‘क्या पिता शिकायत करने पर बच्चे को भगा देता है?’ मुरली मनोहर जोशी बोले, छात्रों पर डंडे बरसाना सही तरीका नहीं


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Murli Manohar Joshi News: भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने छात्रों के लिए सरकारों और प्रशासन को संवेदनशील रुख अपनाने की दो टूक नसीहत दी है. उन्होंने कहा कि छात्रों की जायज मांगों को दबाने के बजाय उन्हें पूरी सहानुभूति के साथ सुना जाना चाहिए. लाठीचार्ज और बल प्रयोग किसी भी समस्या का स्थायी समाधान कभी नहीं हो सकता.

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'छात्र हमारे बच्चे हैं, उनपर डंडे बरसाना सही तरीका नहीं'Zoom

मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि छात्रों की बात सुनी जानी चाहिए. (फाइल फोटो)

नई दिल्ली. पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने 8 अक्टूबर को कहा कि छात्रों की मांगों को सहानुभूति के साथ सुना जाना चाहिए और बल प्रयोग सही नहीं है. जोशी ने यहां 21वें भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) उच्च शिक्षा सम्मेलन से इतर पत्रकारों से कहा कि छात्र ‘हमारे बच्चे’ हैं और उनके साथ उसी तरह व्यवहार किया जाना चाहिए.

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेता ने बढ़ते प्रदर्शनों के बारे में पूछे जाने पर कहा, “छात्रों की उचित या जायज मांगों को हमेशा और बहुत सहानुभूति के साथ सुना जाना चाहिए. लाठीचार्ज का तरीका सही नहीं है. इस तरह से कभी समाधान नहीं मिल सकता. अगर कोई समस्या है, तो उनकी बात सुनें. वे हमारे बच्चे हैं.”

उन्होंने कहा, “जब कोई बच्चा अपने पिता से शिकायत करता है कि आपने मुझे अमुक चीज दिलाने का वादा किया था तो पिता बताते हैं कि वह अपना वादा क्यों पूरा नहीं कर पाए और भरोसा दिलाते हैं कि वह जल्द ऐसा करेंगे… या क्या वह बच्चे को भगा देते हैं? इसी तरह छात्र हमारे बच्चे हैं और उनके साथ भी उसी तरह व्यवहार किया जाना चाहिए.”

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बारे में पूछे जाने पर पद्म विभूषण से सम्मानित जोशी ने कहा कि इसका सही मूल्यांकन करना अभी जल्दबाजी होगी. उन्होंने कहा, “एनईपी 2020 नई है… इसे लागू हुए अधिक समय नहीं हुआ है. इसे लागू करने का काम अभी जारी है तो इस चरण में हम इसके बारे में क्या कह सकते हैं? यह तो बस शुरुआत है. इसके नतीजे क्या होंगे, यह हमें बाद में पता चलेगा.”

मुरली मनोहर जोशी ने दो महीने पहले भी ऐसी ही चिंताएं जताई थी, जब राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) का प्रश्नपत्र लीक होने के कारण बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे जिसके परिणामस्वरूप तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा था.



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