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Share Market Tips : दिग्गज निवेश सलाहकार संकरन नरेन का कहना है कि शेयर बाजार में जारी हालिया उतार-चढ़ाव के बीच निवेशकों को तीन बातों पर ध्यान देना चाहिए. एक तो उन्हें अपना निवेश लंबे समय तक बनाए रखना चाहिए और दूसरा एसेट एलोकेशन पर खास जोर देना चाहिए. यह दोनों फैक्टर मिलकर निवेशकों को मौजूदा दौर के नुकसान से बचा सकते हैं.
शेयर बाजार में अभी काफी उतार-चढ़ाव दिख रहा है.
नई दिल्ली. भारतीय शेयर बाजार में अभी काफी उतार-चढ़ाव चल रहा है. ऐसे में निवेशकों को कुछ खास रणनीति बनाने की जरूरत है. दिग्गज सलाहकार संकरन नरेन ने इस मुश्किल समय में अपना निवेश बचाने का खास टिप्स बताया है. भारतीय बाजार पर अभी कई तरह के फैक्टर्स का दबाव है, जिसमें अमेरिका में ब्याज दरों का बढ़ना, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, देशों के बीच तनाव और विदेशी निवेश का कम इनफ्लो उतार-चढ़ाव प्रमुख हैं. अमेरिकी नेतृत्व वाले एआई निवेश चक्र ने वैश्विक पूंजी का एक बड़ा हिस्सा अपनी ओर खींचा है, जिससे उभरते बाजारों के लिए निकट भविष्य का माहौल और चुनौतीपूर्ण हो गया है. ऐसे में संकरन नरेन ने भारतीय निवेशकों को देश की मजबूत घरेलू आर्थिक बुनियाद को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
ICICI प्रूडेंशियल AMC के ED और CIO संकरन नरेन का मानना है कि इस मुश्किल समय में निवेशकों को तीन सिद्धांतों पर ध्यान देना चाहिए. इनमें एसेट एलोकेशन, बिना किसी रोक-टोक के निवेश और अपने निवेश को बनाए रखना शामिल है. नरेन कहते हैं कि लंबे समय में संपत्ति बनाने के लिए इक्विटी एक अहम जरिया है, लेकिन इसमें लंबे समय तक उतार-चढ़ाव भी हो सकता है. निवेशकों को ऐसे पोर्टफोलियो बनाने से बचना चाहिए जो बहुत ज्यादा किसी एक एसेट क्लास पर निर्भर हों. निवेशकों को सिर्फ इक्विटी फंड चुनने के बजाय एसेट एलोकेशन (संपत्ति का बंटवारा) अपनाना चाहिए.
शेयर बाजार में साल 2026 की शुुरुआत से ही गिरावट दिख रही है.
कैसे संभालें अपना निवेश
नरेन ने कहा कि इक्विटी, डेट और दूसरी एसेट क्लास का सही मिश्रण निवेशकों को बाजार के अलग-अलग दौर से निपटने और किसी एक एसेट क्लास पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकता है. हाइब्रिड और एसेट-एलोकेशन पर आधारित रणनीतियां निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो में विविधता लाने में मदद कर सकती हैं, खासकर तब जब बाजार की स्थिति साफ न हो.
काम आएगी ‘कॉन्ट्रारियन इन्वेस्टिंग’
नरेन का कहना है कि बाजार में उतार-चढ़ाव के दौर उन निवेशकों के लिए भी मौके पैदा कर सकते हैं जो हाल के परफॉर्मेंस से आगे की सोच सकते हैं. यहीं पर ‘कॉन्ट्रारियन अप्रोच’ काम आ सकती है. ‘कॉन्ट्रा स्ट्रैटेजी’ आम तौर पर ऐसे स्टॉक्स और सेक्टर्स की तलाश करती है जिनका परफॉर्मेंस कुछ समय से खराब रहा हो. इसका मकसद ऐसे मौके खोजना होता है, जहां फंडामेंटल्स में आगे चलकर सुधार हो सकता है या जहां वैल्यूएशन से लॉन्ग-टर्म पोटेंशियल का सही अंदाजा नहीं लग पा रहा हो.
बाजार में दिख रहे कई मौके
नरेन का मानना है कि आज भी बाजार के अलग-अलग हिस्सों में मौके दिख रहे हैं, जिनमें मिड और स्मॉल-कैप स्टॉक्स भी शामिल हैं. कुछ सेक्टर्स में खराब परफॉर्मेंस ज्यादा साफ दिखी है. कॉन्ट्रारियन इन्वेस्टिंग का मतलब है कि हाल के सफल ट्रेंड्स से हटकर सोचना. बाजार के साइकल में अलग-अलग समय पर लार्ज, मिड और स्मॉल-कैप में मौके मिल सकते हैं. जरूरी बात यह है कि अच्छी तरह रिसर्च करके असल में खराब परफॉर्मेंस वाले स्टॉक्स की पहचान की जाए और इन्वेस्टमेंट थीसिस के सही साबित होने का इंतजार करने तक सब्र रखा जाए. कॉन्ट्रारियन होने का मतलब सिर्फ सस्ते स्टॉक्स खरीदना नहीं है. बाजार के साइकल के आधार पर वैल्यू, ग्रोथ या क्वालिटी सभी कॉन्ट्रारियन मौके बन सकते हैं. उन्होंने कहा कि अभी ICICI प्रूडेंशियल कॉन्ट्रा फंड का NFO चल रहा है और यह 12 अक्टूबर तक खुला रहेगा.
शेयर मार्केट में गिरावट की कई वजहें हैं.
एसआईएफ वाले फंड बेहतर विकल्प
नरेन ने कहा कि जो निवेशक पोर्टफोलियो बनाने में ज्यादा लचीलापन चाहते हैं, वे स्पेशलाइज़्ड इन्वेस्टमेंट फंड (SIF) पर विचार कर सकते हैं. SIF का ढांचा फंड मैनेजरों को अलग-अलग तरह की निवेश रणनीतियां अपनाने के लिए ज्यादा लचीलापन देता है. अनिश्चित बाजार के दौरान निवेशकों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि वे बाजार में थोड़े समय के उतार-चढ़ाव के आधार पर अपने निवेश प्लान को न छोड़ें. यह समझना जरूरी है कि बाजार के उतार-चढ़ाव (साइकिल) निवेश का एक स्वाभाविक हिस्सा है. कमजोरी के दौर निवेशकों के धैर्य की परीक्षा ले सकते हैं, लेकिन गिरावट के बाद निवेश से बाहर निकलने का मतलब यह भी हो सकता है कि आप बाद में होने वाली रिकवरी का फायदा न उठा पाएं. लिहाजा निवेशकों को अपने निवेश प्लान पर टिके रहना चाहिए और बाजार में थोड़े समय के उतार-चढ़ाव के आधार पर फैसले नहीं लेने चाहिए. धैर्य के साथ अपना निवेश बनाए रखना चाहिए.