उत्तराखंड: कभी ‘मिनी यूरोप’ कहलाने वाला गर्ब्यांग गांव अब भू-धंसाव की मार से खिसक रहा, काली नदी के कटाव से वजूद पर खतरा


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Pithoragarh News: कभी अपनी मखमली वादियों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बूते ब्रिटिश दौर में ‘भारत का मिनी यूरोप’ कहलाने वाला गर्ब्यांग गांव आज अपने अस्तित्व की जंग लड़ रहा है. भारत-चीन और नेपाल सीमा पर करीब साढ़े दस हजार फीट की ऊंचाई पर आबाद यह ऐतिहासिक गांव अब वीराने में तब्दील हो चुका है. नीचे बहती काली नदी का लगातार कटाव और भीषण भू-धंसाव इस धरोहर को धीरे-धीरे निगल रहा है. बुनियादी सुविधाओं का टोटा ऐसा कि एक फोन कॉल के लिए भी लोगों को नेपाल के नेटवर्क या फिर 6 किलोमीटर दूर तक भटकना पड़ता है.

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पिथौरागढ़: कभी 'मिनी यूरोप' रहा गर्ब्यांग गांव भू-धंसाव व कटाव से खिसक रहाZoom

ब्रिटिश काल में जो था भारत का मिनी यूरोप, आज काली नदी का कटाव लील रहा उसका वजूद

Pithoragarh News: चीन बॉर्डर के करीब बसा गर्ब्यांग गांव एक दौर में भारत का यूरोप कहा जाता था. 1962 में भारत-चीन युद्ध से पहले यह गांव इंटरनेशनल ट्रेड का केंद्र हुआ करता था. करीब साढ़े दस हजार फीट की ऊंचाई पर बसा गर्ब्यांग गांव काली नदी के दाईं ओर एक पठार पर बसा है. लेकिन गांव के ठीक नीचे बहने वाली काली नदी इस गांव के लिए अभिशाप बन गई है. नदी के कटाव के कारण यह गांव धीरे-धीरे खिसक रहा है.

खूबसूरती की वजह से मिला था ‘मिनी यूरोप’ का तमगा
चीन और नेपाल बॉर्डर से सटा गर्ब्यांग गांव एक दौर में भारत का यूरोप और ‘मिनी यूरोप’ कहा जाता था. इसकी वजह यहां की खूबसूरत वादियां थीं. 1962 वॉर से पहले यह इलाका इंडो-चाइना ट्रेड का केंद्र भी हुआ करता था, लेकिन आज यह पूरी तरह सुनसान है. आलम यह है कि आधे से ज्यादा परिवार इस गांव से पलायन कर चुके हैं. जो मजबूरी में यहां हैं, उनको गांव के धंसाव का डर हर समय डराता है.

गर्ब्यांग गांव में नहीं बिजली-पानी की सुविधा
साढ़े दस हजार फीट ऊंचाई पर बसे गर्ब्यांग गांव को काली नदी कई दशकों से काट रही है. लगातार हो रहे भू-धंसाव के कारण 1976 में यहां के आधे से ज्यादा परिवारों को ऊधम सिंह नगर जिले के सितारगंज में शिफ्ट किया जा चुका है. दो मुल्कों के बॉर्डर पर बसे इस गांव में आज भी न तो संचार के साधन हैं और न ही बिजली, पानी और स्वास्थ्य सेवाओं का कोई ठिकाना है. लिपुलेख दर्रे तक सड़क बनने के बाद यह इलाका 2020 में रोड से जुड़ पाया है, लेकिन संचार के लिए यहां के लोग आज भी नेपाल पर निर्भर हैं. हालात तो यह हैं कि फोन पर एक अदद कॉल के लिए भी इन्हें 6 किलोमीटर का सफर तय कर छियालेख पहुंचना पड़ता है.

कम नहीं हो रही पलायन की रफ्तार, छलका ग्रामीणों का दर्द
गांव के कृष्णा गर्ब्याल का कहना है कि रोड आने से काफी सहूलियत हुई है. लेकिन बिजली, पेयजल योजना, संचार और स्वास्थ्य सेवाओं का अभी भी बुरा हाल है. यही वजह है कि पलायन की रफ्तार कम होने का नाम नहीं ले रही है. युवक भूपेन्द्र का कहना है कि काली नदी का बहाव लगातार बढ़ रहा है. ऐसे में खतरा गांव के वजूद पर भी आ गया है. लेकिन कटाव को रोकने के लिए अभी तक भी कोई ठोस काम नहीं हो पाया है.

नतीजा यह है कि नदी गांव की जमीन निगल रही है और गांव नीचे खिसक रहा है. डीएम आशीष भटगांई का कहना है कि गर्ब्यांग गांव को वाइब्रेंट विलेज योजना में शामिल किया गया है. अगले साल तक गांव में बिजली पहुंच जाएगी. कटाव को रोकने के लिए भी जल्द ही काम किया जाएगा.

1962 से पहले की खुशहाली अब भी अधूरी
गर्ब्यांग गांव के हालात 1962 से पहले ऐसे नहीं थे. भारत-चीन युद्ध से पहले यह इलाका आर्थिक तौर पर काफी मजबूत था. तिब्बत के साथ होने वाले व्यापार का गर्ब्यांग गांव केंद्र बिंदु हुआ करता था. भारत-तिब्बत व्यापार ने इस इलाके को पूरी दुनिया में अलग पहचान दिलाई. आलम तो यह था कि ब्रिटिश हुकूमत में इसे मिनी यूरोप का खिताब मिला था. 1992 में इंडो-चाइना ट्रेड तो फिर से बहाल हो गया, बावजूद इसके 1962 से पहले की खुशहाली यहां वापस नहीं आ पाई है. गर्ब्यांग गांव के 400 परिवार देश-दुनिया में फैले हैं, लेकिन गांव में सिर्फ 146 परिवार ही स्थाई तौर पर रहते हैं.



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