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Saudi Arabia VS Houthi: सऊदी अरब के साथ मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट लागू करने की तुर्की की तैयारी को झटका लग सकता है. राष्ट्रपति एर्दोगन के सामने घरेलू मुश्किल खड़ी हो गई है. विपक्ष का कहना है कि संसद की मंजूरी के बिना तुर्की की सेना या सैन्य क्षमता विदेश नहीं भेजी जा सकती. विपक्ष संविधान के अनुच्छेद 90 और 92 का हवाला दे रहा है.
तुर्की के सामने बड़ी समस्या है.
Mecca Pact Turkey News: तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन खुद को इस्लामिक दुनिया का एक ताकतवर शख्स दिखाना चाहते थे. इसीलिए उन्होंने सऊदी और पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता किया था. लेकिन सऊदी अरब के साथ किया गया समझौता अब उनके लिए ही मुश्किल बनता दिख रहा है. पहले माना जा रहा था कि पाकिस्तान ही वह देश होगा जो सेना नहीं भेजेगा, लेकिन उसने अनुमानों को गलत साबित कर दिया है. पाकिस्तान ने सऊदी में अपने हजारों सैनिक और एयरफोर्स का एक स्क्वाड्रन भेज दिया है. हालांकि पाकिस्तान जैसे कंगाल मुल्क के लिए यह मजबूरी है, क्योंकि उसका फॉरेन रिजर्व सऊदी के पैसों से ही बचा हुआ है. वहीं तुर्की के लिए सेना भेजना एक संवैधानिक चुनौती बन गई है. तुर्की का विपक्ष सवाल उठा रहा है कि आखिर संसद की मंजूरी के बिना सेना या मिलिट्री से जुड़ी कोई भी चीन विदेश कैसे भेजी जा सकती है. मामला सिर्फ सेना भेजने का नहीं है. असली लड़ाई यह है कि फैसला पहले सरकार ले सकती है या विदेश में सैनिक भेजने का अधिकार संसद के पास रहेगा?
मक्का समझौता क्या है?
तुर्की का विपक्ष क्या कह रहा है?
तुर्की के मुख्य विपक्षी दल न्यू पार्टी के नेता ओजगुर ओजेल का कहना है कि यह समझौता अभी तक तुर्की की संसद यानी ग्रैंड नेशनल असेंबली में मंजूर ही नहीं हुआ है. उनका आरोप है कि सरकार संसद से मंजूरी लेने से पहले ही सैनिक भेजने की दिशा में आगे बढ़ रही है. विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने फैसला पहले ले लिया और संसद से बाद में पूछा जा रहा है. ओजेल का कहना है कि किसी ऐसे देश के साथ रक्षा समझौता करना जो पहले से युद्ध में है, तुर्की को भी उस संघर्ष का हिस्सा बना सकता है. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अगर तुर्की की सेना विदेश जाएगी तो इसके लिए संसद की अनुमति जरूरी है. इस विवाद को और राजनीतिक रंग तब मिला जब ओजेल ने कहा कि वह ऐसी किसी कोशिश को स्वीकार नहीं करते जिसमें तुर्की के सैनिकों को करीब 100 साल बाद फिर यमन भेजा जाए.
संविधान की दो धाराएं बनीं समस्या
विपक्ष ने तुर्की के संविधान के अनुच्छेद 90 और 92 को मुद्दा बनाया है. अनुच्छेद 90 को लेकर विपक्ष का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय समझौते को लागू करने के लिए संसद की मंजूरी जरूरी है. उसके बाद ही उसे आधिकारिक तौर पर लागू किया जा सकता है. वहीं अनुच्छेद 92 विदेश में तुर्की के सैनिकों की तैनाती से जुड़ा है. विपक्ष का कहना है कि किसी दूसरे देश की मदद के लिए सेना भेजने से पहले संसद की इजाजात जरूरी है. इसी आधार पर विपक्ष एर्दोगन सरकार पर संवैधानिक नियमों को दरकिनार करने का आरोप लगा रहा है.
क्या नाटो में भी फंस जाएगा मामला?
सऊदी अरब में तुर्की के सैनिकों को भेजने को लेकर जो विवाद है उसने एक और सवाल खड़ा कर दिया है. वह ये कि अगर कभी नाटो का आर्टिकल 5 एक्टिव होता है तो क्या तुर्की को इसी तरह की समस्या आएगी. नाटो का भी नियम है कि एक देश पर हमला, सभी पर अटैक माना जाएगा. नाटो के आर्टिकल 5 के मुताबिक सभी देशों को मिलकर हमला करने वाले पर अटैक करना होगा. लेकिन नाटो और मक्का पैक्ट के मामला में स्थिति अलग है. तुर्की 1952 से नाटो का सदस्य है. पहले से ही इस पर सहमति बनी हुई है. इसलिए उसमें अनुच्छेद 90 जैसे सवाल नहीं है. वहीं आर्टिकल 5 का मतलब यह नहीं कि ऑटोमैटिक कार्रवाई शुरू हो जाएगी. हर सदस्य वही कार्रवाई करता है, जो उसे आवश्यक लगे.