डिजिटल दौर में इंटरनेट किसी भी देश की संप्रभुता और सुरक्षा की बुनियादी रीढ़ बन चुका है. ऐसे दौर में अगर किसी पूरे देश का इंटरनेट नेटवर्क किसी विदेशी अरबपति के रहमोकरम पर निर्भर हो जाए तो यह बहुत गंभीर बात है. अमेरिकी अरबपति एलन मस्क की सैटेलाइट इंटरनेट कंपनी स्टारलिंक को लेकर अब भारत में सुरक्षा के मोर्चे पर गहरी चिंता पैदा हो गई है. थिंक टैंक तक्षशिला इंस्टीट्यूशन की ताजा रिपोर्ट ने इस पूरे मामले पर गंभीर खतरे की घंटी बजाई है. यह रिपोर्ट बताती है कि स्टारलिंक की तकनीक भारत की आंतरिक सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता के लिए बड़ा संकट खड़ी कर सकती है. अगर कभी देश में नाजुक हालात बने तो मस्क मनमाने ढंग से सेवाएं रोक सकते हैं. दूसरी तरफ सरकार जब कानून व्यवस्था के लिए इंटरनेट बंद करना चाहेगी तब वे सेवाएं जबरन चालू भी रख सकते हैं.
स्टारलिंक आज दुनिया का सबसे बड़ा सैटेलाइट नेटवर्क है. पृथ्वी की निचली कक्षा में इसके 10 हजार से ज्यादा सैटेलाइट लगातार चक्कर काट रहे हैं. दुनिया में अंतरिक्ष में घूम रहे कुल सक्रिय सैटेलाइट्स का करीब दो तिहाई हिस्सा अकेले इसी नेटवर्क का है. मस्क की योजना भविष्य में 42 हजार सैटेलाइट्स अंतरिक्ष में तैनात करने की है.
स्पेसएक्स के फाल्कन रॉकेटों की बदौलत मस्क हर साल हजारों नए सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेज रहे हैं. फरवरी 2026 में मस्क की कंपनी स्पेसएक्स और उनकी एआई कंपनी एक्स-एआई का आपस में विलय हो गया. इस विलय के बाद इस साझा कंपनी की कुल मार्केट वैल्यू करीब 1.25 ट्रिलियन डॉलर आंकी गई है.
इस विशाल कंपनी की पूरी ताकत सिर्फ एक ही इंसान के हाथों में सिमटी हुई है. स्पेसएक्स में मस्क की इक्विटी हिस्सेदारी करीब 42 से 43 प्रतिशत के आसपास है. इसके बावजूद खास वोटिंग शेयर ढांचे की वजह से मस्क के पास कंपनी के 79 प्रतिशत वोटिंग अधिकार हैं. इसका मतलब है कि स्टारलिंक से जुड़ा हर छोटा बड़ा फैसला सिर्फ मस्क के मूड पर निर्भर करता है. भारत जैसे विशाल देश के लिए किसी एक निजी विदेशी नागरिक का ऐसा दबदबा सुरक्षा की दृष्टि से बेहद चिंताजनक है.
संकट के समय इंटरनेट बंद करने या चालू रखने की ताकत किसी एक शख्स के पास क्यों हो?
यह जोखिम इसलिए भी ज्यादा गंभीर है क्योंकि अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान में एलन मस्क का भारी राजनीतिक प्रभाव है. वे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी रहे हैं और सरकारी दक्षता विभाग के प्रमुख के रूप में काम कर चुके हैं. इसके साथ ही अमेरिकी सेना और स्पेस फोर्स के कई अहम अभियान स्पेसएक्स पर ही टिके हैं. अमेरिकी रक्षा विभाग और नासा के मून मिशन भी इसी कंपनी के रॉकेटों पर निर्भर हैं.
लेकिन यह रिश्ता दोनों तरफ से काम करता है. स्पेसएक्स अपने बिजनेस और लाइसेंस के लिए अमेरिकी सरकार के नियमों और अनुबंधों पर पूरी तरह निर्भर है. अगर कभी अमेरिकी रणनीतिक हितों को भारत के हितों के खिलाफ कोई कदम उठाना पड़ा तो वाशिंगटन स्पेसएक्स पर दबाव बना सकता है. ऐसी स्थिति में अमेरिकी सरकार भारत का डेटा साझा करने या नेटवर्क बंद करने का निर्देश दे सकती है. अंततः यह पूरी कंपनी एक विदेशी सरकार के कानूनी अधिकार क्षेत्र में आती है.
‘यूक्रेन और ईरान की घटनाओं से भारत को पहले ही बड़ा सबक सीखने की जरूरत’
यूक्रेन में जो कुछ हुआ वह किसी भी देश की आंखें खोलने के लिए काफी है. फरवरी 2022 में रूस के साथ युद्ध छिड़ने के बाद यूक्रेन अपनी सैन्य बातचीत के लिए स्टारलिंक पर बहुत ज्यादा निर्भर हो गया था. लेकिन कुछ ही समय बाद मस्क ने कई मौकों पर अपनी मर्जी से यूक्रेन की इंटरनेट पहुंच को सीमित कर दिया. जब यूक्रेनी सेना ने क्रीमिया के पास रूसी जहाजों पर हमले के लिए नेटवर्क चालू करने की मांग की तो मस्क ने उसे साफ मना कर दिया.
इसके बाद मार्च 2025 में मस्क ने सोशल मीडिया पर सार्वजनिक रूप से दावा किया कि उनका सिस्टम यूक्रेनी सेना की रीढ़ है. उन्होंने यहां तक कह दिया कि अगर वे इसे बंद कर दें तो यूक्रेन का पूरा मोर्चा पलक झपकते ढह जाएगा. इससे साफ जाहिर होता है कि कोई निजी कारोबारी किसी देश की सेना को अपनी उंगलियों पर नचाने की हैसियत में आ सकता है.
मणिपुर और अंडमान में मिले स्टारलिंक डिवाइस से देश की आंतरिक सुरक्षा को क्या झटका लगा?
भारत के लिए यह खतरा केवल कागजों तक सीमित नहीं है बल्कि सीमा पर घट भी चुका है. दिसंबर 2024 में भारतीय सुरक्षा बलों ने मणिपुर में उग्रवादियों के एक ठिकाने से स्टारलिंक उपकरण बरामद किए थे. उस समय मस्क ने दावा किया था कि भारत के ऊपर उनकी सैटेलाइट बीम बंद हैं. लेकिन जमीनी हकीकत यह थी कि तकनीकी खामियों के कारण म्यांमार सीमा के पास ये टर्मिनल काम कर रहे थे.
इसी तरह अंडमान और निकोबार में पुलिस ने ड्रग्स तस्करों के पास से स्टारलिंक उपकरण पकड़े थे. जब भारतीय जांच एजेंसियों ने कंपनी से इन उपकरणों के इस्तेमाल का रिकॉर्ड मांगा तो कंपनी ने ब्योरा देने से मना कर दिया. स्टारलिंक ने डेटा प्राइवेसी का हवाला देकर भारतीय एजेंसियों को अमेरिकी कानूनी प्रक्रिया अपनाने को कह दिया. इस घटना ने साबित कर दिया कि जरूरत पड़ने पर विदेशी कंपनियां भारतीय कानूनों को ठेंगे पर रख सकती हैं.
‘मस्क की नई एआई पॉलिसी से भारतीय यूजर्स का पर्सनल डेटा चोरी होने का डर’
डेटा सुरक्षा के मोर्चे पर भी हालात लगातार चिंताजनक बनते जा रहे हैं. स्टारलिंक ने 15 जनवरी 2026 को अपनी ग्लोबल प्राइवेसी पॉलिसी में चुपचाप बड़ा बदलाव कर दिया. इस नई पॉलिसी के तहत कंपनी को ग्राहकों का लोकेशन डेटा और आईपी एड्रेस इस्तेमाल करने की पूरी छूट मिल गई. इसके अलावा बातचीत से जुड़ा ऑडियो और वीडियो डेटा भी मशीन लर्निंग और एआई मॉडल ट्रेन करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
कंपनी इस संवेदनशील डेटा को किसी भी तीसरे पक्ष के साथ भी साझा कर सकती है. सभी यूजर्स को बिना उनकी मर्जी पूछे इस डेटा शेयरिंग में डिफॉल्ट रूप से शामिल कर दिया गया है. स्पेसएक्स और एक्स-एआई के विलय के बाद मस्क के ग्रोक चैटबॉट को करोड़ों ग्राहकों के बातचीत के डेटा तक सीधी पहुंच मिल गई है. साल 2023 में ही मस्क ने कहा था कि टेस्ला और ट्विटर के जरिए उनके पास दुनिया का सबसे ज्यादा रियल टाइम डेटा मौजूद है. अब सैटेलाइट नेटवर्क जुड़ने से यह खतरा कई गुना बढ़ चुका है.
‘सरकारी नियम और पाबंदियां स्पेसएक्स के अनियंत्रित नेटवर्क को रोकने में नाकाफी’
भारत सरकार ने इस खतरे को देखते हुए सैटेलाइट कंपनियों के लिए कड़े नियम बनाए हैं. मई 2025 में दूरसंचार विभाग ने लाइसेंस के लिए अतिरिक्त सुरक्षा शर्तें लागू की थीं. नियमों के मुताबिक सारा भारतीय डेटा सिर्फ देश के भीतर मौजूद गेटवे से ही गुजरना चाहिए. इसके अलावा सैटेलाइट्स के बीच आपस में लेजर संपर्क के जरिए डेटा ट्रांसफर करने पर भी रोक लगाई गई है.
जनवरी 2026 में भारतीय अंतरिक्ष नियामक इन-स्पेस ने स्टारलिंक के जेन-2 सैटेलाइट्स के आवेदन को खारिज कर दिया था. इन सैटेलाइट्स में डायरेक्ट-टू-डिवाइस तकनीक थी जिससे बिना किसी टर्मिनल के सीधे मोबाइल पर इंटरनेट चल सकता था. लेकिन तक्षशिला रिपोर्ट का कहना है कि इन सख्त नियमों को जमीन पर परखना लगभग नामुमकिन है.
जमीन पर बैठा भारतीय नियामक यह कभी नहीं जान सकता कि अंतरिक्ष में सैटेलाइट आपस में क्या बात कर रहे हैं. डेटा सुरक्षा की शर्तें पूरी तरह कंपनी के अपने लिखित भरोसे पर टिकी हैं. इसके अलावा भारत में 900 करोड़ रुपये की जिस नेशनल सैटकॉम मॉनिटरिंग फैसिलिटी का एलान हुआ था वह अभी तक चालू नहीं हो पाई है. ऐसे में नियमों के उल्लंघन पर सरकार केवल लाइसेंस रद्द कर सकती है लेकिन चालू नेटवर्क को तुरंत रोक नहीं सकती.
विदेशी सैटेलाइट नेटवर्क की इस खतरनाक मनमानी से बचने के लिए भारत के पास क्या रास्ते हैं?
तक्षशिला की रिपोर्ट ने भारत सरकार को इस भारी निर्भरता से बचने के लिए कई ठोस सुझाव दिए हैं. सबसे पहले सरकार को डिजिटल भारत निधि का फंड बढ़ाकर दूरदराज के इलाकों में ऑप्टिकल फाइबर बिछाना चाहिए. इससे जमीन पर इंटरनेट मजबूत होगा और सैटेलाइट इंटरनेट की मांग अपने आप घट जाएगी. आम जनता के लिए विदेशी सैटेलाइट इंटरनेट के खुले खुदरा इस्तेमाल को हतोत्साहित किया जाना चाहिए.
इसके अलावा भारत को किसी एक ऑपरेटर पर टिके रहने के बजाय कई कंपनियों के बीच काम बांटना चाहिए. भारत को ऐसी कंपनियों को तरजीह देनी चाहिए जो भारतीय कंपनियों के साथ जॉइंट वेंचर बनाकर काम करने को तैयार हों. डायरेक्ट-टू-डिवाइस तकनीक के पूरे देश में फैलने से पहले ही सरकार को इसके लिए सख्त कानून बना लेना चाहिए. साथ ही देश की अपनी सैटकॉम निगरानी प्रणाली को बिना देरी किए तत्काल चालू करना होगा.
किसी भी देश का संचार तंत्र उसकी आजादी का सबसे अहम सुरक्षा घेरा होता है. यदि इस संवेदनशील तंत्र का रिमोट कंट्रोल किसी विदेशी पूंजीपति के हाथ में चला जाए तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा से बहुत बड़ा समझौता होगा. समय रहते स्वदेशी नेटवर्क को मजबूत करना ही भारत को डिजिटल गुलामी से बचा सकता है.