क्या घड़ी में अब कभी 23:59:60 नहीं दिखेगा? क्यों खत्म हो सकता है एक्स्ट्रा लीप सेकंड का सिस्टम

क्या घड़ी में अब कभी 23:59:60 नहीं दिखेगा? क्यों खत्म हो सकता है एक्स्ट्रा लीप सेकंड का सिस्टम


Leap Second Earth Clock: ये बात तो आप जानते होंगे कि हर चार साल के बाद फरवरी महीने में एक दिन एक्स्ट्रा होता है. इस साल को लीप ईयर कहते हैं. ये वो साल होता है जब फरवरी का महीना 28 की बजाय 29 दिनों का होता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि धरती को सूर्य का एक चक्कर लगाने में लगभग 365 दिन और छह घंटे का समय लगता है. अगर हर चार साल में एक दिन नहीं बढ़ाया जाए, तो मौसमों के शुरू होने की तारीखें धीरे-धीरे बदलने लगेंगी. हजारों सालों से इस एक दिन को धरती के अपनी धुरी पर एक पूरा चक्कर लगाने के समय के रूप में परिभाषित किया जाता रहा है. लेकिन धरती के घूमने की गति पूरी तरह एक जैसी नहीं रहती है. समय को अधिक सटीक तरीके से मापने के लिए आधुनिक समय सिस्टम में धरती के घूमने को समय का आधार बनाना बंद कर दिया गया है.

बस इस एक बदलाव के कारण एक सेकंड की पुरानी परिभाषा और आज की परिभाषा के बीच अंतर पैदा हो गया है. कई सालों के दौरान आधुनिक टाइम सिस्टम और धरती की गति के बीच कुछ सेकंड का अंतर आ सकता है. इस समस्या को दूर करने के लिए समय की काउंटिंग करने वाले एक्सपर्ट्स ‘लीप सेकंड’ का इस्तेमाल करते हैं. जिस तरह लीप ईयर हमारे कैलेंडर को सूर्य के चारों तरफ धरती की परिक्रमा के हिसाब से सही रखता है, उसी तरह लीप सेकंड घड़ियों के समय को धरती के डेली रोटेशन की गति के साथ तालमेल में रखता है.

अक्टूबर 2026 में समय की काउंटिंग से जुड़े इंटरनैशनल संगठन अब लीप सेकंड जोड़ने की अपनी पॉलिसी को बदल सकते हैं. अंतरिक्ष विज्ञान में दिलचस्पी रखने वाले लोग जानते हैं कि फीजिक्स के रिसर्च में टाइम को मापना कितना महत्वपूर्ण है. समय मापने के तरीकों में बदलाव के साथ भौतिक विज्ञानियों के माप भी अधिक सटीक हुए हैं. मनुष्य समय मापने के लिए जिन सिस्टम का इस्तेमाल करता है, उनमें पिछले कुछ सौ सालों में बदलाव भी आया है.

24 घंटे के दिन की शुरुआत दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में प्राचीन मिस्र में मानी जाती है. उस समय दिन और रात, दोनों को 12-12 हिस्सों में बांटा जाता था. साल के दौरान दिन और रात की अवधि बदलती रहती है, इसलिए दिन के हर घंटे और रात के हर घंटे की अवधि भी अलग-अलग होती थी. दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में यूनानी खगोलशास्त्री हिप्पार्कस ने खगोलीय गणनाओं के लिए 24 बराबर घंटों वाला सिस्टम अपनाया.

एक घंटे को 60 मिनट और हर मिनट को 60 सेकंड में बांटने वाली सिस्टम की जड़ें भी खगोल विज्ञान में हैं. 60 के आधार वाले इस सिस्टम की शुरुआत मेसोपोटामिया की सुमेरियन और बेबीलोनियाई सभ्यताओं से हुई थी. ये 60 की संख्या खास तौर पर सुविधाजनक है क्योंकि इसे कई छोटी संख्याओं से बिना शेष के ही विभाजित किया जा सकता है.

यूनानी खगोलशास्त्री क्लॉडियस टॉलेमी ने करीब 150 ईस्वी में ग्रहों की गति मापते समय 60 के आधार वाली इस प्रणाली को अपनाया. उन्होंने कोण की हर डिग्री को 60 हिस्सों में और फिर इनमें से हर हिस्से को 60 छोटे हिस्सों में बांटा. बाद में लैटिन भाषा में इन हिस्सों को ‘पार्तेस मिनुटाए प्रिमाए’ (Partes Minutae Primae) यानी ‘पहले छोटे हिस्से’ और ‘पार्तेस मिनुटाए सेकुंडाए’ (Partes Minutae Secundae) यानी ‘दूसरे छोटे हिस्से’ कहा गया. इसी सिस्टम से आगे चलकर ‘मिनट’ और ‘सेकंड’ जैसे शब्द बने.

कई सदियों बाद, जब यांत्रिक घड़ियां अधिक सटीक होने लगीं, तो खगोल विज्ञान में इस्तेमाल होने वाले इन विभाजनों को समय मापने के लिए भी अपना लिया गया. टॉलेमी और उनके बाद के विद्वानों के सिस्टम के आधार पर एक औसत सौर दिन को 24 घंटे, हर घंटे को 60 मिनट और हर मिनट को 60 सेकंड में बांटा गया. इस तरह एक दिन में कुल 86,400 सेकंड होते हैं.

हालांकि समय को सही-सही मापना तभी संभव हुआ, जब क्रिस्टियान हाइगेंस ने 1657 में पेंडुलम वाली घड़ी का आविष्कार किया. इस घड़ी में एक पेंडुलम लटकता रहता है और नियमित गति से दाएं-बाएं होता रहता है. धरती के गुरुत्वाकर्षण में होने वाले अंतर को ध्यान में रखा जाए, तो समान लंबाई वाले सभी पेंडुलम एक तरफ से दूसरी तरफ होने में बराबर समय लेते हैं. इस तरीके से समय मापने का एक मानक स्थापित हुआ.

पेंडुलम वाली घड़ी की तरह वैज्ञानिकों ने अगले 300 सालों तक ऐसी सिस्टम डेवलप करने पर काम किया, जिनसे समय को सटीक और एक समान तरीके से मापा जा सके. इसका मकसद यह था कि दुनिया भर की सभी घड़ियां एक ही समय बताएं. इस प्रक्रिया में एक सेकंड की परिभाषा कई बार बदली गई. आखिरकार वैज्ञानिकों ने सीजियम परमाणु के आधार पर इसका समाधान खोजा.

साल 2022 में भार और माप पर सामान्य सम्मेलन में फैसला लिया गया था कि यूटीसी और यूटी-1 के बीच अधिकतम अंतर को 2035 तक या उससे पहले बढ़ाया जाना चाहिए. इसकी अधिकतम सीमा क्या होगी, इस पर 2026 की बैठक में सहमति बनाने की योजना थी.

इस फैसले को जल्द लेने की एक वजह यह है कि करीब 2015 से धरती असामान्य तरीके से तेज गति से घूम रही है. अगर धरती इसी तरह तेज गति से घूमती रही, तो समय की गणना करने वाले एक्सपर्ट्स को भविष्य में पहली बार नकारात्मक लीप सेकंड जोड़ना पड़ सकता है. इससे निपटने के लिए कंप्यूटर सिस्टम के पास कोई बड़े स्तर का पिछला अनुभव नहीं है. इसी कारण यह मुद्दा अब अधिक जरूरी हो गया है.

भार और माप पर सामान्य सम्मेलन की बैठक 13 से 15 अक्टूबर 2026 तक होगी. इसमें एक मसौदा प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है, जिसके तहत 20 मई 2027 से यूटीसी को लगातार चलने वाली समय सिस्टम बनाया जाएगा और उसमें अचानक लीप सेकंड जोड़ने की सिस्टम खत्म कर दी जाएगी.



Source link