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यूपीआई पेमेंट पर MDR चार्ज को लेकर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने GST काउंसिल की बैठक में बड़ा अपडेट दिया है. उन्होंने साफ कहा कि बैठक में MDR पर कोई चर्चा नहीं हुई. हालांकि, CNBC-Awaaz को सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, 15 अक्टूबर से लागू होने वाली व्यवस्था को 1 जनवरी 2027 तक टालने पर विचार हो रहा है.
वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण.
यूपीआई पेमेंट चार्ज MDR लागू करने में क्या देरी होगी? क्या जीएसटी काउंसिल की मीटिंग में इस पर चर्चा हुई है? यही सवाल वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण से पूछा गया. उन्होंने कहा कि यह जीएसटी काउंसिल की मीटिंग है. इसमें एमडीआर पर कोई चर्चा नहीं हुई है. MDR जिसका विषय है, वो हैंडल करेंगे. हालांकि CNBC-Awaaz को सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, इसे अब 1 जनवरी 2027 से लागू करने पर विचार हो रहा है. अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है. रिपोर्टों के मुताबिक, 7 अक्टूबर को NPCI की अगुवाई वाली यूपीआई और सर्विस स्टेयरिंग कमेटी की बैठक में MDR लागू करने के समय को लेकर चर्चा हुई.
MDR लागू होने की तारीख ऐसे समय पर आगे बढ़ाने की चर्चा हो रही है, जब देश में त्योहारों का सीजन शुरू हो चुका है. अक्टूबर से दिसंबर तक दिवाली, छठ, क्रिसमस और दूसरे त्योहारों के दौरान बाजार में खरीदारी बढ़ जाती है और यूपीआई पेमेंट का इस्तेमाल भी काफी बढ़ता है. ऐसे में कारोबारियों की मांग है कि MDR को त्योहारों के बाद लागू किया जाए. रिपोर्टों के मुताबिक, 1 जनवरी 2027 को नई संभावित तारीख के तौर पर देखा जा रहा है.
7 अक्टूबर की बैठक में क्या हुआ?
मिली जानकारी के मुताबिक, 7 अक्टूबर को NPCI की अगुवाई में UPI और सर्विस स्टेयरिंग कमेटी के सदस्यों की बैठक हुई. इसमें MDR के प्रस्तावित फ्रेमवर्क और इसे लागू करने की टाइमिंग समेत कुछ मुद्दों पर चर्चा हुई. हालांकि, बैठक में अंतिम तौर पर यह फैसला नहीं हुआ कि MDR 15 अक्टूबर से हटाकर 1 जनवरी कर दिया गया है. यानी अभी इसे संभावित बदलाव ही माना जा रहा है. अंतिम फैसला NPCI और संबंधित पक्षों की तरफ से लिए जाने के बाद ही स्थिति साफ होगी.
आखिर MDR है क्या?
MDR वह शुल्क है जो डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने वाले कारोबारी की तरफ से पेमेंट सिस्टम में लिया जाता है. प्रस्तावित व्यवस्था में 2,000 रुपये से ज्यादा के कुछ UPI पर्सन टू मर्चेंट यानी ग्राहक से दुकानदार को किए जाने वाले पेमेंट पर 0.40% MDR लागू होना है. 75,000 रुपये या उससे ज्यादा के लेन-देन पर इसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये रखी गई है. यह शुल्क ग्राहक से सीधे वसूलने के बजाय पेमेंट सिस्टम में शामिल कारोबारी पक्ष पर लागू होता है.