ध में उतरा. सऊदी अरब के पास आधुनिक लड़ाकू विमान, मिसाइलें और बड़े सैन्य संसाधन थे. इसके बावजूद हूतियों को उत्तरी यमन से पूरी तरह हटाया नहीं जा सका. इसका मतलब यह नहीं है कि यमन में बाहरी सेना हमेशा हारती है या हूतियों को हराया नहीं जा सकता. असली समस्या यह है कि शुरुआती बढ़त हासिल करने के बाद भी इलाके पर लंबे समय तक नियंत्रण बनाए रखना बेहद मुश्किल साबित हुआ है. इसी अनुभव के कारण यमन को कभी-कभी ‘साम्राज्यों का कब्रिस्तान’ कहा जाता है.

आज के हूती पुराने जायदी विद्रोहियों से कितने अलग हैं?

यह समझना जरूरी है कि आज के हूती और सदियों पहले ऑटोमन सेना से लड़ने वाले जायदी विद्रोही एक ही संगठन नहीं हैं. लेकिन जिस इलाके में आज हूतियों की मजबूत पकड़ है, वहां की भौगोलिक और ऐतिहासिक चुनौतियां काफी पुरानी हैं. पहाड़, संकरे रास्ते और दूर-दराज की बस्तियां आज भी सैन्य अभियान को मुश्किल बना सकती हैं. एक बड़ा फर्क यह है कि आज के हूतियों के पास आधुनिक हथियार भी हैं. उनकी सैन्य क्षमता में बैलिस्टिक मिसाइलें, क्रूज मिसाइलें, ड्रोन और जहाजों को निशाना बनाने वाले हथियार शामिल हैं. लाल सागर में जहाजों पर हुए हमलों ने दिखाया है कि हूतियों का असर केवल यमन तक सीमित नहीं है. वे समुद्री व्यापार और दूसरे देशों की सुरक्षा को भी प्रभावित कर सकते हैं. सऊदी अरब खुद हूतियों के हमलों का सामना कर चुका है. ऐसे में तुर्की को यह देखना होगा कि यमन में जमीनी युद्ध में उतरने से उसकी सुरक्षा मजबूत होगी या वह एक लंबे संघर्ष में फंस सकता है.

तुर्की को इतिहास से क्या सबक मिल सकता है?

आज का तुर्की ऑटोमन साम्राज्य नहीं है. उसके पास आधुनिक ड्रोन, बेहतर निगरानी तकनीक और अलग तरह की सैन्य व्यवस्था है. इसलिए 500 साल पुराने युद्धों की तुलना आज की स्थिति से पूरी तरह नहीं की जा सकती. फिर भी इतिहास कुछ जरूरी सबक देता है. पहला, पहाड़ी इलाकों में केवल हवाई हमलों के दम पर स्थायी नियंत्रण हासिल करना मुश्किल हो सकता है. दूसरा, स्थानीय लोगों का समर्थन न मिलने पर विदेशी सेना को लगातार विरोध का सामना करना पड़ सकता है. तीसरा, अगर लड़ाई खत्म करने का कोई राजनीतिक रास्ता नहीं निकलता, तो सैन्य अभियान सालों तक चल सकता है.

तुर्की के पास सऊदी अरब की मदद करने के दूसरे रास्ते भी हैं. वह हवाई हमलों से बचाव में मदद दे सकता है, खुफिया जानकारी साझा कर सकता है या तकनीकी सहायता दे सकता है. इस तरह वह सऊदी अरब की सुरक्षा में सहयोग कर सकता है, बिना अपनी सेना को सीधे हूतियों के खिलाफ जमीनी युद्ध में उतारे. ईरान के साथ संबंध भी तुर्की के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं. हूतियों को ईरान का समर्थन मिलता है. अगर तुर्की बड़े पैमाने पर हूतियों के खिलाफ जमीनी अभियान में उतरता है, तो इलाके में तनाव और बढ़ सकता है.



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