क्या है वैश्य टेकरी? सिंहस्थ के साथ CM मोहन यादव ने दिखाया इंटरेस्ट, बौद्ध धर्म-सम्राट से क्या है कनेक्शन

क्या है वैश्य टेकरी? सिंहस्थ के साथ CM मोहन यादव ने दिखाया इंटरेस्ट, बौद्ध धर्म-सम्राट से क्या है कनेक्शन


उज्जैन. उज्जैन में सिंहस्थ 2028 को लेकर तैयारियां चल रही है. सड़कों का चौड़ीकरण किया जा रहा है. इस बीच कई अन्य प्रोजेक्ट पर भी काम चल रहा है. इनमें से एक वैश्य टेकरी का खुदाई भी है. हालांकि, इसका सिंहस्थ 2028 से कोई कनेक्शन नहीं है, लेकिन एक बार फिर से चर्चा में है. दरअसल, आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (ASI), राज्य पुरातत्व विभाग और MANIT की एक ज्वाइंट टीम ने ज़मीन के नीचे दबी संरचनाओं का पता लगाने के लिए ग्राउंड-पेनिट्रेटिंग रडार (GPR) सर्वे किया है. खास बात यह है कि इसकी खुदाई 90 साल बाद हो रही है. 9 दशक पहले वैश्य टेकरी की खुदाई करते समय 9 कई मजदूर बेहोश हो गए थे. खुदाई के दौरान जहरीली गैस लीक हुई थी. इसके बाद से काम रोक दिया गया.

बौद्ध धर्म से जुड़ा है वैश्य टेकरी

वैश्य टेकरी बौद्ध धर्म से जुड़ा है. संभावना जताई गई है कि यह भारत का सबसे बड़ा स्तूप हो सकता है. इस हफ़्ते की शुरुआत में किया गया यह सर्वे उस जगह को फिर से समझने की दिशा में एक नया कदम है, जिसे 1938-39 की पुरातत्व रिपोर्ट में शायद अब तक का सबसे बड़ा स्तूप बताया गया था. रिपोर्ट के अनुसार, इस स्ट्रक्चर का व्यास लगभग 350 फ़ीट और ऊंचाई कम से कम 100 फ़ीट थी, जो सांची के महान स्तूप (जिसका व्यास लगभग 120 फ़ीट और ऊंचाई 54 फ़ीट है) से काफ़ी बड़ा है. वैश्य टेकरी को मौर्य काल, यानी लगभग तीसरी सदी ईसा पूर्व का बताया गया था.

इस प्रोजेक्ट में इंटरेस्टेंड हैं CM मोहन यादव

MANIT इस सर्वे और ज़मीन के नीचे के डेटा के विश्लेषण के लिए तकनीकी सहायता दे रहा है. यह पहल ऐसे समय में की जा रही है जब मध्य प्रदेश सरकार इस जगह पर पुरातत्व संबंधी खोज को फिर से शुरू करना चाहती है और मुख्यमंत्री मोहन यादव इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के इच्छुक हैं. GPR सर्वे शुरू करने से पहले, सिंह, कलेक्टर रोशन सिंह और ASI के सुपरिटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट शिवकांत बाजपेयी की अगुवाई वाली एक संयुक्त टीम ने भी इस जगह का दौरा किया था.

क्या है जीपीआर

GPR एक ऐसी तकनीक है जिसमें खुदाई किए बिना ज़मीन के नीचे दबी संरचनाओं, वस्तुओं और मिट्टी की परतों में बदलाव का पता लगाने के लिए हाई-फ़्रीक्वेंसी रेडियो तरंगों का इस्तेमाल किया जाता है.

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, सूत्रों के मुताबिक, ASI का क्षेत्रीय कार्यालय वैश्य टेकरी में खुदाई शुरू करने के लिए अपने मुख्यालय से मंज़ूरी का इंतज़ार कर रहा है. खुदाई शुरू होने से पहले ज़मीन के नीचे की स्थिति को बेहतर ढंग से समझने के लिए GPR सर्वे का इस्तेमाल किया जा रहा है. डेटा का विश्लेषण करके ज़मीन के नीचे दबी संभावित संरचनाओं और अन्य पुरातत्व संबंधी विशेषताओं की पहचान की जाएगी और यह तय करने में मदद मिलेगी कि खुदाई कहां सबसे ज़्यादा फ़ायदेमंद हो सकती है.

वैश्य टेकरी का स्ट्रक्चर

ग्वालियर पुरातत्व विभाग की 1938-39 की सालाना प्रशासनिक रिपोर्ट में वैश्य टेकरी को एक बड़े गोल टीले के तौर पर बताया गया था, जिसके चारों ओर आयताकार गड्ढा था. थोड़ी खुदाई से मुख्य स्तूप और दो छोटे स्तूपों के अवशेष मिले. रिपोर्ट में इसकी बनावट को अनोखी बनावट बताया गया है. ऐसी बनावट जो कहीं और नहीं मिलती. मुख्य स्तूप को अब तक का सबसे बड़ा ज्ञात स्तूप कहा गया. पुरातत्वविदों को असामान्य रूप से बड़ी ईंटें मिलीं, जिनमें से कुछ 22 इंच से ज़्यादा लंबी थीं. पंच-मार्क वाला सिक्का और अवंती का सिक्का भी इसके मौर्य काल के होने की पुष्टि करते हैं.

सम्राट अशोक ने बनवाया है ये स्तूप?

रिपोर्ट में कहा गया कि यह स्तूप सम्राट अशोक द्वारा बनवाए गए स्तूपों में से एक हो सकता है, हालांकि इसके संबंध को पक्के तौर पर साबित नहीं किया गया. इस जगह का संबंध प्राचीन बौद्ध साहित्य में बताए गए कनकगिरि विहार और संभवतः उज्जैन के बारे में चीनी यात्री ह्वेन त्सांग के वृत्तांत में बताए गए बड़े स्तूप से भी जोड़ा गया है. इन संबंधों को अभी पुरातत्व के नज़रिए से साबित किया जाना बाकी है. 1939 की खुदाई में एक अनोखी निर्माण तकनीक का पता चला. स्तूप का भीतरी हिस्सा कसकर दबाई गई स्थानीय मुरम मिट्टी से बना था, जबकि बाहरी हिस्सा मिट्टी के गारे में लगी बड़ी ईंटों से बना था. बाहरी ईंटों का ज़्यादातर हिस्सा गायब हो गया था, जबकि टीले का ऊपरी हिस्सा बह गया था.अधिकारियों का कहना है कि ताज़ा GPR सर्वे से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि नई खुदाई शुरू करने से पहले टीले के नीचे क्या बचा है.



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