नैनीताल: अक्सर शनि नाम से ही बेहद डरावने ग्रह की कल्पना होती है. हिंदू मान्यताओं में शनि की दशा से हर कोई बचना चाहता है या यूं कहें इससे खौफ खाता है. क्योंकि शनि कब, कौन सी चाल चल जाए कुछ नहीं पता और ग्रहों की दशा कब बन और बिगड़ जाए इसका भी कुछ नहीं पता. इसलिए लोग शनि को मनाने में जुटे रहते थे. वो भी पूजा-पाठ, दान-पुण्य के जरिए.
लेकिन उत्तराखंड के नैनीताल जिले में कुछ लोग शनि को लेकर ही भिड़ गए हैं. उन्होंने शनि के खौफ से बेखौफ होकर शनि के खिलाफ ही झंडा बुलंद कर डाला है. और शनि को अतिक्रमणकारी तक बता डाला है. यहां कुछ लोगों पर ‘शनि’ ऐसा चढ़ा है कि उसके कारण आपस में भिड़ंत तक हो गई है. बात एक-दूसरे के साथ गुत्थमगुत्था होने के साथ ही प्रशासनिक शिकायतों और कानूनी लड़ाई तक भी पहुंच गई है.
क्यों ‘शनि’ के चक्कर में गुत्थमगुत्था हो रहे हैं लोग
दरअसल, नैनीताल जिले के रानीबाग इलाके में गार्गी यानी गौला नदी के किनारे पवित्र चित्रशिला धाम है. ये धाम कत्यूरी राजवंश से जुड़ी पूज्य माता जिया से जुड़ा पवित्र धाम है. इसी धाम में बना एक शनि मंदिर विवाद की वजह बन गया है. मंदिर परिसर में अतिक्रमण के आरोपों को लेकर पहाड़ी आर्मी नाम के संगठन और शनि मंदिर समिति के बीच तनाव की स्थिति बन गई. जुलाई महीने से ये विवाद गहराया हुआ है.
देवी माता जिया रानी के पवित्र शिला से छेड़छाड़
पहाड़ी आर्मी संगठन के हरीश रावत की दलील है कि कत्यूरों की आराध्य देवी माता जिया के धाम में कुछ बाहरी लोगों ने शनि मंदिर का निर्माण कर डाला है. शनि मंदिर का निर्माण करने वालों ने जिया रानी गुफा और इसके ठीक सामने नीचे की तरफ बहने वाली गार्गी नदी के तट पर मौजूद जिया रानी की पवित्र घाघरानुमा शिला की मान्यता से छेड़खानी की है.
गुफा से होने वाले शिला दर्शन बंद हो चुके हैं
क्योंकि इन्होंने गुणा और पवित्र शिला के बीच खाली पड़ी जगह में विशाल शनि मंदिर का निर्माण कर डाला है. जिससे गुफा से होने वाले शिला दर्शन बंद हो चुके हैं. उनकी दलील है कि इससे कत्यूरों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची है. यही नहीं शनि मंदिर का निर्माण कराने वालों ने वहां मौजूद चित्रेश्वर मंदिर की बुनियाद और गुंबद से भी छेड़खानी कर डाली है. 29 अगस्त 2026 को ते पहाड़ी आर्मी ने शनिमंदिर को लेकर एक उग्र विरोध भी किया. जिसके बाद पुलिस ने इस मामले में कुछ लोगों को गिरफ्तार कर एफआईआर तक कर डाली.
प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग
मंदिर परिसर की जमीन और कथित अतिक्रमण को लेकर विवाद के बीच मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है. अब सभी की नजरें प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं कि जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और विवाद का समाधान किस तरह निकलता है. हालांकि शनिमंदिर समिति अतिक्रमण के आरोपों को नकार रही है. लेकिन स्थानीय जानकार बताते हैं कि पहाड़ों के मंदिरों में शनि मंदिरों की परंपरा नहीं रही है. यहां स्थानीय लोक देवताओं की परंपरा रही है.
शनि देव का मंदिर बनाने वालों ने मूल देवता का मंदिर ढका
चित्रशिला धाम में भी पिछले कुछ सालों में हल्द्वानी के कुछ लोगों ने मिलकर शनिमंदिर का निर्माण कर डाला. जिसे लोग पहाड़ की लोक मान्यताओं के खिलाफ मानते हैं. लोगों की दलील है कि किसी भी धाम में मूल देवता का मंदिर सबसे बड़ा और भव्य होता है. लेकिन शनि मंदिर बनाने वालों ने मूल देवता के मंदिर को ही ढक दिया है. और साजिशन मूल मंदिर और जिया रानी के धाम की पहचान बदलने की साजिश हो रही है. शुरुआती प्रशासनिक जांच में भी शनि मंदिर के स्ट्रक्चर को अवैध माना गया है.
इतिहास के पन्नों में मिलता है जिक्र
इतिहासकार प्रो. अजय रावत अपनी किताब उत्तराखंड के सांस्कृतिक इतिहास में इस धाम की तरफ इशारा करते हैं. वो लिखते हैं कि ‘भगवान शिव अपने दिव्य प्राकट्य के प्रसंग में कुर्मांचल द्वार रानीबाग से अंतरंग रूप से जुड़े हुए हैं. यह कस्बा काठगोदाम से लगा हुआ है जहां मैदान से आने वाली रेलवे लाइन समाप्त होती है. रानीबाग स्थान का नाम कत्यूरी राजवंश जिसने सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में राज्य किया था से सम्बन्धित एक रानी जियारानी के बाग (उद्यान) के नाम से पड़ा.
यहां स्थित ‘चित्रेश्वर महादेव’ मन्दिर आसमान की ऊंचाई को छूता हुआ अपने दिव्य प्रभाव के साथ यहां अविचल खड़ा होकर भगवान शिव के छत्र के रूप में खड़ा है. यह एक अति प्राचीन मन्दिर है जिसके पुजारी गोस्वामी लोग हैं और 1850 में गढ़वाल के श्रीनगर में स्थित कमलेश्वर मठ से यहां आए थे. मन्दिर के पुजारी प्रेमगिरि गोस्वामी के अनुसार यह मन्दिर पौराणिक काल से स्थित है, यद्यपि स्थापना समय का अभिलिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है. भगवान शिव यहां प्राथमिक रूप से योगेश्वर के रूप में पूजे जाते हैं. मन्दिर की वास्तुकला भी इसके पौराणिक काल से सम्बन्धित होने की पुष्टि करती है. वे यहां प्राचीन शिवलिंग के रूप में स्थापित हैं.