Jalor News: मशीनों के दौर में भी जिंदा है हथकरघे की विरासत, लेटा गांव में पीढ़ियों से हाथों से बन रहे खेसले

Jalor News: मशीनों के दौर में भी जिंदा है हथकरघे की विरासत, लेटा गांव में पीढ़ियों से हाथों से बन रहे खेसले


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Jalore Khesla Industry: जालोर से करीब 7 से 8 किलोमीटर दूर स्थित लेटा गांव की पहचान पारंपरिक खेसला उद्योग से है. यहां कई पीढ़ियों से कारीगर हाथों से खेसले तैयार कर रहे हैं. स्थानीय भाषा में खेसला कहे जाने वाले ये कंबल 100 प्रतिशत शुद्ध कपास के धागों से बनाए जाते हैं. आधुनिक मशीनों के दौर में भी गांव के कारीगर अपनी पारंपरिक हथकरघा कला और पुश्तैनी हुनर को आगे बढ़ा रहे हैं.

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जालौर: जालोर के इस गांव की पहचान है खेसला उद्योग,पीढ़ियों से संभाल रहे हथकरघा की विरासत. जालोर से महज 7 से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित लेटा गांव की पहचान यहां के पारंपरिक खेसला उद्योग से है। गांव में कई पीढ़ियों से हाथों से खेसले तैयार किए जा रहे हैं. आधुनिक दौर में जहां मशीनों ने पारंपरिक कारीगरी की जगह ले ली है, वहीं लेटा में आज भी कारीगर अपने हाथों के हुनर से इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं.

स्थानीय भाषा में खेसला कहे जाने वाले ये कंबल 100 प्रतिशत शुद्ध कपास के धागों से तैयार किए जाते हैं. इनमें किसी अन्य तरह के धागे की मिलावट नहीं की जाती. यही वजह है कि इनकी अपनी अलग पहचान और उपयोगिता है.

सरकारी अधिकारी भी लेटा आकर इन खेसलों को खरीदते
स्थानीय निवासी शक्तिदान ने बताया कि खेसला बनाने का यह काम उनके गांव में कोई नया उद्योग नहीं है, कई पीढ़ियों से चला आ रहा पारंपरिक काम है. परिवारों ने इस हुनर को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाया है. लेटा के खेसलों की सबसे खास बात इनका हर मौसम में उपयोगी होना है. सर्दियों में ये गर्माहट देते हैं, जबकि गर्मियों में कपास की वजह से इनमें आराम और ठंडक का एहसास रहता है. यही कारण है कि स्थानीय लोगों के साथ-साथ बाहर से आने वाले लोग भी इन्हें पसंद करते हैं. यहां तक कि कई सरकारी अधिकारी भी लेटा आकर इन खेसलों को खरीदते हैं.

कारीगरों की मेहनत और हाथों का हुनर नजर आता
खेसलों को तैयार करने की प्रक्रिया भी अपने आप में खास है. सबसे पहले कपास के धागे तैयार किए जाते हैं. इसके बाद धागों को व्यवस्थित कर बुनाई के लिए लगाया जाता है. एक साथ बड़ी संख्या में धागों को करघे पर लगाकर कारीगर बारीकी से उनकी बुनाई करते हैं. हर खेसले में कारीगरों की मेहनत और हाथों का हुनर नजर आता है.

जालोर की स्थानीय पहचान का हिस्सा बन चुके
यहां से खेसलों के साथ चादर और तौलिए जैसे अन्य हैंडलूम उत्पाद भी तैयार किए जाते हैं. करीब 8 फीट लंबे और साढ़े 4 फीट चौड़े खेसलों की कीमत लगभग 500 से 1000 रुपए तक होती है. इनकी बिक्री स्थानीय स्तर पर होने के साथ ऑनलाइन माध्यम से भी की जा सकती है. लेटा का यह उद्योग केवल एक पारंपरिक कारीगरी नहीं, बल्कि गांव के कई परिवारों की आजीविका से भी जुड़ा है. घरों में रहकर महिलाएं और अन्य सदस्य भी इस काम में अपना योगदान देते हैं. इससे ग्रामीण परिवारों को रोजगार मिलता है और पारंपरिक हुनर भी जीवित रहता है. लेटा के खेसले आज जालोर की स्थानीय पहचान का हिस्सा बन चुके हैं.



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