नई दिल्ली. साल 2026 में शेयर बाजार संकट के दौर से गुजर रहा है. कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी है. डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर है और विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) साल 2026 में अब तक 2.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बिकवाली कर चुके हैं. इन सबके चलते निफ्टी इस साल करीब 15% तक टूट चुका है. भारतीय शेयर बाजार के लिए यह कोई पहला झटका नहीं है. पिछले 26 वर्षों में दलाल स्ट्रीट ने डॉट-कॉम बबल (2000), वैश्विक वित्तीय संकट (2008), यूरोजोन कर्ज संकट (2011-12), कोविड-19 महामारी (2020) और रूस-यूक्रेन युद्ध (2022) के दौरान भी सेंसेक्स और निफ्टी में जोरदार गिरावट आई थी.
खास बात यह है कि भारतीय शेयर बाजार इन झटकों से न केवल उबरा बल्कि अपने पुराने रिकॉर्ड स्तर को तोड़कर नई ऊंचाइयां भी छुईं. हर संकट की वजह अलग रही और उससे उबरने में बाजार को 6 महीने से लेकर 3-4 साल तक का समय लगा. गिरावट से भले ही कुछ हफ्तों, महीनों या वर्षों तक चली, लेकिन मजबूत भारतीय अर्थव्यवस्था, घरेलू रिटेल निवेशकों की बढ़ती भागीदारी और कंपनियों के मजबूत वित्तीय प्रदर्शन ने हर बार बाजार को उबारने का काम किया है.
डॉट-कॉम बबल: 53 फीसदी टूटा निफ्टी, 46 महीनों में हुई रिकवरी
साल 2000 में आईटी शेयरों में आई भयानक तेजी अचानक हवा हो गई. दुनियाभर के शेयर बाजारों में हड़कंप मच गया. अमेरिकी नैस्डैक करीब 78% टूटा. भारतीय बाजार भी इस गिरावट से अछूते नहीं रहे. निफ्टी 53.5% और सेंसेक्स करीब 44% तक डूब गया. इस बड़े झटके से उबरने और अपने पुराने रिकॉर्ड स्तर को दोबारा छूने में भारतीय बाजार को लगभग 46 महीने का समय लगा. संकट के बाद बाजार से बिना मजबूत बिजनेस मॉडल वाली कंपनियां बाहर हो गईं और टीसीएस, इंफोसिस व विप्रो जैसी कंपनियों ने ठोस कैश फ्लो व ग्लोबल आउटसोर्सिंग पर ध्यान दिया. साथ ही स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं और ऑटोमोबाइल सेक्टर में आए बूम ने बाजार को केवल आईटी पर निर्भर रहने के बजाय बहु-क्षेत्रीय मजबूती दी.
| संकट का नाम व वर्ष | मुख्य कारण | बाजार में गिरावट (Peak to Trough) | रिकवरी का समय (Old Peak तक) | रिकवरी का टर्निंग पॉइंट |
|---|---|---|---|---|
| 1. डॉट-कॉम बबल (2000) | टेक कंपनियों के मूल्यांकन का बुलबुला फूटना | निफ्टी: -53.5% | 46 महीने | आईटी सेक्टर का कंसॉलिडेशन, मजबूत कैश फ्लो और इंफ्रास्ट्रक्चर बूम |
| 2. वैश्विक मंदी (2008) | लेहमैन ब्रदर्स का पतन और क्रेडिट क्रंच | निफ्टी: -59.9% | 2 से 3 साल | मजबूत घरेलू मांग, बैंक सुधार और सरकारी राहत पैकेज |
| 3. यूरोजोन संकट (2011-12) | यूरोपीय संप्रभु ऋण और बैंकों पर दबाव | निफ्टी: -28% | 6 महीने | निर्यात का गैर-यूरोपीय देशों में डाइवर्सिफिकेशन, RBI के लिक्विडिटी कदम |
| सेंसेक्स: -26% | (~180 दिन) | |||
| 4. कोविड-19 क्रैश (2020) | वैश्विक महामारी और लॉकडाउन का डर | निफ्टी: -39.6% | 8 महीने | ब्याज दरों में कटौती, डिजिटल बूम और रिटेल निवेशकों का ऐतिहासिक प्रवेश |
| 5. रूस-यूक्रेन युद्ध (2022) | कमोडिटी और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल | निफ्टी: -17% | 5 से 6 महीने | घरेलू रिटेल SIP निवेश और रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल की खरीद |
| 6. तिहरा संकट (2026) | $100+ क्रूड, 5%+ यूएस यील्ड, विदेशी बिकवाली | निफ्टी: -15% (अब तक) |
2008 की मंदी: 60 फीसदी टूटा सेंसेक्स
अमेरिकी निवेश बैंक लेहमैन ब्रदर्स के ढहने और दुनिया में कर्ज संकट गहराने से दुनिया भर में बिकवाली की आंधी चली. निफ्टी 59.9% और सेंसेक्स 60.9% तक टूट गया. इस दौरान विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से लगभग 15 अरब डॉलर निकाल लिए. इस मंदी से उबरने में भारतीय बाजार को 739 दिन लग गया. भारतीय बाजार पश्चिमी बाजारों की तुलना में तेजी से रिकवर हुआ. इसकी वजह यह थी कि भारत केवल निर्यात पर निर्भर नहीं था. घरेलू खपत, सरकारी राहत पैकेजों और बुनियादी ढांचे के प्रोजेक्ट्स ने देश की जीडीपी ग्रोथ को सहारा दिया. इसका परिणाम कंपनियों के नतीजों में दिखा और 2010 के अंत तक भारतीय बाजार दौड़ने लगा.
2011-12 का यूरोजोन संकट: सिर्फ 6 महीने में बाजार ने फिर भर ली उड़ान
यूरोप के कई देशों पर कर्ज न चुका पाने का संकट खड़ा हुआ तो वहां के बैंकिंग सिस्टम पर दबाव आ गया. थोड़े समय बाद इसकी चपेट में पूरी दुनिया आ गई. वैश्विक घबराहट के कारण निफ्टी करीब 28% और सेंसेक्स लगभग 26% लुढ़क गया. रुपया भी 23% तक कमजोर हो गया. इस संकट का असर भारत पर किसी घरेलू कमजोरी की वजह से नहीं बल्कि विदेशी निवेशकों के जोखिम से बचने की आदत के चलते था. भारत ने यूरोपीय देशों पर निर्भरता घटाकर अफ्रीका और आसियान देशों में निर्यात का दायरा बढ़ाया. भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार के घरेलू लिक्विडिटी उपायों की मदद से भारतीय शेयर बाजार ने महज 6 महीने में अपने पुराने शिखर को फिर से हासिल कर लिया.
2020 का कोविड क्रैश: 8 महीने में ‘V-शेप’ बाउंसबैक
कोरोना महामारी के आने पर बाजार ने इतिहास की सबसे तेज और डरावनी गिरावट देखी. महज 63 दिनों के भीतर निफ्टी करीब 40% और सेंसेक्स 38.5% गिर गया. मार्च 2020 में ही विदेशी निवेशकों ने 54,000 करोड़ रुपये की बिकवाली की. कोरोना का झटका पूरी दुनिया को लगा था. ऐसा लग रहा था जैसे भारतीय शेयर बाजार को संभलने में कई वर्ष लगेंगे. लेकिन, इस अभूतपूर्व झटके के बावजूद बाजार ने इतिहास की सबसे तेज V-शेप्ड रिकवरी दिखाई और केवल 246 दिन में अपने प्री-कोविड स्तर को पार कर लिया. ब्याज दरों में कटौती, वर्क फ्रॉम होम के चलते लाखों नए रिटेल निवेशकों की एंट्री और समझदार निवेशकों द्वारा डिस्काउंट पर की गई जमकर खरीदारी ने बाजार को नए सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंचा दिया.
2022 का रूस-यूक्रेन युद्ध
फरवरी 2022 में रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध छिड़ने से कच्चे तेल और कमोडिटी की कीमतें आसमान छूने लगीं, जिससे ब्रेंट क्रूड 78% चढ़ गया. इस दौरान निफ्टी करीब 17% और सेंसेक्स 18% तक टूटा, जबकि विदेशी निवेशकों ने अक्टूबर 2021 से जून 2022 के बीच करीब 32.5 अरब डॉलर निकाल लिए. लेकिन, भारतीय शेयर बाजार ने इस झटके को भी कुछ ही महीनों में सोख लिया. करीब 6 महीने में निफ्टी और सेंसेक्स अपने युद्ध पूर्व के स्तर पर आग गए. इस वापसी के असली हीरो भारतीय रिटेल निवेशक और म्यूचुअल फंड्स बने, जिन्होंने रिकॉर्ड एसआईपी (SIP) के जरिए घरेलू बाजार को टूटने नहीं दिया. वहीं भारत द्वारा रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदने के फैसले ने देश के आयात बिल और महंगाई को नियंत्रित रखा.
2026 में आया है तिहरा संकट
साल 2026 में बाजार के सामने तिहरी चुनौती खड़ी है, जिसमें 100 डॉलर पार करता क्रूड, 5% से ऊपर अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और रुपये में 6.5% तक की कमजोरी शामिल है. अकेले सितंबर में 6.1% की गिरावट के साथ निफ्टी इस साल 15% नीचे आ चुका है. विदेश निवेशक लगातार बिकवाल बने हुए हैं. हालांकि, घरेलू संस्थागत निवेशकों और रिटेल इन्वेस्टर्स का भरोसा अब भी भारतीय शेयर बाजार पर कायम है.
गिरावट आती है जल्द, रिकवरी में लगता है टाइम
पिछले बड़े झटकों का इतिहास बताता है कि शेयर बाजार जितनी तेजी से गिरता है, उतनी तेजी से हमेशा वापस नहीं आता. कोरोना के दौरान निफ्टी सिर्फ 63 दिनों में 39.6% गिर गया था. हालांकि, इसके बाद पुराने शिखर तक पहुंचने में 246 दिन लगे. डॉट-कॉम बबल के दौरान निफ्टी 588 दिन अपने निचले स्तर पर पहुंच गया. लेकिन पुराने स्तर पर लौटने में 773 दिन लगे. इसी तरह 2008 के संकट में बाजार 293 दिनों में गिरा और रिकवरी करने में 739 दिन लगे.