WHO Childhood Obesity Guidelines: 17 करोड़ बच्चों पर मोटापे का खतरा, WHO को क्‍यों पहली बार जारी करनी पड़ी ‘बच्‍चों के मोटापे’ पर गाइडलाइन

WHO Childhood Obesity Guidelines: 17 करोड़ बच्चों पर मोटापे का खतरा, WHO को क्‍यों पहली बार जारी करनी पड़ी ‘बच्‍चों के मोटापे’ पर गाइडलाइन


दुनियाभर में मोटापा एक बड़ी परेशानी बनता जा रहा है. लेकिन बच्‍चों में मोटापा एक उभरती हुई खतरनाक समस्‍या है जो आने वाली पीढ़ी को बीमार कर रही है. लेकिन क्‍या छोटे बच्‍चों में भी दवाओं के जरिए मोटापा कम करने की कोशिश की जा रही है? यही वजह है कि बच्चों में बढ़ते मोटापे को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने पहली बार बच्चों और किशोरों के लिए मोटापा मैनेजमेंट की नई गाइडलाइन जारी की है. 7 अक्‍टूबर को जारी गाइडलाइन्स में WHO ने साफ कहा है कि 9 साल से कम उम्र के बच्चों को वजन घटाने वाली दवाएं या सर्जरी नहीं दी जानी चाहिए. वहीं 10 से 19 साल के किशोरों में भी ऐसी दवाओं और सर्जरी का इस्तेमाल केवल कुछ खास और गंभीर मामलों में ही किया जाना चाहिए. भारत में पिछले साल अक्‍टूबर में ही मोटापा कम करने वाली दवाओं को बाजार में उतारा गया है. ऐसे में ये जरूरी हो जाता है कि ऐसी दवाओं का इस्‍तेमाल 9 साल के कम उम्र के बच्‍चों पर न क‍िया जाए.

क्‍या कहती हैं ये नई गाइडलाइंस?

WHO ने 9 साल तक के बच्चों में वजन घटाने वाली दवाओं और बैरिएट्रिक सर्जरी (जैसे गैस्ट्रिक बायपास) के इस्तेमाल के खिलाफ सख्त सिफारिश की है. हाल के सालों में मोटापा कम करने वाली GLP-1 दवाएं जैसे ओजंपिक, वेगोवी और मॉनजारो काफी चर्चा में रही हैं. लेकिन WHO का कहना है कि बच्चों पर इन दवाओं के लंबे समय के प्रभावों को लेकर अभी पर्याप्त वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध नहीं है. इसलिए फिलहाल छोटे बच्चों में इनका उपयोग सुरक्षित नहीं माना जा सकता. WHO के न्यूट्रिशन एंड फूड सेफ्टी विभाग की निदेशक डॉ. लूज मारिया डी रेगिल के अनुसार इन दवाओं पर रिसर्च जारी है और भविष्य में नए सबूत मिलने पर इन गाइडलाइन्स में बदलाव किया जा सकता है.

WHO की नई गाइडलाइन: 9 साल से कम उम्र के बच्चों को वजन घटाने की दवाएं या सर्जरी नहीं

किन चीजों के खिलाफ है WHO?
WHO की इन नई गाइडलाइन्स के मुताबिक बच्‍चों में मोटापे से निपटने का सबसे सुरक्षित और असरदार तरीका बैलेंस डाइट, रोजमर्रा की जिंदगी में फिज‍िकल एक्‍ट‍िविटी और उनकी आदतों में बदलाव ही है. WHO ने उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों की समीक्षा करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि बच्चों और किशोरों में मोटापा कम करने के लिए सबसे पहले इन्हीं उपायों पर जोर दिया जाना चाहिए, न कि दवाओं या सर्जरी का रास्‍ता अपनाना चाहिए.

WHO का कहना है कि बचपन में मोटापे से जूझ रहे बच्चों को आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, फैटी लिवर और हृदय रोग जैसी बीमारियों का खतरा बहुत जल्दी हो सकता है. इसलिए शुरुआती उम्र में ही सही इलाज और लाइफस्‍टाइल में बदलाव जरूरी है. WHO ने बच्चों के लिए दी इस गाइडलाइन में हेल्‍दी और एक्‍टि‍व लाइफस्‍टाइल के साथ-साथ कम स्‍क्रीन टाइम और पूरी नींद लेने की बात भी कही है. बच्‍चों में बढ़ता स्‍क्रीन टाइम मोटापा बढ़ने की एक बड़ी वजह है.

बच्‍चों में मोटापे के ल‍िए कब दी जा सकती है दवाएं या सर्जरी?
WHO ने 10 से 19 साल के किशोरों में दवाओं और सर्जरी के इस्तेमाल की कुछ शर्तों के साथ इजाजत दी है. अगर क‍िसी मामले में मोटापा बहुत गंभीर स्तर का हो, टाइप-2 डायबिटीज. इंसुलिन रेजिस्टेंस या अनियंत्रित हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं मौजूद हों और कम से कम 6 महीने तक डाइट, एक्सरसाइज और जीवनशैली में बदलाव करने के बावजूद कोई फायदा न हुआ हो. तब डॉक्टर विशेषज्ञों की निगरानी में दवा या सर्जरी पर विचार कर सकते हैं.

गाइडलाइन जारी करने की जरूरत क्यों पड़ी?
WHO के आंकड़े बताते हैं कि बच्चों में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है और यह अब वैश्विक स्वास्थ्य संकट बनता जा रहा है. साल 2024 में दुनिया भर में 5 से 19 साल की उम्र के करीब 17 करोड़ बच्चे और किशोर मोटापे के साथ जी रहे थे. इनमें लगभग 7 करोड़ बच्चे 5 से 9 साल की उम्र के थे, जबकि 10 करोड़ किशोर 10 से 19 साल की उम्र के थे. सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि मोटापा अब केवल अमीर देशों की समस्या नहीं रहा. निम्न और मध्यम आय वाले देशों में इसकी रफ्तार कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रही है.

1990 से 2022 के बीच लड़कियों में मोटापे की दर लगभग 3 प्रतिशत अंक बढ़ी है.

भारत के लिए क्यों डराने वाली है यह चेतावनी?
भारत में भी बच्चों का मोटापा तेजी से बढ़ रहा है. द लैंसेट में प्रकाशित एक स्‍टडी बताती है कि 1990 से 2022 के बीच लड़कियों में मोटापे की दर लगभग 3 प्रतिशत अंक और लड़कों में 3.7 प्रतिशत अंक बढ़ी है. 1990 में भारत में जहां केवल लगभग 2 लाख लड़के और 2 लाख लड़कियां मोटापे से प्रभावित थे, वहीं 2022 तक यह संख्या बढ़कर 73 लाख लड़के और 52 लाख लड़कियां हो गई. कॉम्प्रिहेंसिव नेशनल न्यूट्रिशन सर्वे (CNNS 2016-18) के अनुमान के अनुसार भारत में 2030 तक 5 से 19 वर्ष की आयु के 2.7 करोड़ से अधिक बच्चे और किशोर मोटापे के साथ जी सकते हैं, जो दुनिया के कुल बोझ का लगभग 11% होगा. भारत में इंडियन सोसाइटी फॉर पीडियाट्रिक एंड एडोलसेंट एंडोक्रिनोलॉजी फिलहाल बच्चों और किशोरों में जीएलपी-1 दवाओं के इस्तेमाल के लिए दिशानिर्देश तैयार कर रही है. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि इन दवाओं का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल न हो, लेकिन जिन्हें इनकी जरूरत है उन्हें ये उपलब्ध भी रहें.



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