Teen Aggression Parenting : महाराष्ट्र के सतारा जिले से एक ऐसी झकझोर देने वाली खबर सामने आई है. एक शिक्षक पिता ने टीवी देखने को लेकर हुए मामूली विवाद में अपनी 17 साल की बेटी की क्रिकेट बैट से मारकर हत्या कर दी. शुरुआती जांच में सामने आया कि मृतका मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं से जूझ रही थी, अत्यधिक मोबाइल और टीवी का इस्तेमाल करती थी, और कई बार आक्रामक होकर परिवार वालों पर हाथ भी उठा चुकी थी. यह घटना सिर्फ एक आपराधिक मामला नहीं है, बल्कि यह आधुनिक समाज, टूटते धैर्य और परिवारों के भीतर सुलग रहे मानसिक स्वास्थ्य के उस गंभीर संकट का आईना है, जिसके बारे में बात करना अब बेहद जरूरी हो गया है.
आज के समय में पेरेंटिंग (पैरेंटिंग) किसी तलवार की धार पर चलने जैसी हो गई है. एक तरफ माता-पिता पर दफ्तर, काम और परिवार की दोहरी जिम्मेदारी का तनाव है, तो दूसरी तरफ डिजिटल युग में पल रहे हमारे बच्चे स्क्रीन एडिक्शन, एंग्जायटी और कई तरह के मानसिक विकारों की चपेट में आ रहे हैं.
सतारा की इस घटना में पिता और मां दोनों शिक्षक थे. इसके बावजूद वे अपनी बेटी के मानसिक तनाव और आक्रामक व्यवहार को संभाल नहीं पाए. पुलिस के मुताबिक, लड़की को मनोचिकित्सक के पास ले जाया जा रहा था और उसे नियमित दवाइयां भी दी जा रही थीं. इसके बावजूद, एक दिन जब घर में टीवी देखने को लेकर बच्चों में झगड़ा हुआ और लड़की ने आपा खोकर पिता पर हमला करने की कोशिश की, तो शिक्षक पिता का भी धैर्य जवाब दे गया. गुस्से के उस चंद सेकंड ने एक भरापूरा परिवार को हमेशा के लिए तबाह कर दिया.
मनोवैज्ञानिक क्या कहते हैं? (Psychological Perspective)
मशहूर मनोवैज्ञानिकों और चाइल्ड बिहेवियर एक्सपर्ट्स का मानना है किशोरावस्था (Teenage) इंसानी जिंदगी का सबसे संवेदनशील दौर होता है. इस उम्र में हॉर्मोनल बदलावों के साथ-साथ पहचान की तलाश और बाहरी दबाव बच्चों के मानसिक संतुलन को बुरी तरह प्रभावित करते हैं.
“क्रोध और आक्रामकता हमेशा बदमाशी या जिद्दीपन का परिणाम नहीं होती. अक्सर यह उस गहरे मानसिक दर्द, लाचारी या एंग्जायटी का बाहरी प्रकटन होती है, जिसे बच्चा शब्दों में बयां नहीं कर पाता.” — डॉ. कार्ल रोजर्स (मनोवैज्ञानिक)
जब कोई बच्चा या किशोर अत्यधिक आक्रामक हो जाता है, तो इसका मतलब है कि उसका तंत्रिका तंत्र (Nervous System) और भावनात्मक नियंत्रण प्रणाली पूरी तरह थक चुकी है. ऐसे समय में अगर माता-पिता भी गुस्से या शक्ति प्रदर्शन से जवाब देते हैं, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती है. मनोवैज्ञानिक इसे ‘फाइट या फ्लाइट’ रिस्पांस कहते हैं—जब तनाव इतना बढ़ जाता है कि तार्किकता खत्म हो जाती है और केवल प्रतिक्रिया बचती है.
एक शिक्षक पिता ने टीवी देखने को लेकर हुए मामूली विवाद में अपनी 17 साल की बेटी की क्रिकेट बैट से मारकर हत्या कर दी. (AI Image)
टीनएजर्स के आक्रामक व्यवहार से निपटने के व्यावहारिक उपाय-
अगर आपके घर में भी किशोर उम्र के बच्चे हैं और उनका व्यवहार अचानक बहुत आक्रामक या चिड़चिड़ा हो गया है, तो हालात बिगड़ने से पहले इन बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है:
शारीरिक हिंसा या आक्रामकता पर तुरंत प्रोफेशनल मदद लें:
अगर बच्चा खुद को या परिवार के सदस्यों को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करता है, तो इसे केवल ‘बचपन की जिद’ या ‘मूड स्विंग’ न समझें. तुरंत किसी अच्छे मनोचिकित्सक (Psychiatrist) या काउंसलर से संपर्क करें.
स्क्रीन टाइम सीमित करें:
आज के समय में मोबाइल और सोशल मीडिया बच्चों के मस्तिष्क को गहराई से प्रभावित कर रहे हैं. अत्यधिक स्क्रीन यूज से डोपामाइन का असंतुलन होता है, जिससे बच्चे छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़े हो जाते हैं. घर में ‘नो-स्क्रीन जोन’ या समय सीमा तय करें.
खुद के गुस्से पर नियंत्रण रखें (पैरेंट्रल कूल-डाउन):
जब बच्चा आक्रामक हो, तो माता-पिता का शांत रहना सबसे बड़ा हथियार है. यदि पिता या मां भी उसी समय गुस्से में आ जाएंगे, तो बात बढ़ जाएगी. ऐसे में थोड़ी देर के लिए कमरे से बाहर चले जाना या स्थिति से हट जाना समझदारी है.
सजा नहीं, संवाद का रास्ता चुनें:
बच्चों को डांटने या मारने से उनके भीतर का डर और विद्रोह और बढ़ जाता है. उनकी बात को बिना जज किए सुनें. उन्हें यह अहसास कराएं कि आप उनके दुश्मन नहीं, बल्कि उनकी इस मुश्किल घड़ी में उनके सबसे बड़े मददगार हैं.
परिवार का सपोर्ट सिस्टम मजबूत करें:
मानसिक तनाव केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं है. पूरे परिवार को मिलकर इस चुनौती का सामना करना चाहिए. स्कूल, काउंसलर और डॉक्टरों के साथ लगातार संपर्क में रहें.
सबक जो हमें सीखने होंगे-
सतारा की यह घटना हमें चेतावनी देती है कि हमें अपने घरों के भीतर मानसिक स्वास्थ्य को लेकर संवाद का दायरा बढ़ाना होगा. गुस्से में उठाया गया एक कदम पल भर में सब कुछ छीन सकता है. माता-पिता होने के नाते धैर्य रखना, बच्चे के बदले हुए व्यवहार को समय रहते पहचानना और जरूरत पड़ने पर मेडिकल हेल्प लेना ही इस अंधेरे दौर से निकलने का एकमात्र रास्ता है.