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Sagar First Durga Puja: सागर के गोपालगंज स्थित बंगाली काली बाड़ी में 200 साल पहले 1827 में दुर्गा पूजन की शुरुआत की गई थी, जो परंपरा आज भी निरंतर चल रही है. यहां बंगाल से आए कारीगरों द्वारा हर साल प्रतिमा तैयार करवाई जाती है.
Sagar First Durga Puja: 11 अक्टूबर से नवरात्रि का त्योहार शुरू हो रहा है और शहर में इस बार 200 से अधिक जगहों पर दुर्गा प्रतिमाएं विराजमान करने की तैयारी चल रही है. दुर्गा पंडाल सजाई जा रहे हैं, जिसमें आकर्षक झांकियां तैयार की जाएंगी. लेकिन सागर में प्रतिमा विराजमान कर सबसे पहले दुर्गा पूजन कब हुआ, आज हम यही जानने की कोशिश करेंगे.
सागर के गोपालगंज में स्थित बंगाली काली बाड़ी में 200 साल पहले 1827 में दुर्गा पूजन की शुरुआत की गई थी जो आज भी निरंतर चल रही है. यहां पर षष्ठी से दशहरा तक 5 दिन के लिए देवी प्रतिमा को विराजमान किया जाता है. जिसमें बंगाली समाज के द्वारा एक जुट होकर पूजा अर्चना की जाती है. शहर के लोग भी दर्शन के लिए पहुंचते हैं. बंगाली काली ट्रस्ट के उपाध्यक्ष नील रत्न पात्रा बताते हैं कि अंग्रेजी शासन काल के दौरान बंगाल से बंगाली समाज के ऑफिसर सागर कैंटोनमेंट में आए थे, तब 1827 में ऑफिसरों की तरफ से यहां पर दुर्गा पूजन किया गया था. माना जाता है कि मध्य प्रदेश में सबसे पहले सागर में ही इस तरह से प्रतिमा विराजमान कर दुर्गा पूजन किया गया था. तब से लेकर अब तक बंगाली समाज की तरफ से बंगाल से ही कारीगरों को बुलाकर हर साल प्रतिमा तैयार करवाई जाती है और फिर उनका पूजन किया जाता है.
मूर्ति की स्थापना कब हुई थी
बंगाली काली ट्रस्ट के द्वारा 1990 में यहां पर मंदिर का निर्माण कर मूर्ति की स्थापना की गई थी. वहीं, पहले यह कंपाउंड शारदा मुखर्जी का हुआ करता था और उनके द्वारा ही यह जमीन ट्रस्ट को दान की गई थी लेकिन दान करने से पहले उन्होंने शर्त रखी थी कि यहां पर जो काली दुर्गा पूजा होता है वह बंद नहीं किया जाएगा वैसे तो नवरात्रि में यहां 5 दिन तक होता है लेकिन यहां पर जो मंदिर को कोलकाता के दक्षिणेश्वर की तर्ज पर हैं. यहां पर पूरी विधि विधान के साथ पूजन अर्चन किया जाता है चार समय पूजा होती है. 1827 में जिस स्थान पर दुर्गा पूजन हुआ था आज भी उसी जगह पर यह पूजन किया जाता है. महिषासुर मर्दानी के रूप में हर साल माता की प्रतिमा को विराजमान किया जाता है बंगाल से आए हुए कारीगर यह प्रतिमा तैयार करते हैं.
मंदिर के पुजारी जयेंद्र मिश्रा बताते हैं कि इस मंदिर में कोलकाता से आने वाले पंडित ही पूजा करते हैं. पूजन करने में लगभग 2 घंटे का समय लगता है. अष्टमी नवमी को विशेष पूजा होती है और इस दौरान जो एक 45 मिनट का समय संधि पूजन के लिए होता है. वह विशेष होता है और इस दौरान 64 योगिनी और चामुंडा देवी की पूजा की जाती है. 108 कमल की पुष्पांजलि दी जाती है. दुर्गा पूजन में यही सबसे विशेष होता है, यह जो संधि पूजन होता है इस पूजन से रोग कष्टों समस्याओं का निवारण होता है.