‘पहले ही बोरियां लेकर जगह घेर लेते थे…’ पानी में डूबी पुरानी टिहरी की रामलीला की वो यादें, जिन्हें आज भी नहीं भुला पाए लोग

‘पहले ही बोरियां लेकर जगह घेर लेते थे…’ पानी में डूबी पुरानी टिहरी की रामलीला की वो यादें, जिन्हें आज भी नहीं भुला पाए लोग


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Old Tehri History: टिहरी बांध के जलाशय में पुरानी टिहरी भले ही हमेशा के लिए डूब गई, लेकिन वहां की यादें और संस्कृति आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं. देहरादून के टिहरी नगर में रहने वाले विस्थापित लोग हर साल रामलीला के जरिए अपनी जन्मभूमि से जुड़ी पुरानी यादों को फिर से जीते हैं. कभी पुरानी टिहरी के आजाद मैदान में होने वाली रामलीला अब देहरादून में मंचित होती है, जिसमें उसी शहर के मूल निवासी अलग-अलग किरदार निभाते हैं. किसी को बचपन की रामलीला याद आती है तो किसी को वह स्कूल और मैदान, जो आज पानी के नीचे हैं. जानिए कैसे एक रामलीला विस्थापित टिहरीवासियों के लिए अपनी खोई हुई जन्मभूमि, संस्कृति और पुरानी यादों को जिंदा रखने का जरिया बनी हुई है.

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देहरादून: टिहरी बांध के जलाशय में पुरानी टिहरी डूब गई, लेकिन वहां रहने वाले लोगों की यादों से यह शहर आज तक नहीं मिटा. जिन घरों, गलियों और स्कूलों में लोगों का बचपन बीता, वे आज पानी के नीचे हैं. बांध बनने के बाद हजारों परिवारों को अपना घर और जन्मभूमि छोड़कर दूसरी जगहों पर बसना पड़ा. देहरादून के टिहरी नगर में रहने वाले ऐसे ही परिवार आज भी पुरानी टिहरी को अपने साथ संजोए हुए हैं. शहर भले ही पीछे छूट गया, लेकिन वहां की संस्कृति, परंपराएं और बचपन की यादें आज भी लोगों के दिल में जिंदा हैं.

पुरानी टिहरी के आजाद मैदान में साल 1952 से रामलीला का मंचन होता था. धीरे-धीरे यह रामलीला टिहरी के लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन गई. रश्मि पांडे बताती हैं कि बचपन में रामलीला देखने के लिए वह पहले ही बोरियां लेकर पहुंच जाती थीं, ताकि भीड़ से पहले अपनी जगह बना सकें. आज वह आजाद मैदान पानी में डूब चुका है, लेकिन वहां से जुड़ी यादें अब भी उनके साथ हैं.

आंखें नम कर देती हैं पुरानी टिहरी की यादें
पुरानी टिहरी से विस्थापित महिला कीर्तिन मंडली ने रामलीला की इस परंपरा को देहरादून में भी जारी रखा है. यही वजह है कि मंचन के दौरान कई लोगों को अपना पुराना शहर और बचपन के दिन याद आ जाते हैं. अपने ददिहाल और मातृभूमि की याद आते ही आज भी कई लोगों की आंखें नम हो जाती हैं.

रामलीला में फिर लौट आते हैं पुराने दिन
देहरादून के टिहरी नगर में आगामी 11 अक्टूबर से इसी ऐतिहासिक रामलीला का मंचन होने जा रहा है. इसमें पुरानी टिहरी के मूल निवासी ही रामायण के अलग-अलग पात्र निभाएंगे. पिछले चार साल से लगातार यह रामलीला आयोजित की जा रही है. विस्थापित परिवारों के लिए यह सिर्फ रामलीला का मंचन नहीं है. इसके जरिए वे अपने पुराने दिनों और पुरानी टिहरी से जुड़ी यादों को फिर से जीते हैं. 62 वर्षीय सरिता भट्ट भी इस रामलीला का हिस्सा हैं. उनका बचपन जिस स्कूल में बीता था, वह स्कूल आज टिहरी झील के पानी के नीचे है. रामलीला में शामिल होकर उन्हें आजाद मैदान और पुरानी टिहरी के वे दिन फिर याद आते हैं.

पुरानी टिहरी की शैली को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश
इस रामलीला के जरिए टिहरी गढ़वाल की पारंपरिक शैली और संस्कृति को देहरादून में रहने वाली नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश भी हो रही है. सीता का किरदार निभाने वाली सरिता जुयाल बताती हैं कि उन्होंने सात साल की उम्र से रामलीला की यह शैली देखी है. उनके लिए जरूरी है कि पुरानी टिहरी की यह परंपरा आगे भी जारी रहे. सरिता जुयाल का कहना है कि रामायण में माता सीता के जीवन और संघर्षों से आज की पीढ़ी को भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है. उनके मुताबिक, इससे रिश्तों में बढ़ती दूरी और कम होती सहनशीलता के बीच परिवार और संस्कारों की अहमियत समझाने में मदद मिल सकती है.

संस्कृति बचाकर पुरानी टिहरी को जिंदा रखने की कोशिश
गुड्डू थपलियाल कहते हैं कि विस्थापन का दर्द और अपनी जन्मभूमि से बिछड़ने की पीड़ा बहुत गहरी होती है. टिहरी के लोग आज भी अपने आजाद मैदान को याद करते हैं, जिसे वह डूबने से नहीं बचा सके. लेकिन उनका मानना है कि अपनी संस्कृति, लोक परंपराओं और संस्कारों को बचाना उनके हाथ में है. देहरादून में होने वाली यह रामलीला उसी कोशिश का हिस्सा है. पुरानी टिहरी का शहर आज पानी के नीचे है, लेकिन वहां की यादें और संस्कृति आज भी लोगों के बीच जिंदा हैं. यही परंपराएं नई पीढ़ी को उस टिहरी से जोड़ रही हैं, जिसे उनके बुजुर्ग पीछे छोड़ आए थे.



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