पटना: वक्त के साथ दुनिया बदली, लोगों की जरूरतें बदलीं और काम करने के तरीके भी बदल गए. कभी घरों में पीतल, तांबे जैसे अलग अलग धातुओं के बर्तनों की खूब अहमियत हुआ करती थी. शादी-विवाह से लेकर पूजा-पाठ तक, इन बर्तनों का इस्तेमाल आम था. समय बदला तो इनका इस्तेमाल कम होने लगा, लेकिन पुराने बर्तनों को फिर से चमकाकर नया जैसा बनाने का हुनर आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. पटना में कुछ ऐसे कारीगर परिवार हैं, जो पीढ़ियों से इस पारंपरिक काम को संभाले हुए हैं. पटना साइंस कॉलेज के सामने ऐसी कई दुकानें हैं जहां आज भी पीतल, तांबा और दूसरे धातुओं को चमकाने का काम होता है. खास बात यह है कि इस काम से जुड़ा परिवार अपनी चौथी पीढ़ी तक पहुंच चुका है.
1948 से जुड़ा है दुकान का इतिहास, चौथी पीढ़ी संभाल रही विरासत
पटना साइंस कॉलेज के सामने चल रही “सरदार जी का ब्राइट निकिल दुकान” का इतिहास साल 1948 से जुड़ा है यहां काम करने वाले किशोर कौशल बताते हैं कि उनका परिवार लंबे समय से इस पेशे में है. अब परिवार की चौथी पीढ़ी इस काम को आगे बढ़ा रही है. उनसे पहले परिवार की तीन पीढ़ियां इस काम से जुड़ी रहीं और अब वे खुद इस परंपरा को संभाल रहे हैं.
यहां पीतल और तांबे के पुराने बर्तनों की पॉलिश से लेकर सिल्वर, ब्रास और दूसरे धातुओं की सफाई और चमकाने तक का काम किया जाता है. शादी-विवाह के मौसम में जिन घरों में पुराने बर्तनों को दोबारा इस्तेमाल करने की तैयारी होती है, वहां से लोग इनमें चमक लाने के लिए पहुंचते हैं. वहीं, नवरात्र और दुर्गा पूजा के दौरान मां दुर्गा की प्रतिमाओं में इस्तेमाल होने वाले अस्त्र-शस्त्रों को चमकाने का काम भी यहां किया जाता है. यानी जिन बर्तनों या धातु की वस्तुओं की चमक समय के साथ फीकी पड़ जाती है, उन्हें यह कारीगर अपने हुनर से दोबारा चमकाने की कोशिश करते हैं.
एसिड से सफाई, फिर मशीन पर होती है डबल-ट्रिपल पॉलिश
पहले धातुओं और बर्तनों को चमकाने का काम काफी हद तक हाथों से किया जाता था. अब इस काम में मशीनों की मदद भी ली जा रही है. किशोर कौशल बताते हैं कि सबसे पहले धातु की सफाई की जाती है. इसके बाद उसे बफर मशीन पर लाकर पॉलिश किया जाता है. जरूरत के अनुसार धातु पर दो से तीन बार तक पॉलिश की जाती है. दुकान में लगी बफर मशीन और उसमें इस्तेमाल होने वाला ब्रश इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा हैं. मशीन की मदद से धातु की सतह को चमकाया जाता है. इससे पुराने बर्तनों की खोई हुई चमक काफी हद तक वापस लाई जा सकती है.
60 से 150 रुपये तक में चमक उठते हैं पुराने बर्तन
पुराने बर्तनों को दोबारा चमकाने के लिए बहुत ज्यादा खर्च करना जरूरी नहीं है. हालांकि, इसकी कीमत बर्तन के आकार और काम के हिसाब से तय होती है. किशोर कौशल ने बताया कि किसी बर्तन की पॉलिश के लिए 60, 80, 100 या 150 रुपये तक चार्ज किया जाता है. छोटा बर्तन होने पर खर्च कम होता है, जबकि बड़े बर्तन पर ज्यादा मेहनत और पॉलिश की जरूरत पड़ने पर कीमत भी बढ़ जाती है. ऐसे में जिन घरों में पुराने पीतल और तांबे के बर्तन रखे हैं, उनके लिए इन्हें फेंकने या नया खरीदने के बजाय दोबारा इस्तेमाल के लायक बनवाना एक शानदार ऑप्शन है.
कभी ठठेरी बाजार के नाम से पहचाना जाता था यह इलाका
इस दुकान और आसपास के इलाके का रिश्ता पुरानी पटना से जुड़ा है. दुर्गा पूजा के माता रानी की गद्दा पॉलिश करवा रहे विजय बताते हैं कि वे साल 1970 से इस दुकान को जानते हैं और पहले से यहां आते रहे हैं. उनके अनुसार, इस इलाके को कभी अफजलपुर ठठेरी बाजार के नाम से जाना जाता था. यहां धातुओं की पॉलिश का काम करने वाले कई लोग और परिवार हुआ करते थे.
महंगाई और घटते इस्तेमाल ने बढ़ाई मुश्किलें
एक तरफ जहां यह काम पीढ़ियों से चला आ रहा है, वहीं दूसरी तरफ इसकी मांग में कमी कारीगरों की चिंता बढ़ा रही है. किशोर कौशल बताते हैं कि अब पीतल और तांबे के बर्तनों का इस्तेमाल पहले की तुलना में कम हो गया है. ऐसे में पॉलिश का काम भी सीमित होता जा रहा है.
उन्होंने आगे बताया कि दुर्गा पूजा के आसपास करीब 10 दिनों तक काम अच्छा रहता है. इसके बाद शादी-विवाह के मौसम में कुछ काम मिल जाता है, लेकिन बाकी समय काम की कमी रहती है. महंगाई बढ़ने और सामान की कीमतें आसमान छूने के कारण भी मुश्किलें बढ़ी हैं.