सीतामढ़ी से अंधविश्वास की दिल दहला देने वाली तस्वीर सामने आई तो शासन-प्रशासन से लेकर मीडिया तक में खलबली मच गई. परिहार प्रखंड के महादेव पट्टी गांव के श्मशान घाट के वीडियो में साफ दिख रहा है कि एक तांत्रिक छोटे-छोटे बच्चों को पकड़कर घुमा रहा है, पटक रहा है और इसे इलाज बता रहा है. हालांकि, इसका वीडियो वायरल हुआ तो पुलिस हरकत में आई और आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन सवाल सिर्फ तांत्रिक का नहीं है, सवाल उन मां-बाप का भी है जो अपने जिगर के टुकड़ों को श्मशान में इस हाल में छोड़ आए.
वायरल वीडियो में साफ दिख रहा है कि श्रवण भगत उर्फ श्रवण महतो नाम का व्यक्ति 2 से 5 साल के बच्चों को हाथ-पैर पकड़कर हवा में घुमा रहा है. दावा है कि वह पिछले 4 साल से यही कर रहा है. बीमार बच्चों को ठीक करने के नाम पर श्मशान घाट में तंत्र-मंत्र. कोई बुखार से पीड़ित है, किसी को नजर लगी है, किसी को मिर्गी आती है और इलाज श्मशान में. सोचिए, जहां मुर्दे जलते हैं, वहां मासूमों की चीखें गूंज रही थीं और उन्हीं चीखों के बीच इलाज दावा किया जा रहा था. हालांकि, पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है और अगर जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो बच्चों के साथ इस तरह का व्यवहार करने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी भी तय होगी. लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता…
सवाल उन लोगों से भी है, जो अपने मासूम बच्चों को वहां लेकर गए. आखिर किसी माता-पिता को कैसे भरोसा हो सकता है कि बच्चे को हवा में घुमाने, झकझोरने या जमीन पर पटकने से उसकी बीमारी ठीक हो जाएगी? बीमारी चाहे बोलने की हो, सुनने की, चलने की या कोई दूसरी शारीरिक परेशानी, बच्चे के लिए उसका इलाज चाहिए, तंत्र-मंत्र का प्रयोग नहीं. खासकर तब, जब वह खुद यह तय करने की स्थिति में भी नहीं है कि उसके साथ क्या किया जा रहा है?
अंधविश्वास का फायदा कौन उठाता है?
स्थानीय लोगों से जो जानकारी सामने आई है इसके मुताबिक, महादेवपट्टी के श्मशान परिसर में करीब चार साल से सोमवार और शुक्रवार को इस तरह की गतिविधियां होने का दावा किया जा रहा है. बताया गया है कि श्रवण भगत बच्चों की अलग-अलग समस्याओं को तंत्र-मंत्र, झाड़-फूंक और टोटके से ठीक करने का दावा करता था. अगर यह दावा जांच में सही निकलता है तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतने लंबे समय तक यह सब कैसे चलता रहा? क्या हर बार बच्चे के माता-पिता खुद वहां पहुंचे? क्या आसपास के लोगों को इसकी जानकारी थी? क्या किसी ने कभी पुलिस, प्रशासन या स्वास्थ्य विभाग को इसकी सूचना दी?
माता-पिता की मजबूरी समझिए, लेकिन जिम्मेदारी भी
हालांकि, यह कहना आसान है कि माता-पिता ही दोषी हैं. लेकिन तस्वीर इतनी सीधी भी नहीं है. कई परिवार अपनी अज्ञानता के कारण बीमारी और मजबूरी के बीच ऐसे रास्तों पर चले जाते हैं. खासकर जब उन्हें लगता है कि डॉक्टरों के यहां अधिक खर्च होगा और डॉक्टरों से फायदा नहीं हुआ, या बच्चे की बीमारी ऐसी है जिसका इलाज आसानी से नहीं मिल रहा. इसी कमजोरी का फायदा अंधविश्वास फैलाने वाले लोग उठाते हैं. लेकिन मजबूरी किसी बच्चे की सुरक्षा से समझौते का लाइसेंस नहीं हो सकती. ऐसे में सबसे पहली जिम्मेदारी माता-पिता की है. वही अपने बच्चे को सुरक्षित रख सकते हैं. अगर कोई व्यक्ति इलाज के नाम पर बच्चे को चोट पहुंचाने जैसा व्यवहार कर रहा है तो वहां रुकने के बजाय तुरंत मदद लेना जरूरी है.
भीड़ खड़ी रही, किसी ने रोका क्यों नहीं?
इस पूरे मामले का एक और परेशान करने वाला पहलू वीडियो में दिखाई देने वाली भीड़ भी है. वहां लोग मौजूद थे और बच्चे के साथ यह सब होता रहा. ऐसे में समाज की भूमिका पर भी सवाल है. अगर कोई व्यक्ति किसी बच्चे को इस तरह घुमा रहा हो और आसपास खड़े लोग उसे इलाज मानकर देखते रहें, तो समस्या सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं रह जाती. सबसे चिंतनीय बात यह कि समाज के रूप में लोगों की सामूहिक चुप्पी भी अंधविश्वास को ताकत देती है.
पुलिस कार्रवाई के साथ जागरूकता भी जरूरी
पुलिस ने श्रवण महतो के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धाराओं और किशोर न्याय अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की है और मामले की जांच चल रही है. अब जांच में यह सामने आना चाहिए कि वहां कितने बच्चों को लाया गया, कौन-कौन लोग इसमें शामिल थे और क्या किसी बच्चे को चोट या स्वास्थ्य संबंधी नुकसान हुआ. लेकिन सिर्फ एक व्यक्ति पर कार्रवाई से यह समस्या खत्म नहीं होगी. जब तक बीमारी और अंधविश्वास के बीच का फर्क लोगों तक नहीं पहुंचेगा, तब तक ऐसे श्मशान, ऐसे भगत और ऐसे कथित इलाज फिर सामने आते रहेंगे.