ईरान की महिलाएं अब अमेरिकी सैनिकों को अकेले ही निपटाने की तैयार कर रही हैं. वो जगह-जगह कंधे पर रखकर मिसाइल दागती नजर आ रही हैं, ड्रोन उड़ा रही हैं और कई खतरनाक हथियार एक हाथ से चलाती दिखाई दे रही हैं. ये तैयारी ईरान के दिल में घर चुके एक खौफ की वजह से चल रही है. IRGC को डर है कि अमेरिका किसी भी दिन अपने सैनिकों को ग्राउंड इनवेजन के लिए लिए भेज देगा. ऐसे में उन्हें शहरों की गली-गली में महिलाएं हथियार लिए खड़ी मिलेंगी. ईरान अब देश की महिलाओं और कम उम्र के युवाओं को सीधे मोर्चे पर उतारने के लिए सैन्य ट्रेनिंग दे रहा है.
‘जान फदा’ कैंपेन: महिलाओं के हाथों में कंधे से दागी जाने वाली मिसाइलें और ड्रोन
ईरान के सरकारी मीडिया द्वारा जारी की गई तस्वीरों और वीडियो ने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों को चौंका दिया है. तस्वीरों में ईरानी महिलाएं कंधे पर रखकर दागी जाने वाली मिसाइलों (MANPADS), असॉल्ट राइफलों और फाइटर ड्रोन्स के साथ मिलिट्री एक्सरसाइज करती नजर आ रही हैं.
ईरानी स्टेट मीडिया द्वारा सोमवार को जारी रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश भर के कई बड़े शहरों में महिलाओं के लिए विशेष सैन्य प्रशिक्षण शिविर चलाए जा रहे हैं. इस अभियान को ‘जान फदा’ यानी आत्म-बलिदान कैंपेन नाम दिया गया है.
- मीसाक (Misagh) मिसाइल सिस्टम की ट्रेनिंग: तस्वीरों में ईरानी महिलाएं ‘मीसाक’ मिसाइल सिस्टम को ऑपरेट करना सीख रही हैं. ये कंधे पर रखकर दागी जाने वाली सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल है, जिसका मुख्य इस्तेमाल कम ऊंचाई पर उड़ने वाले अमेरिकी जेट्स, हेलीकॉप्टरों और सुसाइड ड्रोन्स को मार गिराने के लिए किया जाता है.
- शहरी युद्ध और FPV ड्रोन चलाना: सिर्फ मिसाइल ही नहीं, बल्कि इन ट्रेनिंग कैंपों में महिलाओं को ऑटोमैटिक हथियारों से फायरिंग, FPV ड्रोन्स उड़ाना, अर्बन वॉरफेयर, ऊंची इमारतों से रस्सों के सहारे उतरना और जंगल में विपरीत परिस्थितियों में जिंदी रहने की ट्रेनिंग दी जा रही है.
- संकट प्रबंधन और फर्स्ट एड: इसके अलावा, युद्ध के दौरान घायलों को तुरंत चिकित्सा सहायता देने और संकट प्रबंधन की तकनीकें भी सिखाई जा रही हैं.
100 मिनट में 5 लाख रजिस्ट्रेशन: क्या है इस ‘नेशनल रेजिस्टेंस’ का सच?
‘जान फदा आंदोलन’ की प्रवक्ता सासन जारे ने ईरानी स्टूडेंट न्यूज एजेंसी से बात करते हुए दावा किया कि आत्म-बलिदान की ये भावना ईरानी संस्कृति का हिस्सा है. उन्होंने दावा किया कि ‘नेशनल रेजिस्टेंस’ बटालियनों के लिए जब रजिस्ट्रेशन खोला गया, तो महज 100 मिनट के भीतर 5,000,00 से अधिक महिलाओं ने खुद को पंजीकृत कराया, जिससे शुरुआती 1,000 सैन्य इकाइयां तुरंत भर गईं.
सासन जारे ने ये भी कहा कि सिर्फ ईरान ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी कई लोग संदेश भेज रहे हैं कि वे अमेरिका और इजरायली हुकूमत के खिलाफ इस जंग में ईरानियों के कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने के लिए तैयार हैं.
ईरानी कानून में महिलाओं की जगह और अचानक आया ये बदलाव
आमतौर पर कट्टरपंथी इस्लामिक कानूनों वाले देश ईरान में महिलाओं की सैन्य भूमिका बहुत सीमित रही है.
सेना में केवल मेडिकल पद: ईरान के आर्मी लॉ (Article 32) के मुताबिक, महिलाओं को सेना में केवल मेडिकल या स्वास्थ्य सेवा से जुड़े पदों पर ही काम करने की इजाजत है. उन्हें कॉम्बैट भूमिकाएं नहीं दी जातीं. बसीज का वैकल्पिक प्रशिक्षण: हालांकि, ईरानी संविधान के अनुच्छेद 151 के तहत ‘बसीज मुस्तजाफान’ यानी पैरामिलिट्री विंग को ये जिम्मेदारी दी गई है कि वे महिला नागरिकों को इच्छा के अनुसार बुनियादी सैन्य प्रशिक्षण दे सकते हैं.
अब तक केवल आपातकालीन प्राथमिक चिकित्सा या बैक-एंड सपोर्ट के लिए इस्तेमाल होने वाली महिलाओं को अब सीधे एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइलें और असॉल्ट राइफलें थमा दिया जाना ये दर्शाता है कि तेहरान की सरकार अंदर से कितनी घबराई हुई है.
सैनिकों की भारी किल्लत: क्या बच्चों को भी जंग में झोंक रहा है ईरान?
मिलिट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईरान द्वारा महिलाओं को आगे करने के पीछे सबसे बड़ी वजह नियमित सैनिकों की भारी कमी है. अमेरिकी और इजरायली हमलों में ईरान के कई प्रमुख सैन्य कमांडर्स, एयर डिफेंस बेस और IRGC के जवान घायल हुए हैं.
हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि ईरान पर अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन कर बच्चों को सेना में भर्ती करने के भी गंभीर आरोप लग रहे हैं. हाल ही में IRGC के एक अधिकारी रहीम नदाली ने माना था कि चेकप्वाइंट्स पर सुरक्षा बनाए रखने के लिए 12 साल और उससे अधिक उम्र के बच्चों को शामिल किया जा रहा है. हाल ही में चेकपॉइंट पर ड्यूटी के दौरान 11 साल के बच्चे अलीरेजा जाफरी की मौत की खबर ने भी इस बात की तस्दीक की थी.
अमेरिका के ‘ग्राउंड इन्वेजन’ का खौफ और अर्बन वॉरफेयर की तैयारी
ईरान की टॉप लीडरशिप को सबसे बड़ा डर इस बात का है कि अगर अमेरिका और उसके सहयोगी देश ईरान की सीमा के भीतर जमीनी सेना उतारते हैं, तो उनकी पारंपरिक सेना टिक नहीं पाएगी.
इतिहास गवाह है कि जब भी किसी देश पर जमीनी आक्रमण होता है, तो पारंपरिक सेना के पीछे हटने के बाद अर्बन वॉरफेयर शुरू होता है. ईरान की रणनीति साफ है, अगर अमेरिकी सैनिक ईरानी शहरों में घुसते हैं, तो वो वियतनाम या अफगानिस्तान की तरह हर घर, हर गली और हर महिला-बच्चे को एक हथियारबंद लड़ाके के रूप में खड़ा पाएंगे. ‘जान फदा’ कैंपेन का असली मकसद अमेरिकी सेना को ये संदेश देना है कि ईरान का हर नागरिक एक ‘ह्यूमन शील्ड’ और आत्मघाती लड़ाके की तरह मुकाबला करने को तैयार है.
क्या अमेरिका का सामना कर पाएंगी ईरानी महिलाएं
महिलाओं के हाथों में मिसाइलें और ड्रोन्स थमाकर ईरान भले ही अपनी ‘राष्ट्रीय भावना’ और ताकत का प्रदर्शन करने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन पर्दे के पीछे की सच्चाई ये है कि तेहरान की हुकूमत में अमेरिकी ग्राउंड इन्वेजन को लेकर गहरा खौफ बैठ चुका है. नियमित सैनिकों की कमी, आर्थिक बदहाली और चौतरफा घिरे होने के कारण अब आम नागरिकों, महिलाओं और बच्चों को युद्ध के मुहाने पर खड़ा किया जा रहा है. आने वाले दिनों में ये देखना बेहद अहम होगा कि क्या ईरान की ये ‘जन-प्रतिरोध’ रणनीति अमेरिका को जमीनी कदम उठाने से रोक पाएगी या फिर ये ईरान को एक और भयानक तबाही की ओर ले जाएगी.