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Pakistan-Afghanistan Tension: पाकिस्तान की ओर से अफगानिस्तान को जल्द ही एक नया झटका देने की तैयारी है. ये सीधे तौर पर भारत के लिए एक फायदेमंद कदम होगा. दरअसल अफगानिस्तान की तालिबानी सरकार और ईरान के बीच चाबहार बंदरगाह को लेकर डील चल रही है. इसके तहत चाबहार बंदरगाह में अफगानिस्तान को जमीन मिलेगी. इस प्लान के बाद उसे पाकिस्तान के ग्वादर या कराची पोर्ट पर निर्भरता कम करने का मौका मिलेगा.
चाबहार में अफगानिस्तान की एंट्री होगी.
Afghanistan Chabhar Port: अफगानिस्तान की ओर से पाकिस्तान को नया झटका देने की तैयारी हो रही है. अफगानिस्तान की नजर अब ईरान के चाबहार बंदरगाह पर है, जहां भारत पहले से बैठा है. यहां अफगानिस्तान अपने सामान के आयात-निर्यात के लिए स्थायी ठिकाना चाहता है. दरअसल भारत की तरह ही अफगानिस्तान भी पाकिस्तान से परेशान हो गया है. भारत को पाकिस्तान सेंट्रल एशिया तक जाने का रास्ता नहीं देता, जिस कारण हमें ईरान के साथ बंदरगाह बनाना पड़ा. वही पाकिस्तान अफगानिस्तान के साथ भी आए दिन लड़ाई करता रहता है. जब मन होता है तो बॉर्डर बंद कर देता है. ऐसे में अब अफगानिस्तान ने भी चाबहार बंदरगाह में अपना ठिकाना बनाने का फैसला किया है. ईरान के एक सांसद के मुताबिक, चाबहार में अफगानिस्तान को जमीन देने के प्रस्ताव पर शुरुआती सहमति बन गई है. प्लान के शुरुआती चरण में बंदरगाह के अंदर करीब 10 हेक्टेयर और स्पेशल इकोनॉमिक जोन में 100 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन उपलब्ध कराने की बात है. अगर यह प्लान आगे बढ़ता है, तो अफगानिस्तान को समुद्र तक पहुंचने के लिए पाकिस्तान पर अपनी निर्भरता घटाने का बड़ा मौका मिल जाएगा. अफगानिस्तान का नया ठिकाना भारत के लिए भी काबुल तक पहुंचने का अहम रास्ता बन सकता है.
चाबहार में क्या करने जा रहा है तालिबान?
ईरान के सांसद मोहसेन जंगनेह ने अफगानिस्तान के दौरे के दौरान सहार टीवी से बातचीत में बताया कि चाबहार में अफगानिस्तान को जमीन देने को लेकर शुरुआती सहमति बनी है. प्रस्ताव के मुताबिक बंदरगाह के समुद्र तट वाले हिस्से में करीब 10 हेक्टेयर जमीन और चाबहार के विशेष आर्थिक क्षेत्र में 100 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन देने की बात है. इस जमीन पर अफगान सरकार निवेश करेगी और व्यापार से जुड़ा बुनियादी ढांचा विकसित कर सकती है. हालांकि, अभी यह साफ नहीं है कि जमीन लीज पर दी जाएगी या उसका मालिकाना हक अफगानिस्तान को मिलेगा. जंगनेह ने यह भी बताया कि अफगान पक्ष बंदरगाह के अंदर और भी ज्यादा जमीन चाहता था, लेकिन समुद्र तट के आसपास सीमित जगह होने के कारण ऐसा करना मुश्किल है. यानी अभी इसे पूरी तरह तय हो चुका प्लान नहीं कहा जा सकता. यह शुरुआती सहमति है, जिस पर आगे बातचीत और फैसले होने बाकी हैं. दोनों देशों ने औद्योगिक सहयोग, संयुक्त औद्योगिक पार्क बनाने और द्विपक्षीय व्यापार को 10 अरब डॉलर तक पहुंचाने के लक्ष्य पर भी चर्चा की.
चाबहार क्यों चुन रहा है अफगानिस्तान?
अफगानिस्तान एक लैंडलॉक देश है. यानी उसकी अपनी कोई समुद्री सीमा नहीं है. अंतरराष्ट्रीय बाजार तक सामान पहुंचाने के लिए उसे दूसरे देशों के बंदरगाहों और सड़कों की जरूरत पड़ती है. लंबे समय तक पाकिस्तान के कराची बंदरगाह और वहां से गुजरने वाले रास्ते अफगानिस्तान के व्यापार के लिए अहम रहे हैं. लेकिन पाकिस्तान और तालिबान के रिश्तों में तनाव बढ़ने के साथ यह निर्भरता अफगानिस्तान के लिए परेशानी बनती गई है. सीमा बंद होने या व्यापारिक आवाजाही रुकने पर सामान फंस सकता है, डिलीवरी में देरी होती है और कारोबारियों की लागत बढ़ जाती है.
अफगानिस्तान के उप-प्रधानमंत्री मुल्ला अब्दुल गनी बरादर ने कहा था कि पाकिस्तान पर सीमा बंदी को राजनीतिक दबाव के तौर पर इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है. उन्होंने व्यापारियों से वैकल्पिक रास्ता खोजने को कहा था. अफगानिस्तान के वाणिज्य मंत्री नूरुद्दीन अजीजी के मुताबिक, सीमा बंद होने से देश को हर महीने करीब 200 मिलियन डॉलर के व्यापारिक राजस्व का नुकसान हो रहा है.
आकड़े देखकर सब समझ जाएंगे
रिपोर्टों के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान पाकिस्तान के रास्ते होने वाला अफगान ट्रांजिट व्यापार घटकर 11,592 कंटेनर, करीब 367 मिलियन डॉलर रह गया. तालिबान के सत्ता में आने से पहले यह कारोबार करीब 89,000 कंटेनर और 5 अरब डॉलर के स्तर पर था. इन आंकड़ों के पीछे कई कारण हो सकते हैं, लेकिन सीमा बंदी और दोनों देशों के बीच तनाव भी इनमें शामिल है. ईरान पहले से ही अफगानिस्तान के लिए अहम व्यापारिक साझेदार है. रिपोर्टों के मुताबिक, अफगानिस्तान के कुल आयात में ईरान की हिस्सेदारी 31.3 फीसदी है, जबकि ईरान के सीधे और ट्रांजिट गलियारे मिलकर 48.6 फीसदी आयात संभालते हैं.
भारत के लिए चाबहार क्यों अहम है?
इस पूरी कवायद में भारत का भी महत्वपूर्ण हित जुड़ा है. चाबहार बंदरगाह भारत को ईरान के रास्ते अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक व्यापारिक पहुंच बनाने का विकल्प देता है. अगर अफगानिस्तान चाबहार में अपनी व्यापारिक सुविधाएं विकसित करता है, तो भारत और अफगानिस्तान के बीच सामान की आवाजाही के लिए इस मार्ग का इस्तेमाल बढ़ सकता है. इससे अफगान निर्यात को भारत और दूसरे बाजारों तक पहुंचाने में भी मदद मिल सकती है.