क्या है हिमाचल के प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां चिंतपूर्णी मंदिर की मान्यता, राजा दक्ष से क्यों नाराज हो गई थी सत्ती?  जानें कहानी

क्या है हिमाचल के प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां चिंतपूर्णी मंदिर की मान्यता, राजा दक्ष से क्यों नाराज हो गई थी सत्ती?  जानें कहानी


ऊना. नवरात्र जल्द ही शुरू होने वाले हैं. ऐसे में उत्तर भारत के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में शुमार मां चिंतपूर्णी का दरबार लाखों श्रद्धालुओं का तांता लगने वाला है. लोंगों की मंदिर के प्रति गहरी आस्था है. पंजाब, हरियाणा से लेकर  कई बॉलीवुड की हस्तियां में भी यहां पर नतमस्तक होती हैं.

दरअसल, हिमाचल प्रदेश के जिला ऊना में स्थित इस पवित्र धाम में वर्षभर देश-विदेश से श्रद्धालु मां के दर्शन करने पहुंचते हैं. विशेष रूप से पंजाब से आने वाले भक्तों की संख्या काफी अधिक रहती है. मान्यता है कि मां चिंतपूर्णी अपने भक्तों की चिंताएं दूर कर उनकी झोली खुशियों से भर देती हैं. यही कारण है कि मां के दरबार में श्रद्धा और विश्वास का सैलाब लगातार उमड़ता रहता है.

दरअसल, चांद के बिना चांदनी और आग के बिना ऊष्णता की कल्पना नहीं की जा सकती. इसी प्रकार भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में शक्ति को सृष्टि का आधार माना गया है. मां चिंतपूर्णी इसी आदिशक्ति का स्वरूप हैं. उन्हें भगवती छिनमस्तिका के रूप में भी पूजा जाता है. मां की जयंती के अवसर पर मंदिर को विशेष रूप से सजाने और श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित करने की परंपरा भी श्रद्धालुओं के उत्साह को बढ़ाती है.

राजा दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान

पौराणिक कथा के अनुसार, राजा दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान होने से आहत माता सती ने यज्ञ कुंड में अपने प्राण त्याग दिए थे. इससे क्रोधित भगवान शिव सती के शरीर को लेकर विचरण करने लगे. सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभिन्न भागों में विभाजित किया. मान्यता है कि जहां-जहां माता के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए. चिंतपूर्णी को वह पवित्र स्थान माना जाता है, जहां माता सती के चरण गिरे थे. वहीं धार्मिक मान्यताओं में माता चिंतपूर्णी का संबंध दस महाविद्याओं में वर्णित देवी छिन्नमस्ता से जोड़ा जाता है.

मां चिंतपूर्णी मंदिर के अंदर का नजारा.

मंदिर को लेकर एक और मान्यता

पौराणिक कथा के अनुसार, देवी ने अपनी सहेलियों की भूख शांत करने के लिए अपना मस्तक काट दिया और रक्त की धाराओं से उनकी क्षुधा शांत की. देवी के इस स्वरूप को त्याग, करुणा और शक्ति का प्रतीक माना जाता है. इसी मान्यता के कारण चिंतपूर्णी धाम को छिनमस्तिका धाम के नाम से भी जाना जाता है. मां चिंतपूर्णी के प्राकट्य से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध जनश्रुति भक्त माई दास से संबंधित है. मान्यता है कि माई दास को एक वटवृक्ष के नीचे कन्या रूप में मां ने दर्शन दिए और वहां पूजा-अर्चना शुरू करने का निर्देश दिया. आर्थिक संसाधनों और पानी की कमी की चिंता जताने पर मां ने भक्तों की सहायता से मंदिर निर्माण और भोग की व्यवस्था होने का आश्वासन दिया. तभी से यहां पिंडी रूप में माता की पूजा की जाती है.

माई दास के वंशज भी करते हैं पूजा

मंदिर के पुजारी संदीप कालिया बताते हैं कि माई दास के वंशज आज भी मंदिर की सेवा और पूजा-अर्चना से जुड़े हैं. मंदिर के समीप उनके परिवार से संबंधित समाधियां भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का विषय हैं. मंदिर के गर्भगृह में माता की पिंडी को फूलों और चांदी के छत्र से सजाया जाता है. मंदिर की स्थापत्य शैली, स्वर्णमंडित गुंबद और धार्मिक प्रतीक इसकी शोभा बढ़ाते हैं.

मां चिंतपूर्णी मंदिर का प्रवेश द्वार.

चारों दिशाओं में शिव मंदिरों का संरक्षण

मंदिर के पुजारी संदीप कालिया बताते हैं कि श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए परिसर में रेलिंग सहित विभिन्न व्यवस्थाएं की गई हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चिंतपूर्णी धाम को चारों दिशाओं में शिव मंदिरों का संरक्षण प्राप्त है. पूर्व में कालेश्वर महादेव, दक्षिण में शिवबाड़ी, उत्तर में मुचकुंद महादेव और पश्चिम में नारायण महादेव का उल्लेख मिलता है. वहीं, नवरात्र के दौरान मां की ज्योतियों की परिक्रमा से जुड़ी जनश्रुतियां भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहती हैं. मंदिर के पुजारी संदीप कालिया बताते हैं कि मां चिंतपूर्णी का धाम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था, विश्वास और भक्ति का प्रतीक है. भक्त इसी विश्वास के साथ यहां पहुंचते हैं कि मां उनके कष्ट दूर कर जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करेंगी.



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