खरगोन का सबसे पुराना तालाब! सालभर रहता है पानी, सैकड़ों गांवों के लिए वरदान

खरगोन का सबसे पुराना तालाब! सालभर रहता है पानी, सैकड़ों गांवों के लिए वरदान


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Khargone News: पहले गर्मी के दिनों में मंडलेश्वर तालाब (Mandleshwar Pond) का पानी सूख जाता था और अधिकांश इलाका खुल जाता था. किसान खाली जमीन पर गेहूं भी उगाते थे. वहीं तालाब मछली पालन के लिए भी जाना जाता रहा है. लगभग एक दशक पहले नहर का पानी तालाब तक पहुंचने के बाद इसकी स्थिति पूरी तरह बदल गई.

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खरगोन. मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में छोटे-बड़े कई तालाब और जलाशय हैं, जो खेती के साथ ग्रामीणों की जरूरतों को पूरा करते हैं. इन्हीं में मंडलेश्वर का तालाब भी प्रमुख है. मंडलेश्वर से करीब तीन किलोमीटर दूर जाम रोड स्थित ठनगांव फाटे के पास यह तालाब आजादी के बाद बने प्रमुख जलाशयों में सबसे पुराना तालाब है. इसका निर्माण 1951-52 के दौरान हुआ था. करीब 1.46 मिलियन क्यूबिक मीटर (MCM) क्षमता वाला यह तालाब आसपास के क्षेत्र के कई गांवों के लिए सदियों से सिंचाई का महत्वपूर्ण स्रोत रहा है. साथ ही यह जिले की धरोहर भी माना जाता है.

स्थानीय लोगों के मुताबिक, पहले गर्मी के दिनों में मंडलेश्वर तालाब का पानी सूख जाता था और अधिकांश क्षेत्र खुल जाता था. खाली जमीन पर किसान गेहूं भी उगाते थे. वहीं तालाब मछली पालन के लिए भी जाना जाता रहा है. करीब एक दशक पहले नहर का पानी तालाब तक पहुंचने के बाद इसकी स्थिति बदल गई. अब तालाब में सालभर पानी बना रहता है और किसानों को खेती के लिए सालभर सिंचाई का पानी उपलब्ध होता है.

सैकड़ों गांवों तक पहुंचता है पानी
तालाब से निकलने वाला पानी नालों और छोटी नहरों के जरिए आसपास के गांवों तक पहुंचता है. एक गांव से दूसरे गांव तक पानी पहुंचने की यह व्यवस्था खेती के लिए महत्वपूर्ण है. इससे कई क्षेत्रों के खेतों को सिंचाई का लाभ मिलता है. तालाब में पूरे साल पानी रहने से स्थानीय स्तर पर मछली पालन भी चलता रहता है. इससे जुड़े मछुआरे इसी काम से अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं.

पत्थरों से बना है तालाब का स्ट्रक्चर
तालाब के दक्षिणी हिस्से में पत्थरों से एक बड़ी दीवार बनाई गई है. इसके साथ बैकवॉटर और पानी के दबाव को नियंत्रित करने के लिए मजबूत स्ट्रक्चर तैयार किया गया है. जानकारों के मुताबिक, इस संरचना में पानी से बिजली उत्पादन की संभावना को ध्यान में रखकर भी व्यवस्था बनाई गई थी. कई दशक बीतने के बाद भी यह दीवार अपनी जगह पर मजबूत बनी हुई है. हालांकि अब इसके कुछ हिस्सों में मरम्मत की जरूरत महसूस होती है. साल 2023 में हुई तेज बारिश के दौरान जब तालाब पूरी तरह भर गया था, तब पानी का दबाव बढ़ने से दीवार के कुछ हिस्सों से पानी रिसने लगा था. इसके बाद जलाशय की संरचना और सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े हो गए थे.

डैम सेफ्टी एक्ट के तहत हुई तकनीकी जांच
तीन साल बाद बीते महीने डैम सेफ्टी एक्ट के तहत जिले के बड़े बांधों और जलाशयों की सुरक्षा को लेकर तकनीकी जांच की गई. केंद्रीय विशेषज्ञ दल ने करीब चार दिनों तक जिले के लगभग 10 से 12 बड़े बांधों का निरीक्षण किया. टीम ने जलाशयों के पुराने रिकॉर्ड, मौजूदा संरचना, बाढ़ क्षमता और पानी की निकासी व्यवस्था का परीक्षण किया.

बोल्डर टो से लेकर मिट्टी के हिस्से तक की जांच
तकनीकी टीम ने बांधों के बोल्डर टो, फिल्टर बॉडी, मिट्टी वाले हिस्से और स्टोन एजिंग सहित कई तकनीकी पहलुओं को देखा. जहां कटाव या किसी तरह की कमी दिखाई दी, वहां सुधार के सुझाव दिए गए. टीम ने 1951 से 2015 के बीच बने जलाशयों की स्थिति का निरीक्षण किया. इसमें 1951 में बना मंडलेश्वर तालाब सबसे पुराने जलाशयों में शामिल रहा. इसके अलावा खारक तालाब, देजला-देवड़ा तालाब, जीरभार, गारी-गलतार, अंबकनाला और गगन तालाब सहित 1957-58 के दौरान बने पुराने जलाशयों की संरचना का भी परीक्षण किया गया.



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