एक महीने में 94 हमले और 105 मौतें: बलूचिस्तान में घिरी पाकिस्तानी सेना, मौत के डर से जवान छोड़ रहे नौकरी

एक महीने में 94 हमले और 105 मौतें: बलूचिस्तान में घिरी पाकिस्तानी सेना, मौत के डर से जवान छोड़ रहे नौकरी


Pakistan Army News: बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में लगातार हो रहे हमलों और भारी जनहानि ने पाकिस्तानी सेना के सामने गंभीर जनबल संकट खड़ा कर दिया है. हालात ऐसे बताए जा रहे हैं कि सुरक्षा प्रतिष्ठान को अब सेवानिवृत्त सैनिकों का सहारा लेना पड़ रहा है. फ्रंटियर कॉर्प्स, बलूचिस्तान (उत्तर) के इंस्पेक्टर जनरल की ओर से जारी आधिकारिक संदेश में रिटायर्ड सैन्यकर्मियों को तत्काल रिपोर्ट करने और दोबारा भर्ती होने के लिए कहा गया है. इसके लिए 30 अक्टूबर की समय-सीमा तय की गई है.

इस घटनाक्रम ने पाकिस्तानी सेना की जमीनी स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. एक अधिकारी के मुताबिक, BLA, BLF और TTP जैसे संगठनों के लगातार हमलों में सुरक्षा बलों को नुकसान उठाना पड़ा है, जबकि दूसरी ओर सैनिकों के नौकरी छोड़ने और लापता होने की बढ़ती घटनाएं भी सेना की मुश्किल बढ़ा रही हैं. यानी एक तरफ मोर्चे पर हमले तेज हैं और दूसरी तरफ फौज का अपना जनबल कमजोर पड़ता दिख रहा है.

अधिकारी का कहना है कि रिटायर्ड सैनिकों को वापस बुलाने का एक दूसरा कारण इन इलाकों में सैन्य अभियानों को तेज करने की तैयारी भी हो सकता है. BLA और BLF ने अपनी क्षमताएं बढ़ाई हैं और महिला आत्मघाती दस्तों के इस्तेमाल की घटनाएं भी सामने आई हैं. ऐसे में पाकिस्तान के लिए चुनौती सिर्फ हमलों का जवाब देना नहीं, बल्कि उनके खिलाफ लंबे ऑपरेशन चलाने के लिए पर्याप्त सैनिक जुटाना भी बन गई है.

आंकड़े इस संकट की गंभीरता की ओर इशारा करते हैं. अकेले सितंबर में अलगाववादी गुटों ने सुरक्षा बलों पर 94 हमलों का दावा किया. BLA ने इन हमलों में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के 105 जवानों को मार गिराने का दावा किया है. हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है. जानकारों के मुताबिक, अगर रिटायर्ड सैनिकों की तत्काल वापसी की जरूरत पड़ रही है तो यह पाकिस्तान के सुरक्षा तंत्र पर बढ़ते दबाव और उसके सामने खड़ी जनबल की चुनौती का संकेत हो सकता है.

अब पाकिस्तान के सामने बड़ा सवाल यह है कि वह लगातार बढ़ते हमलों का सामना मौजूदा सैन्य बल से करेगा या रिटायर्ड जवानों को वापस मैदान में उतारकर अपनी घटती सैन्य क्षमता की भरपाई करेगा. बलूचिस्तान से खैबर पख्तूनख्वा तक बढ़ती हिंसा ने पाकिस्तानी सुरक्षा प्रतिष्ठान के सामने एक ऐसा मोर्चा खोल दिया है, जहां चुनौती सिर्फ दुश्मन के हमले की नहीं, बल्कि अपने ही सैनिकों की उपलब्धता की भी है.

हालांकि संदेश में 30 अक्टूबर की समय-सीमा बताई गई है, लेकिन इसमें रिटायर्ड सैनिकों की वापसी को अनिवार्य नहीं किया गया है. साथ ही, वापस आने वालों के लिए कोई उम्र सीमा भी तय नहीं की गई है. वापस आने वालों को फायदा यह होगा कि उन्हें उनकी पिछली सर्विस के हिसाब से सैलरी दी जाएगी.

एक अन्य अधिकारी ने कहा कि हाल के वर्षों में पाकिस्तान अपने रिटायर्ड सैनिकों की मदद लेने की ओर तेजी से बढ़ा है. कई लोगों को लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के साथ मिलकर लड़ने के लिए शामिल किया गया है. अधिकारी ने कहा, “इसके पीछे की वजह यह है कि ये रिटायर्ड जवान अनुभवी हैं और तुरंत ऑपरेशन शुरू कर सकते हैं और उन्हें किसी खास ट्रेनिंग की जरूरत नहीं होती.”

केपी इलाके पर ध्यान देने से पहले, बलूचिस्तान के हालात को ठीक करने की पाकिस्तान कोशिश करेगा. बीएलए ने खास तौर पर चेकपोस्ट और मिलिट्री काफिलों को निशाना बनाया है; ऐसे हमलों में घात लगाकर किए गए हमलों से सुरक्षा बलों को भारी नुकसान पहुंचा है.

इन ग्रुप्स के हमलों की वजह से जवान मारे जा रहे हैं, और इसी वजह से रिटायर्ड जवानों को वापस बुलाया जा रहा है. तो दूसरी वजह नौकरी छोड़कर लापता होने वालों की बढ़ती तादाद है. कई जवानों ने या तो नौकरी छोड़ दी है या वे लापता हो गए हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि वे मारे जा सकते हैं. अधिकारी ने कहा, “उनका मनोबल गिरा हुआ है और वे अब लड़ना नहीं चाहते, इसलिए वे नौकरी छोड़ रहे हैं.”



Source link