झांसी के अब्दुल खलील पिछले 40 साल से नवरात्र में मां दुर्गा की बना रहे मूर्तियां, पिता खलील से सीखा ये हुनर, साझा संस्कृति की मिसाल

झांसी के अब्दुल खलील पिछले 40 साल से नवरात्र में मां दुर्गा की बना रहे मूर्तियां, पिता खलील से सीखा ये हुनर, साझा संस्कृति की मिसाल


Last Updated:

झांसी में अब्दुल खलील का परिवार पिछले 40 से अधिक वर्षों से शारदीय नवरात्र के लिए मां दुर्गा की मूर्तियां तैयार कर रहा है. यह साझा संस्कृति और आपसी मेलजोल की एक अनूठी मिसाल है, जिसे उनके बच्चे भी सीख रहे हैं. अब्दुल खलील के परिवार में मूर्तियां बनाने का काम एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचा है. उनके पिता देवी-देवताओं की प्रतिमाएं तैयार करते थे. बचपन से पिता को काम करते देखकर अब्दुल खलील ने भी इस कला को समझना शुरू किया. मिट्टी को आकार देने से लेकर प्रतिमा की बारीक बनावट तक, उन्होंने धीरे-धीरे इस काम का अनुभव हासिल किया. पिता के निधन के बाद परिवार के इस पारंपरिक काम को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अब्दुल खलील ने संभाली.

Top Deals Inside

झांसीः शारदीय नवरात्र के दौरान एक ऐसी तस्वीर सामने आती है, जो यहां की साझा संस्कृति और आपसी मेलजोल को दर्शाती है. मां दुर्गा की प्रतिमाओं को तैयार करने वाले कारीगरों में अब्दुल खलील का नाम भी शामिल है. उनका परिवार पिछले करीब 40 से 45 सालों से मूर्तियां बनाने के काम से जुड़ा है. इस काम की शुरुआत उनके पिता ने की थी और अब्दुल खलील अपने हुनर से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. खास बात यह है कि अब उनके बच्चे भी इस कला को सीखने में रुचि दिखा रहे हैं.

दूसरी पीढ़ी के अब्दुल बना रहे मूर्ति

अब्दुल खलील के परिवार में मूर्तियां बनाने का काम एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचा है. उनके पिता देवी-देवताओं की प्रतिमाएं तैयार करते थे. बचपन से पिता को काम करते देखकर अब्दुल खलील ने भी इस कला को समझना शुरू किया. मिट्टी को आकार देने से लेकर प्रतिमा की बारीक बनावट तक, उन्होंने धीरे-धीरे इस काम का अनुभव हासिल किया. पिता के निधन के बाद परिवार के इस पारंपरिक काम को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अब्दुल खलील ने संभाली. आज वह उसी मेहनत और लगन के साथ प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं.

मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने के लिए सबसे पहले उसके ढांचे पर काम किया जाता है. इसके बाद मिट्टी की मदद से प्रतिमा का स्वरूप तैयार होता है. चेहरे की बनावट से लेकर हाथों और अन्य अंगों को सही आकार देना पड़ता है. इसके बाद रंगाई और सजावट के जरिए प्रतिमा को अंतिम रूप दिया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में कारीगर को धैर्य, अनुभव और बारीकियों पर ध्यान देने की जरूरत होती है. प्रतिमा का हर हिस्सा उसकी सुंदरता को निखारने में अहम भूमिका निभाता है.

कला को विरासत के तौर पर संभाल रहे अब्दुल

नवरात्र के दिनों में देवी प्रतिमाओं की मांग बढ़ने के साथ कारीगरों की व्यस्तता भी बढ़ जाती है. अब्दुल खलील अपने अनुभव के आधार पर इस काम को आगे बढ़ाते हैं. उनके लिए हर प्रतिमा तैयार करना उस हुनर को जिंदा रखने जैसा है, जिसे उन्होंने अपने पिता से सीखा था. परिवार की यह परंपरा समय के साथ उनके जीवन और पहचान का हिस्सा बन गई है. इस विरासत की एक और खास कड़ी अब्दुल खलील के बच्चे हैं. वे अपने पिता को मूर्तियां बनाते देखते हैं और खुद भी इस कला को सीखने की इच्छा रखते हैं. वे इस काम की प्रक्रिया को समझने और मिट्टी को आकार देने की कोशिश करते हैं. इससे परिवार में पीढ़ियों से चला आ रहा हुनर आगे पहुंचने की संभावना बनी हुई है. हालांकि, इस कला को पूरी तरह सीखने के लिए अभ्यास और अनुभव की जरूरत होती है.

नवरात्रि में तैयार करते हैं दुर्गा जी की मूर्तियां

अब्दुल खलील का परिवार झांसी की उस संस्कृति की झलक पेश करता है, जहां कला को किसी एक धर्म से जोड़कर नहीं देखा जा सकता. एक मुस्लिम कारीगर के हाथों तैयार होने वाली मां दुर्गा की प्रतिमाएं नवरात्र के दौरान श्रद्धालुओं की पूजा का हिस्सा बनती हैं. कारीगर अपनी कला से प्रतिमा तैयार करता है और भक्त अपनी आस्था के साथ उसकी स्थापना करते हैं. करीब चार से पांच दशक से जारी यह काम अब केवल परिवार की आजीविका नहीं, बल्कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचने वाली विरासत भी है. पिता से सीखा हुनर अब्दुल खलील संभाल रहे हैं और उनके बच्चे भी इसे सीखने में दिलचस्पी ले रहे हैं. झांसी में नवरात्र के दौरान तैयार होने वाली ये प्रतिमाएं इस बात की मिसाल हैं कि साझा परंपराएं, कला और मेहनत अलग-अलग समुदायों को एक साथ जोड़ सकती हैं.



Source link