पटना. बिहार की सियासत में 27 अक्टूबर का दिन बेहद अहम होने जा रहा है. विधान परिषद की आठ सीटों के लिए हुए चुनाव के नतीजे सामने आएंगे. इन परिणामों से भले ही बिहार की मौजूदा एनडीए सरकार की स्थिरता पर सीधा कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन सियासी तौर पर यह चुनाव कई बड़े नेताओं के लिए ‘लिटमस टेस्ट’ जरूर साबित हो सकता है. खासकर सम्राट चौधरी, निशांत कुमार, तेजस्वी यादव, प्रशांत किशोर और कांग्रेस नेतृत्व की राजनीतिक पकड़ का आकलन इस चुनाव के नतीजों से किया जाएगा.
कौन कहां से लड़ रहा एमएलसी चुनाव?
बता दें, बिहार की 8 सीटों में 4 स्नातक और 4 शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं. एनडीए ने सीटों का बंटवारा करते हुए 4 सीटों पर बीजेपी और 4 पर जेडीयू के उम्मीदवार उतारे हैं. बीजेपी की ओर से पटना शिक्षक सीट पर नवल किशोर यादव, कोसी स्नातक से डॉ. एनके यादव, दरभंगा स्नातक से सर्वेश कुमार और तिरहुत शिक्षक से नरेंद्र प्रसाद सिंह मैदान में हैं. वहीं जेडीयू ने पटना स्नातक से नीरज कुमार, तिरहुत स्नातक से अभिषेक झा, सारण शिक्षक से आनंद पुष्कर और दरभंगा शिक्षक से घनश्याम राय को उम्मीदवार बनाया है.
आरजेडी ने 6 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे हैं, जबकि कांग्रेस 5 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. जन सुराज ने सभी 8 सीटों पर उम्मीदवार उतारकर मुकाबले को और रोचक बना दिया है. आम आदमी पार्टी ने फिलहाल 4 सीटों पर उम्मीदवार घोषित किए हैं. तिरहुत शिक्षक सीट पर आरजेडी ने सीपीआई के संजय कुमार सिंह को समर्थन दिया है. इस चुनाव में सिर्फ विधान परिषद की 8 सीटों का सवाल नहीं है, बल्कि सम्राट चौधरी, तेजस्वी यादव, कांग्रेस और प्रशांत किशोर की राजनीतिक ताकत और रणनीति की भी परीक्षा होगी.
सम्राट चौधरी के लिए पहला बड़ा राजनीतिक टेस्ट
बिहार एमएलसी चुनाव का सबसे बड़ा सियासी इम्तिहान एनडीए और खासकर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए माना जा रहा है. सरकार की सेहत पर परिणाम का सीधा असर नहीं होगा, लेकिन चुनावी प्रदर्शन सरकार के राजनीतिक आत्मविश्वास को जरूर प्रभावित करेगा. अगर एनडीए आठ में से पांच या उससे ज्यादा सीटों पर जीत हासिल करता है तो इसे सम्राट चौधरी की अगुवाई में गठबंधन की मजबूत पकड़ के तौर पर देखा जाएगा. इससे बांकीपुर उपचुनाव के झटके की चर्चा भी कमजोर पड़ सकती है. वहीं, अगर एनडीए उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाता है तो विपक्ष को सरकार की लोकप्रियता और राजनीतिक मैनेजमेंट पर सवाल उठाने का मौका मिलेगा.
जेडीयू के लिए भी कम नहीं है चुनौती, निशांत के नेतृत्व पर कितना भरोसा?
इस चुनाव में जेडीयू की भी प्रतिष्ठा दांव पर है. पार्टी के चार उम्मीदवार मैदान में हैं. ऐसे में परिणाम सिर्फ जेडीयू की संगठनात्मक ताकत का आकलन नहीं करेंगे, बल्कि पार्टी के नए नेतृत्व और उसकी चुनावी स्वीकार्यता पर भी चर्चा शुरू कर सकते हैं. खास तौर पर निशांत की सक्रियता को देखते हुए जेडीयू के प्रदर्शन का राजनीतिक क्रेडिट उन्हें भी मिल सकता है. अगर जेडीयू अपने उम्मीदवारों को जीत दिलाने में सफल होती है तो यह निशांत के लिए सकारात्मक संकेत माना जाएगा. इसके उलट अगर पार्टी एक या इससे ज्यादा सीटों पर अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाती है तो नेतृत्व की रणनीति और जेडीयू की नई राजनीतिक दिशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
तेजस्वी के लिए भी प्रतिष्ठा की लड़ाई
बिहार एमएलसी चुनाव का नतीजा आरजेडी और तेजस्वी यादव के लिए भी महत्वपूर्ण है. विधानसभा चुनाव में करारी हार और बांकीपुर उपचुनाव में पार्टी के कमजोर प्रदर्शन के बाद अब आरजेडी इस चुनाव में कांग्रेस से अलग होकर कई सीटों पर मैदान में है. यही वजह है कि परिणाम को सिर्फ आरजेडी बनाम एनडीए के रूप में नहीं देखा जाएगा. यह तेजस्वी यादव के राजनीतिक प्रभाव और अकेले चुनाव लड़ने की रणनीति की परीक्षा भी होगी. अगर आरजेडी अपने हिस्से की सीटों पर मजबूत प्रदर्शन करती है तो इससे पार्टी का आत्मविश्वास बढ़ेगा और विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तेजस्वी के नेतृत्व को भी अब नई मजबूती मिलेगी. लेकिन खराब प्रदर्शन हुआ तो सहयोगी दलों के साथ-साथ पार्टी के भीतर से भी रणनीति पर सवाल उठ सकते हैं.
कांग्रेस ने अलग राह चुनी, अब परिणाम बताएगा दम
कांग्रेस ने इस बार तेजस्वी यादव के साथ चुनावी तालमेल से अलग होकर पांच उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं. बिहार की मौजूदा राजनीति में यह कांग्रेस के लिए महज सीटों का चुनाव नहीं है, बल्कि अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान दिखाने की कोशिश भी है. अगर कांग्रेस कुछ सीटें जीतने में सफल रहती है तो पार्टी इसे बिहार में अपनी वापसी की शुरुआत के तौर पर पेश कर सकती है. इससे आरजेडी पर निर्भरता कम करने की उसकी कोशिश को भी बल मिलेगा. लेकिन अगर पांचों सीटों पर पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहता है तो कांग्रेस की रणनीति पर सवाल उठेंगे और आरजेडी के साथ फिर से तालमेल की जरूरत की आवाज तेज हो सकती है.
प्रशांत किशोर की भी अग्निपरीक्षा
इस पूरे मुकाबले का सबसे दिलचस्प पहलू प्रशांत किशोर और जन सुराज का प्रदर्शन है. बांकीपुर उपचुनाव में जीत के बाद प्रशांत किशोर ने बिहार की राजनीति में अपने लिए एक अलग जगह बनाने का दावा मजबूत किया है. अब एमएलसी चुनाव में उम्मीदवार उतारकर उन्होंने सीधे तौर पर स्थापित राजनीतिक दलों को चुनौती दी है.
प्रशांत किशोर के लिए यह चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बांकीपुर की जीत को लेकर उठे सवालों का जवाब भी कहीं न कहीं इन परिणामों से मिलेगा. अगर जन सुराज कई सीटों पर प्रभाव डालता है या जीत दर्ज करता है तो प्रशांत किशोर को बिहार की राजनीति में एक नए और गंभीर खिलाड़ी के तौर पर देखने की चर्चा तेज होगी.
वहीं, अगर जन सुराज ज्यादातर सीटों पर कमजोर प्रदर्शन करता है तो विरोधियों को यह कहने का मौका मिलेगा कि बांकीपुर का परिणाम स्थानीय समीकरणों का नतीजा था और उसका असर पूरे बिहार में नहीं दिख रहा है. ऐसे में जन सुराज को मिली शुरुआती राजनीतिक ‘टॉनिक’ का असर भी सीमित होता नजर आ सकता है.
आठ सीटों का नतीजा, कई नेताओं के कद का पैमाना
इसलिए 27 अक्टूबर का एमएलसी चुनाव परिणाम सरकार बनाने या गिराने वाला चुनाव भले न हो, लेकिन बिहार की राजनीति में इसका संदेश काफी बड़ा हो सकता है. एनडीए के लिए यह सम्राट चौधरी की पकड़ और गठबंधन की मजबूती का संकेत देगा. जेडीयू के लिए नेतृत्व और संगठन की परीक्षा होगी. तेजस्वी यादव के लिए यह अकेले चुनावी रणनीति की कसौटी है. कांग्रेस के लिए अपनी जमीन तलाशने का मौका है और प्रशांत किशोर के लिए बांकीपुर के बाद अपनी राजनीतिक हैसियत साबित करने की अगली परीक्षा.
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आठ सीटों पर कौन जीतेगा. असली सवाल यह है कि 27 अक्टूबर के बाद बिहार की सियासत में किस नेता का कद बढ़ेगा और किसकी राजनीतिक रणनीति पर सवाल खड़े होंगे?