9 अक्टूबर का दिन इतिहास के पन्नों में एक ऐतिहासिक तारीख के रूप में दर्ज हो गया. भारतीय मूल की दिग्गज न्यायविद और संयुक्त राष्ट्र (UN) की पूर्व मानवाधिकार प्रमुख नावी पिल्लई को वर्ष 2026 के ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया है. नावी पिल्लई को ये सर्वोच्च सम्मान अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने, रंगभेद के खिलाफ लड़ाई लड़ने और दुनिया के जंग में सबसे कमजोर तबकों के हक में निडर होकर आवाज उठाने के लिए दिया गया है. जब वो ‘संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र जांच आयोग’ की अध्यक्ष थीं, तब उन्होंने फर्स्टपोस्ट को एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू दिया था. जिसमें उन्होंने इजरायल-हमास जंग का सबसे खौफनाक चेहरा खोलकर रख दिया था.
इजरायली और फिलिस्तीनी महिलाओं की कहानियां
इंटरव्यू की शुरुआत में नावी पिल्लई ने दो महिलाओं की ऐसी कहानियां सामने रखीं, जिसने युद्ध की भयावोता को बेनकाब कर दिया है.
- पहली महिला (इजरायली): 7 अक्टूबर 2023 को नोवा म्यूजिक फेस्टिवल के पास इजरायली सड़क पर बंदूकधारियों का शिकार बनी.
- दूसरी महिला (फिलिस्तीनी): सुरक्षा बलों की हिरासत के दौरान कथित तौर पर दुर्व्यवहार और प्रताड़ना का शिकार हुई.
नावी पिल्लई ने दुख व्यक्त करते हुए कहा था, ‘हमें नहीं पता कि ये दोनों औरतें आज जिंदा भी हैं या नहीं. लेकिन जब कोई जंग शुरू होती है तो दुश्मन का शरीर सिर्फ एक हथियार या कब्जे की चीज बनकर रह जाता है’. उन्होंने कहा कि चाहे 1994 का रवांडा जनसंहार हो, बोस्निया का युद्ध हो या फिर आज का इजरायल-गाजा संघर्ष, युद्ध के दौरान बलात्कार और यौन हिंसा का इस्तेमाल एक घटिया हथियार की तरह किया जाता है.
हमास की क्रूरता: जब इंसानी गरिमा को कुचला गया
अपने इंटरव्यू में नावी पिल्लई ने 7 अक्टूबर के हमलों के दौरान हमास द्वारा की गई हिंसा को पूरी निष्पक्षता से सामने रखा था.
- व्यवस्थित हिंसा के सबूत: 7 अक्टूबर के दिन मारे गए लोगों, खास तौर पर महिलाओं के शव जिस हालत में मिले थे, वो साफ तौर पर यौन हिंसा की ओर इशारा करते हैं.
- बंधकों का दर्द: हमास के कब्जे से रिहा हुए बंधकों के बयानों का हवाला देते हुए पिल्लई ने कहा था कि सुरंगों में बंद महिलाओं और बच्चों को शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा. नावी पिल्लई ने कहा कि हमास ने महिलाओं के जिस्म को एक ‘ट्रॉफी’ की तरह इस्तेमाल किया, जो अंतरराष्ट्रीय कानून का खुला उल्लंघन है.
इजरायली सुरक्षा बलों की कार्रवाई और मानवाधिकारों की चिंता
अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में बात करते हुए नावी पिल्लई ने इजरायली सुरक्षा बलों की उन कार्रवाइयों पर भी चिंता जताई थी, जो संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों और जांच में सामने आई थीं. उन्होंने कहा था कि जिम्मेदार सेना से हमेशा अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करने की अपेक्षा की जाती है.
- कैदियों के साथ अनुचित व्यवहार: गाजा के सालाह अल-दीन स्ट्रीट जैसे विस्थापन मार्गों और जांच चौकियों पर फिलिस्तीनी नागरिकों के साथ हुए अनुचित व्यवहार और कपड़े उतरवाने की कई घटनाएं दर्ज की गईं.
- मानसिक प्रताड़ना: फिलिस्तीनी महिलाओं से जबरन उनका हिजाब या नकाब हटवाना उनके आत्मसम्मान पर चोट पहुंचाने जैसी बात थी.
- पुरुषों और युवाओं को निशाना बनाना: पिल्लई ने ध्यान दिलाया कि जहाँ हमास के हमलों का शिकार ज्यादातर औरतें हुईं, वहीं सुरक्षा बलों की हिरासत या जांच के दौरान फिलिस्तीनी पुरुषों और कम उम्र के लड़कों को कपड़े उतारकर लाइन में खड़ा करने जैसी स्थितियां पैदा की गईं, जिसका असर उन्हें मानसिक रूप से प्रभावित करने वाला था.
नावी पिल्लई ने कहा था, ‘हम सिर्फ तथ्यों को देखते हैं. युद्ध के मैदान में जब किसी भी नागरिक की लाचारी का फायदा उठाया जाता है या उनकी गरिमा को चोट पहुँचती है, तो ये सीधे तौर पर इंसानियत को शर्मसार करने जैसा है’.
‘जब आलाकमान आंखें मूंद ले’ : सिस्टम पर बड़ा सवाल
इंटरव्यू का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वो था जब नावी पिल्लई से पूछा गया कि क्या इन घटनाओं की जानकारी ऊपर बैठे बड़े सैन्य या राजनीतिक अधिकारियों को होती है?
नावी पिल्लई का जवाब बेहद सीधा और साफ था- ‘जब किसी भी सेना या संगठन के बड़े अधिकारी अपने तहत आने वाले लोगों द्वारा किए गए गलत व्यवहार या प्रताड़ना के मामलों को देखकर भी उन पर तुरंत कार्रवाई नहीं करते, तो अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत इसे ‘मौन सहमति’ या अनदेखी माना जाता है. अगर आप अपने लोगों के गलत आचरण पर समय रहते अनुशासन और सजा तय नहीं करते, तो इससे इस तरह के व्यवहार को अनजाने में बढ़ावा मिलता है’.
उन्होंने कहा था कि चाहे हमास के लड़ाके हों या इजरायली सुरक्षा बल, दोनों ही तरफ के अपने लोगों के गलत व्यवहार पर समय रहते कड़े और पारदर्शी कदम उठाने चाहिए थे.
नोबेल शांति पुरस्कार 2026: निष्पक्षता और निडरता का सम्मान
नावी पिल्लई का ये पुराना इंटरव्यू इस बात का जीता-जागता सबूत है कि उन्हें ‘नोबेल शांति पुरस्कार 2026’ क्यों दिया गया है. उन्होंने बिना पक्षपात के हमास को कठघरे में खड़ा किया और जब इजरायली सेना की तरफ से हुई गलतियों को भी सामने रखा.
80 के दशक को पार कर चुकीं नावी पिल्लई ने अपना पूरा जीवन रंगभेद के खिलाफ लड़ाई से लेकर अंतरराष्ट्रीय अपराध अदालत (ICC) और संयुक्त राष्ट्र में शांति और न्याय की स्थापना में बिता दिया.
शांति का एकमात्र रास्ता है ‘न्याय’
आज जब नावी पिल्लई को नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया है तो उनका ये इंटरव्यू दुनिया के तमाम ताकतवर नेताओं को एक बड़ा संदेश देता है. युद्ध भले ही बंदूकों से लड़े जाते हों, लेकिन युद्ध के दौरान भी अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मानवाधिकारों का सम्मान होना बेहद जरूरी है.