नई दिल्ली (Student Mental Health SOP Odisha). आज-कल की भागदौड़ भरी जिंदगी और पढ़ाई के भारी दबाव के बीच बच्चों की मेंटल हेल्थ पर बुरा असर पड़ रहा है. अक्सर लोग बच्चों के सुस्त रवैये या कम नंबर आने पर उन्हें ‘आलसी’ या ‘जिद्दी’ कहकर टाल देते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसके पीछे का असल कारण मानसिक तनाव या डिप्रेशन हो सकता है? इसी गंभीर मुद्दे को समझते हुए ओडिशा सरकार ने बेहद सराहनीय कदम उठाया है.
सबसे ऊपर है बच्चों की मेंटल हेल्थ
‘ऑपरेशनल गाइडलाइंस ऑन मेंटल हेल्थ एंड वेल-बीइंग ऑफ चिल्ड्रेन, एडोलसेंट्स एंड यंग एडल्ट्स’ रिपोर्ट पर बेस्ड इस एसओपी के तहत शिक्षकों और संस्थानों के कर्मचारियों को बच्चों के साथ बहुत संभलकर पेश आने के निर्देश दिए गए हैं. किसी भी छात्र को सबके सामने डांटना, हीनभावना पैदा करने वाले शब्द बोलना या अपमानित करना प्रतिबंधित कर दिया गया है. सरकार का मानना है कि बच्चों के अजीब व्यवहार या पढ़ाई में मन न लगने के पीछे छिपा हुआ मानसिक दबाव हो सकता है. इसे समय पर पहचानना जरूरी है.
अब बच्चों को ‘आलसी’ या ‘जिद्दी’ कहना मना है
ओडिशा सरकार की तरफ से जारी नई एसओपी के अनुसार, अब शिक्षक या स्कूल स्टाफ किसी भी छात्र को ‘आलसी’, ‘जिद्दी’ या अन्य अपमानजनक शब्दों से संबोधित नहीं कर पाएंगे. अक्सर बच्चे जब होमवर्क समय पर नहीं करते या क्लास में ध्यान नहीं देते तो उन्हें सबके सामने डांट दिया जाता है. सरकार का मानना है कि इस तरह के पब्लिक अपमान से बच्चों के मन में हीनभावना पैदा होती है. यह उन्हें डिप्रेशन की तरफ धकेल सकती है. इसके बजाय पॉजिटिव और आश्वस्त करने वाली भाषा का इस्तेमाल करना होगा.
दो हफ्तों के लक्षणों पर पैनी नजर
बच्चों के मानसिक तनाव को समय रहते पकड़ने के लिए एसओपी में खास नियम बनाया गया है. अगर कोई स्टूडेंट लगातार 2 हफ्तों से ज्यादा समय तक अत्यधिक उदास रहता है, डरा हुआ महसूस करता है, बिना बात के चिड़चिड़ा होता है या उसका व्यवहार हिंसक हो जाता है तो इसे सामान्य नहीं माना जाएगा. ऐसे मामलों को तुरंत गंभीरता से लेते हुए स्कूल प्रशासन स्टूडेंट की पहचान करेगा, उसे जरूरी काउंसलिंग देगा और जरूरत पड़ने पर एक्सपर्ट्स यानी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के पास भेजेगा.
ग्रीन, येलो और रेड जोन से तय होगी बच्चों की स्थिति
स्टूडेंट्स की मानसिक स्थिति का सटीक आकलन करने के लिए उन्हें 3 श्रेणियों- ग्रीन, येलो और रेड में बांटा जाएगा. इस कलर-कोडिंग सिस्टम के जरिए तय किया जाएगा कि किस बच्चे को सामान्य निगरानी की जरूरत है और किसे तुरंत मेडिकल या मनोवैज्ञानिक सहायता की. इसके अलावा, परीक्षा के भारी दबाव से निपटने के लिए बेहतरीन लाइफस्टाइल रूटीन सुझाया गया है. इसके तहत हर 25 मिनट की पढ़ाई के बाद 5 मिनट का ब्रेक लेने, गहरी सांस लेने का अभ्यास करने और भरपूर नींद लेने की सलाह दी गई है.
यूनिवर्सिटी में बनेंगे वेलनेस सेंटर
सिर्फ स्कूल ही नहीं, बल्कि उच्च शिक्षण संस्थानों यानी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के लिए भी गाइडलाइंस तय की गई हैं. यूनिवर्सिटी कैंपस में कई स्टूडेंट्स रैगिंग, भेदभाव, नशाखोरी, घर से दूर रहने का अकेलापन और रिश्तों में असफलता जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझते हैं. इन समस्याओं का समाधान निकालने के लिए हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में ‘मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण केंद्र’ (Mental Health & Wellness Centres) स्थापित करने की सिफारिश की गई है.
सरकार को उम्मीद है कि इन कदमों से शैक्षणिक संस्थानों का माहौल न सिर्फ स्ट्रेस फ्री बनेगा, बल्कि युवा मानसिक रूप से मजबूत और सुरक्षित भी महसूस करेंगे.