भारत की तरह ही फ्रांस में छात्रों के नाम पर जो आग भड़की है, उसका धुआं अब पूरी दुनिया में फैल रहा है. क्या आपको लगता है कि सड़कों पर उतरकर पत्थर फेंकने वाले, पुलिस से भिड़ने वाले और क्लास छोड़ कर नारे लगाने वाले ये सिर्फ मासूम स्कूली बच्चे हैं? अगर आप ऐसा सोच रहे हैं, तो आप बिल्कुल गलत हैं. फॉक्स न्यूज डिजिटल की एक बड़ी और चौंकाने वाली पड़ताल ने इस पूरे ड्रामे का सच बेनकाब कर दिया है. इस पूरी रिपोर्ट में जो खुलासा हुआ है, वो भारत जैसे देशों के लिए एक बहुत बड़ी चेतावनी की घंटी है!
भारत-फ्रांस प्रोटेस्ट में फॉरेन फंडिंग का बड़ा खुलासा
इस इन्वेस्टिगेशन की अगुवाई की है मशहूर पत्रकार असरा नोमानी ने, उन्होंने 50 से ज्यादा ऐसे संगठनों की एक सीक्रेट लिस्ट तैयार की है, जो बैकग्राउंड में रहकर इस पूरे आंदोलन की डोर खींच रहे हैं. कहानी सिर्फ फ्रांस के स्कूलों के बजट कटने की नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ा इंटरनेशनल नेटवर्क काम कर रहा है. इसे नाम दिया गया है ‘रेड-ग्रीन अलायंस, यानी कम्युनिस्टों (रेड) और कट्टरपंथियों (ग्रीन) का एक ऐसा मिला-जुला खतरनाक ग्रुप, जिसका एकमात्र मकसद दुनिया के बड़े-बड़े देशों में अस्थिरता पैदा करना है.
क्या है 50 ग्रुप्स का ‘रेड-ग्रीन’ खेल?
जब पेरिस की सड़कों पर ‘बास्टिल’ स्क्वायर में छात्रों का हुजूम उतरा, तो दुनिया को दिखाया गया कि फ्रांस का युवा अपने अधिकारों के लिए लड़ रहा है. लेकिन जब फॉक्स न्यूज ने इन 50 संगठनों का कच्चा-चिट्ठा खोला, तो आंकड़े देखकर होश उड़ गए.
- सिर्फ 15 यूथ या स्टूडेंट ग्रुप: यानी इस पूरे आंदोलन में सिर्फ एक-तिहाई हिस्सेदारी ही असल छात्रों की थी.
- 35 मैच्योर और एक्सटर्नल ग्रुप्स: बाकी बचे दो-तिहाई ग्रुप्स में ट्रेड यूनियंस, वामपंथी पार्टियां और एक्टिविस्ट शामिल थे.
- बड़ी-बड़ी वामपंथी पार्टियां: इसमें ‘ला फ्रांस इंसौमिस’ और ‘फ्रेंच कम्युनिस्ट पार्टी’ जैसे बड़े सियासी नाम सीधे तौर पर शामिल थे, जो बच्चों के कंधे पर बंदूक रखकर अपनी राजनीति चमका रहे थे.
- कम्युनिस्ट और फिलीस्तीन समर्थक झंडे: पेरिस के प्रदर्शनों में स्कूली किताबों से ज्यादा कम्युनिस्टों का ‘हंसिया-हथौड़ा’ और फिलीस्तीनी झंडे लहराते हुए देखे गए.
ये सीधी-सीधी रणनीति है, बच्चों की आड़ लो, मीडिया में सहानुभूति बटोरो और फिर देश की पुलिस, सिस्टम और सरकार को कटघरे में खड़ा कर दो.
नेविल रॉय सिंघम, पर्दे के पीछे बैठा ‘चीनी फाइनेंस’ का मास्टरमाइंड
इस पूरे खेल का सबसे खतरनाक पहलू है, पैसा! ये पूरा तमाशा बिना पैसों के नहीं चल रहा. इस इंटरनेशनल नेटवर्क को फंड कर रहा है एक अमेरिकी मूल का टेक अरबपति, जो आजकल चीन में बैठकर अपनी गोटियां फिट कर रहा है. उसका नाम है नेविल रॉय सिंघम.
सिंघम पर आरोप है कि वो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के प्रोपेगैंडा को दुनिया भर में फैलाने के लिए पानी की तरह पैसा बहा रहा है. उसने कई मीडिया आउटलेट्स और तथाकथित ‘सोशल वेलफेयर’ ग्रुप्स का एक ऐसा जाल बुना है, जो दुनिया भर में गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा करने का काम करते हैं.
इस रिपोर्ट के मुताबिक BreakThrough News जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को, ये वही आउटलेट है जिसे सिंघम का फंड मिलता है. जैसे ही फ्रांस में छात्रों ने पुलिस की गाड़ियों पर पथराव शुरू किया, इस आउटलेट ने मिनटों में वीडियो को पूरी दुनिया में वायरल कर दिया. इन वीडियोज को लाखों लाइक्स मिले, बड़े-बड़े वामपंथी इन्फ्लुएंसर्स ने इन्हें शेयर किया और दुनिया के सामने ये नैरेटिव गढ़ा गया कि ‘पूरी दुनिया का युवा अब क्रांति के लिए सड़कों पर आ चुका है’.
अब भारत पर क्यों है इस नेटवर्क की नजर?
अगर आपको लग रहा है कि ये फ्रांस, अमेरिका या यूरोप का मामला है और भारत का इससे कोई लेना-देना नहीं है, तो जरा संभल जाइए. असरा नोमानी की इस इन्वेस्टिगेशन का सबसे खौफनाक मोड़ यही है, फ्रांस और बेल्जियम के बाद अगला निशाना भारत है!
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर ‘Indian Alliance Paris’ नाम के एक संगठन ने फ्रांस के इन हिंसक प्रदर्शनों का खुलकर समर्थन किया. इतना ही नहीं, उन्होंने फ्रांस के इस छात्र आंदोलन की तुलना सीधे भारत के छात्र आंदोलनों से कर दी और लाल दिल वाला इमोजी बनाकर लिखा, ’Gen Z: In France. In India. Bravo for today’.
क्या ये सिर्फ एक ट्वीट है? बिल्कुल नहीं! ये एक कोड वर्ड है. ये वही नेटवर्क है जिसने न्यूयॉर्क के ‘द पीपुल्स फोरम’ में भारत-विरोधी और नाटो-विरोधी इवेंट्स को स्पॉन्सर किया था. आपको जानकर हैरानी होगी कि ‘द पीपुल्स फोरम’ को अकेले नेविल रॉय सिंघम ने 22 मिलियन डॉलर से ज्यादा लगभग 180 करोड़ रुपए की फंडिंग दी है.
भारत में कैसे काम करती है ये टूलकिट?
भारत में जब भी कोई सेंसेटिव मुद्दा उठता है, चाहे वो कोई छात्र आंदोलन हो, नागरिकता कानून से जुड़ा विरोध हो, या फिर किसान आंदोलन, आपने देखा होगा कि अचानक से विदेशी एक्टिविस्ट, टूलकिट गैंग, और वामपंथी मीडिया आउटलेट्स एक्टिव हो जाते हैं.
- लोकल मुद्दे को ग्लोबल बनाना: भारत के किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी के छोटे से मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसा दिखाया जाता है मानो भारत में लोकतंत्र खत्म हो गया हो.
- एक जैसा नैरेटिव सेट करना: फ्रांस में जो नारे लगाए गए, ‘क्लास वॉर’ और ‘इम्पिरियलिस्ट वॉर बंद करो’, वही भाषा भारत की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) या अन्य कैंपसों में भी सुनने को मिलती है.
- डिजिटल प्रोपेगैंडा फैलाना: ब्रेकथ्रू न्यूज और टेलीस्यूर जैसे चैनल्स तुरंत भारत के विरोध प्रदर्शनों के वीडियो उठाकर उन्हें पूरी दुनिया में ऐसे पेश करते हैं जैसे भारत में कोई बड़ा विद्रोह होने वाला है.
रेड-ग्रीन ईकोसिस्टम: वेस्टर्न डेमोक्रेसी को अंदर से खोखला करने का प्लान
हेरिटेज फाउंडेशन के सीनियर फेलो माइक गोंजालेज का कहना है कि ये ‘रेड-ग्रीन’ ईकोसिस्टम दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों को भीतर से तोड़ने की कोशिश कर रहा है. कम्युनिस्टों (रेड) और कट्टरपंथियों (ग्रीन) की विचारधारा में भले ही जमीन-आसमान का फर्क हो, लेकिन उनका दुश्मन एक ही है, डेमोक्रेसी, फ्री-मार्केट, और वेस्टर्न / इंडिक वैल्यूज.
फ्रांस में जिस तरह से इतिहास दोहराया जा रहा है, वो बहुत भयावो है. 1789 की फ्रांसीसी क्रांति, 1958 का संकट और 1968 का छात्र आंदोलन, फ्रांस का इतिहास गवाह है कि वहां सड़कों की हिंसा से सरकारें गिरी हैं. यही मॉडल अब पूरी दुनिया पर अप्लाई किया जा रहा है.
फ्रांस के सेंट-डेनिस में ‘लीसी पॉल एलुआर्ड’ स्कूल के बाहर जब बच्चों ने लाल धुएं के बीच फिलीस्तीनी झंडा लहराया, तो ‘न्यू यॉर्क टाइम्स’ ने इसे तुरंत हेडलाइन बना दिया. यही काम भारत में भी करने की फिराक में हैं ये ताकतें. भारत के युवाओं को भड़काकर, उन्हें सड़कों पर लाकर देश के इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे हाईवे, रेलवे, और मेट्रो को ठप करना ही इनका असली मकसद है.
हमें क्यों सतर्क रहने की जरूरत है?
ये कोई पहली बार नहीं है जब भारत में बाहरी फंडिंग और विदेशी नैरेटिव के जरिए माहौल बिगाड़ने की कोशिश की गई हो. लेकिन असरा नोमानी की इस रिपोर्ट ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया है.
भारत की जनरेशन-जी (Gen Z) और कॉलेज के छात्रों को ये समझना होगा कि उनके मासूम कंधों का इस्तेमाल दुनिया के बड़े-बड़े वामपंथी और चीनी फंडिंग से चलने वाले आका अपनी सियासी रोटियां सेंकने के लिए कर रहे हैं. जिस तरह फ्रांस के 50 में से 35 संगठन वयस्कों और वामपंथी पार्टियों के थे, उसी तरह भारत में भी हर आंदोलन के पीछे ऐसे ही हाथ छिपे होते हैं, जो दुनिया के कोने में छुपकर फंडिंग दे रहे होते हैं.
अगर हमने समय रहते इन वामपंथी टूलकिटों और चीनी पैसों से पलने वाले प्रोपेगैंडा नेटवर्क को नहीं पहचाना, तो पेरिस की सड़कों पर जो आग आज जल रही है, उसकी लपटें हमारे देश के शांत माहौल को भी झुलसा सकती हैं. अब वक्त आ गया है कि सोशल मीडिया पर बिकने वाले इस झूठे ‘क्रांति’ के नैरेटिव से सावधान रहा जाए!