सीधी में विकास के नाम पर भ्रष्टाचार! पहली बारिश में धराशायी करोड़ों की सड़कें और पुलिया, RES विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल

सीधी में विकास के नाम पर भ्रष्टाचार! पहली बारिश में धराशायी करोड़ों की सड़कें और पुलिया, RES विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल


रिपोर्ट- हरीश कुमार द्विवेदी, सीधी. मध्य प्रदेश के सीधी जिले में गांवों के विकास के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं लेकिन जमीनी हकीकत सरकारी दावों की पोल खोलती नजर आ रही है. पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के तहत गांवों को मुख्य मार्गों से जोड़ने और बस्तियों तक आवागमन आसान बनाने के लिए बनाई गई सड़कें और पुलिया एक ही बरसात भी नहीं झेल पा रही हैं. कहीं सड़कें उखड़ गईं, तो कहीं पुलिया क्षतिग्रस्त होकर ग्रामीणों के लिए परेशानी का सबब बन गई. सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की निगरानी करने वाले जिम्मेदार अधिकारी क्या कर रहे थे. ग्रामीणों के आरोप हैं कि निर्माण कार्यों में जमकर अनियमितताएं हुईं. विभागीय अधिकारियों और पंचायतकर्मियों की मिलीभगत से सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका है. पांच लाख रुपये तक के निर्माण कार्यों में 20 प्रतिशत से अधिक कमीशन वसूले जाने के आरोप भी सामने आए हैं. शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होने से अब पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं.

सीधी जिले के ग्रामीण इलाकों में विकास की तस्वीर बदलने के लिए पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के माध्यम से सड़क और पुलिया निर्माण के कार्य कराए जा रहे हैं. इन निर्माण कार्यों का मकसद उन गांवों और बस्तियों तक पहुंच आसान बनाना है, जहां आजादी के बाद भी बेहतर आवागमन की सुविधा का इंतजार रहा है. ग्रामीणों को उम्मीद थी कि पक्की सड़कें बनने से खेतों तक पहुंच आसान होगी, बच्चों को स्कूल जाने में परेशानी नहीं होगी और बारिश के दिनों में गांवों का संपर्क दूसरे इलाकों से नहीं टूटेगा लेकिन निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर उठ रहे सवालों ने इन उम्मीदों को झटका दिया है.

पहली बारिश में ही क्षतिग्रस्त
आरोप है कि कई ग्राम पंचायतों में लाखों रुपये की लागत से बनाई गई सड़कें और पुलिया निर्माण के कुछ ही समय बाद खराब हो गईं. पहली बारिश में ही कई जगहों पर पुलिया क्षतिग्रस्त हो गईं जबकि सड़कों की हालत भी खराब हो गई. ऐसे में सवाल उठता है कि निर्माण कार्यों में इस्तेमाल की गई सामग्री की गुणवत्ता की जांच आखिर किस स्तर पर की गई थी. इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि गांवों में सड़क निर्माण का रास्ता साफ करने के लिए कई ग्रामीणों ने अपनी निजी भूमि तक उपलब्ध कराई. ग्रामीणों को उम्मीद थी कि उनकी इस पहल से गांव का विकास होगा और आने वाली पीढ़ियों को बेहतर आवागमन की सुविधा मिलेगी लेकिन जिन रास्तों को गांव की तरक्की का माध्यम बनना था, वही अब निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर रहे हैं.

सड़क और पुलिया टिकाऊ नहीं
ग्रामीणों का आरोप है कि सरकारी धन खर्च होने के बावजूद सड़क और पुलिया टिकाऊ नहीं बन सकीं. यदि निर्माण कार्य तय मापदंडों के अनुरूप हुए होते, तो क्या वे इतनी जल्दी खराब हो जाते. ये सवाल केवल निर्माण कार्यों की गुणवत्ता तक सीमित नहीं हैं बल्कि सरकारी योजनाओं की निगरानी, भुगतान की प्रक्रिया और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही से भी जुड़े हुए हैं. ऐसे में RES विभाग की भूमिका पर जहां सवाल खड़े हो रहे हैं, वहीं कमीशनखोरी के भी गंभीर आरोप लग रहे हैं.

सवालों के घेरे में ग्रामीण यांत्रिकी सेवा की भूमिका
सीधी जिले में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अंतर्गत ग्रामीण यांत्रिकी सेवा यानी RES विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है. ग्रामीणों की ओर से लगाए जा रहे आरोपों के मुताबिक, निर्माण कार्यों की निगरानी करने वाले कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों की कार्यप्रणाली संदिग्ध रही है. आरोप ये भी हैं कि पांच लाख रुपये तक की लागत वाले निर्माण कार्यों में RES विभाग के एसडीओ और उपयंत्रियों द्वारा 20 प्रतिशत से अधिक कमीशन लिया जाता है. इसे जनप्रतिनिधि से लेकर जिम्मेदार अफसर तक जानते हैं लेकिन सब हाथ पर हाथ धरे बैठे हुए हैं. ऐसे में यह केवल सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला नहीं होगा बल्कि ग्रामीण विकास की योजनाओं को प्रभावित करने वाला गंभीर विषय भी होगा. सवाल यह है कि क्या निर्माण कार्यों का तकनीकी मूल्यांकन नियमानुसार किया गया. क्या गुणवत्ता की जांच के बाद ही भुगतान जारी हुआ और यदि निर्माण में गड़बड़ी मिली, तो संबंधित अधिकारियों और निर्माण एजेंसियों के विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं हुई. इसके पीछे की वजह जो निकलकर सामने आई, उसने सभी को चौंका दिया.

ग्रामीणों ने लगाए मिलीभगत के आरोप
दरअसल ग्रामीणों ने कुछ ग्राम पंचायतों में सड़क और पुलिया निर्माण के दौरान विभागीय अधिकारियों और पंचायतकर्मियों की कथित मिलीभगत के आरोप भी लगाए हैं. आरोप है कि जिन अधिकारियों की जिम्मेदारी निर्माण कार्यों की निगरानी और गुणवत्ता सुनिश्चित करना है, उन्हीं की भूमिका कुछ मामलों में सवालों के घेरे में है. यदि निगरानी करने वाले अधिकारी ही निर्माण कार्यों के क्रियान्वयन में अनुचित रूप से शामिल पाए जाते हैं, तो पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना मुश्किल हो जाता है. वहीं निर्माण कार्य खराब होने के बाद शिकायतों और जांच रिपोर्ट को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. आरोप हैं कि कुछ मामलों में जांच रिपोर्ट में बदलाव किए जाने की आशंका है. अब जरूरत इस बात की है कि जिला प्रशासन पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराए और यह स्पष्ट करे कि किन निर्माण कार्यों में अनियमितताएं हुईं और इसके लिए जिम्मेदार कौन है.

क्रियान्वयन और निगरानी की समीक्षा जरूरी
ग्रामीणों की शिकायतों के बावजूद यदि जिम्मेदार कर्मचारियों पर कार्रवाई नहीं होती, तो इससे सरकारी व्यवस्था में जवाबदेही को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है. सरकारी योजनाओं में खर्च होने वाला पैसा जनता के टैक्स से आता है और उसका उद्देश्य गांवों-शहरों में बुनियादी सुविधाओं का विकास करना है लेकिन यदि सड़क और पुलिया निर्माण पर खर्च की गई राशि के बावजूद ग्रामीणों को टिकाऊ रास्ते नहीं मिलते, तो योजनाओं के क्रियान्वयन और निगरानी की समीक्षा जरूरी हो जाती है. सीधी जिला प्रशासन के सामने अब चुनौती है कि वह शिकायतों को केवल कागजों तक सीमित न रखे बल्कि मौके पर जाकर निर्माण कार्यों की वास्तविक स्थिति का सत्यापन कराए. तकनीकी विशेषज्ञों से गुणवत्ता की जांच कराई जाए. निर्माण लागत और भुगतान के रिकॉर्ड का मिलान हो और दोषी पाए जाने वालों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए. साथ ही खराब हो चुकी सड़कों और पुलियों की मरम्मत या पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए ताकि ग्रामीणों को राहत मिल सके और सरकारी धन का दोबारा अनावश्यक खर्च न हो.

जवाबदेही तय होगी या फिर…?
सीधी जिले में गांवों के विकास के लिए बनी सड़कें और पुलिया यदि एक ही बरसात में जवाब दे रही हैं, तो यह निश्चित रूप से निर्माण की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था की गंभीर समीक्षा का विषय है. कमीशनखोरी, मिलीभगत और जांच रिपोर्ट में बदलाव के आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी है ताकि सच्चाई सामने आ सके. अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन ग्रामीणों की शिकायतों पर कब तक ठोस कदम उठाता है. क्या जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय होगी या फिर गांवों के विकास के नाम पर खर्च होने वाली सरकारी राशि पर केवल सवाल ही उठते रहेंगे.



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