वर्ल्ड वार में खून के प्यासे जापान-अमेरिका, फिर कैसे बने जिगरी यार, अब किस बात पर तकरार

वर्ल्ड वार में खून के प्यासे जापान-अमेरिका, फिर कैसे बने जिगरी यार, अब किस बात पर तकरार


America Japan Relations: जापान के ओकिनावा में तैनात एक अमेरिकी मरीन पर एक जापानी महिला की हत्या करने के आरोप के बाद दोनों देशों के बीच संबंध तनाव पूर्ण हो गए हैं. जापानी प्रधानमंत्री सनाय ताकाइची ने इस हत्याकांड को जघन्य अपराध करार दिया है. साथ ही अमेरिका को चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि वह अपने नौसैनिकों को अनुशासन का पाठ पढ़ाए. इस हत्याकांड के आरोपी नौसैनिक को जापान ने गिरफ्तार भी कर लिया है. घटना को लेकर जापान में भारी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. दरअसल, दुनिया में जापान और अमेरिका के रिश्तों की दुहाई दी जाती है. ये वही दो देश हैं जो वर्ल्ड वार-2 के दौरान एक दूसरे के खून के प्यासे थे. वार के दौरान जापान ने 7 दिसंबर 1941 को अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर्ल हार्बर पर सबसे घातक हमला किया था जिसमें एक झटके में 2400 से अधिक नौसैनिक और आम लोग मारे गए.

वहीं इस हमले से बौखलाया अमेरिका शांत नहीं बैठा और वह भी द्वितीय विश्वयुद्ध में कूद गया. फिर उसने अगस्त 1945 में जापान के दो शहरों पर परमाणु बम गिरा दिए. इसमें हिरोशिमा और नागासाकी शहर पूरी तरह तबाह हो गए. हजारों की संख्या में लोग मारे गए. इस हमले ने जापान की कमर तोड़ दी. जंग में जापान हार गया और उसने अमेरिका के सामने सरेंडर कर दिया. लेकिन, इसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में तेजी से बदलाव हुए. जंग के तुरंत बाद जापान एक तरह से अमेरिका का गुलाम मुल्क बना लेकिन, चंद वर्षों परिस्थितियां ऐसी बदली की अमेरिका से लिए जापान एक जरूरत बन गया. फिर चीजें तेजी से बदलीं और बुरी तरह तबाह हो गया जापान जल्द ही आर्थिक सुपर पावर बनने की राह पर आ गया.

क्या है ताजा मामला

जापान टुडे वेबसाइट की एक रिपोर्ट के मुताबिक ओकिनावा के नाहा शहर में 20 साल के एक अमेरिकी मरीन पर 39 साल की जापानी महिला की हत्या का आरोप लगा है. जापानी पुलिस के मुताबिक महिला का शव एक होटल के कमरे में मिला था. पुलिस को आशंका है कि उसकी गला दबाकर हत्या की गई. आरोपी पर महिला का बटुआ चोरी करने का आरोप भी है. जापानी पुलिस ने अमेरिकी मरीन को गिरफ्तार कर लिया है. हालांकि आरोपी ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया है.

जापानी प्रधानमंत्री सनाय ताकाइची ने संसद में इस घटना को बेहद गंभीर बताते हुए इसे जघन्य अपराध करार दिया. उन्होंने अमेरिका से मामले की जांच में पूरा सहयोग करने और जापान में तैनात अमेरिकी सैनिकों में कड़ा अनुशासन सुनिश्चित करने को कहा है. जापान के मुख्य कैबिनेट सचिव मिनोरू किहारा ने भी कहा है कि टोक्यो अमेरिकी पक्ष से सैनिकों में अनुशासन सुनिश्चित करने की मांग जारी रखेगा.

जापानी संसद में पीएम सनाय ताकाइची अमेरिकी सैनिक के हाथों महिला की हत्या मामले पर बयान देती हुईं. फोटो- रायटर

जापान में कितने अमेरिकी सैनिक

आज जापान में करीब 54 हजार अमेरिकी सैन्यकर्मी तैनात हैं. इनमें करीब 18 हजार मरीन शामिल हैं. इन सैनिकों का बड़ा हिस्सा ओकिनावा में तैनात है. ओकिनावा का इतिहास इस मामले को और संवेदनशील बना देता है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह द्वीप अमेरिकी प्रशासन के अधीन रहा और 1972 में इसे जापान को वापस सौंपा गया. लेकिन अमेरिकी सैन्य अड्डे आज भी यहां बड़ी संख्या में मौजूद हैं. अमेरिकी सैनिकों से जुड़े यौन अपराध, मारपीट, सड़क दुर्घटनाओं और शराब पीकर गाड़ी चलाने जैसी घटनाएं लंबे समय से ओकिनावा में गुस्से की वजह रही हैं.

वर्ल्ड वार-2 के बाद कैसे बदले रिश्ते

1945 में जापान के आत्मसमर्पण के बाद अमेरिका के नेतृत्व में मित्र देशों ने जापान पर कब्जा कर लिया. अमेरिकी जनरल डगलस मैकआर्थर को जापान में मित्र देशों की सर्वोच्च कमान दी गई. लेकिन अमेरिका ने जापान को हमेशा के लिए दबाकर रखने की रणनीति नहीं अपनाई. जापान के सैन्य ढांचे को खत्म करने के साथ वहां लोकतांत्रिक व्यवस्था खड़ी करने की कोशिश शुरू हुई. 1947 में जापान का नया संविधान लागू हुआ. इसके अनुच्छेद 9 में युद्ध को संप्रभु अधिकार के तौर पर त्यागने और सैन्य ताकत के इस्तेमाल पर कड़े प्रतिबंध की व्यवस्था की गई. यानी जिस जापान ने कुछ साल पहले एशिया में बड़े पैमाने पर सैन्य विस्तार किया था, उसे युद्ध के बाद एक तरह से जापान, अमेरिका के रहमोकरम पर जिंदा रहा.

शीत युद्ध ने बदल दिया पूरा खेल

लेकिन, कुछ ही वर्षों में परिस्थितियां बदलने लगीं. 1949 में चीन में कम्युनिस्ट क्रांति की सफलता और 1950 में कोरियाई युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका को एशिया में नई चुनौती दिखाई देने लगी. अब वॉशिंगटन के लिए जापान को कमजोर रखना उतना जरूरी नहीं था, जितना उसे सोवियत संघ और चीन के प्रभाव के सामने एक मजबूत सहयोगी बनाना. इसी नीति को इतिहास में रिवर्स कोर्स के नाम से जाना जाता है. अमेरिका ने जापान की अर्थव्यवस्था को फिर खड़ा करने और उसे मजबूत करने पर जोर दिया. 1951 में सैन फ्रांसिस्को शांति संधि हुई, जो 1952 में लागू हुई और जापान की संप्रभुता बहाल हो गई.

इसी दौर में अमेरिका और जापान के बीच सुरक्षा संधि भी हुई. जापान अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिकी सैन्य ताकत पर निर्भर रहा और बदले में अमेरिका को जापान में सैन्य अड्डे रखने की अनुमति मिली. यानी दोनों देशों के बीच रिश्ता बदल चुका था. अमेरिका के लिए जापान अब दुश्मन नहीं, बल्कि एशिया में उसकी सैन्य और रणनीतिक ताकत का सबसे अहम आधार बन गया था.

कोरिया युद्ध बना टर्निंग प्वाइंट

1950 में कोरियाई युद्ध शुरू हुआ तो जापान की अर्थव्यवस्था को अचानक बड़ा फायदा मिला. कोरिया में लड़ रही अमेरिकी और संयुक्त राष्ट्र सेनाओं के लिए जापान एक अहम रसद और मरम्मत केंद्र बन गया. अमेरिकी सेना ने जापानी कंपनियों से बड़ी मात्रा में ट्रक, कपड़ा, मेटल प्रोडक्ट, कम्युनिकेशन उपकरण और दूसरी जरूरी चीजें खरीदनी शुरू कीं. इससे जापान की बंद पड़ी फैक्ट्रियों में फिर काम शुरू हुआ, रोजगार बढ़ा और उद्योगों को बड़ा बाजार मिला. जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिगेरू योशिदा ने कोरियाई युद्ध को अर्थव्यवस्था के लिए भगवान का वरदान तक कहा था. यही दौर आगे चलकर जापान के आर्थिक चमत्कार की नींव बना. टोयोटा जैसी कंपनियों समेत जापान का औद्योगिक क्षेत्र तेजी से बढ़ने लगा.

अमेरिकी सैनिकों के खिलाफ जापान में भारी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. फोटो- रायटर

अमेरिका की सुरक्षा, जापान का विकास

युद्ध के बाद जापान ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा अमेरिका के हवाले कर दिया. आगे चलकर इसको योशिदा सिद्धांत कहा गया. इसका सीधा फायदा जापान को मिला. जापान में सरकार ने अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए खूब पैसे खर्च किए. उसको सैन्य खर्च करने की जरूरत नहीं थी. ऐसे में उसके पास जो भी पैसा आता उसे अर्थव्यवस्था की मजबूती पर खर्च किया गया. सरकार ने निजी कंपनियों को फिर से खड़ी करने में भरपूर सहयोग दिया. इसके साथ ही तकनीक, शिक्षा और निर्यात पर भी खूब पैसे खर्च किए गए. दूसरी तरफ अमेरिका को पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में एक मजबूत सैन्य अड्डा और भरोसेमंद सहयोगी मिल गया. यही वजह है कि जिस जापान के शहरों पर अमेरिका ने परमाणु बम गिराए थे, कुछ ही दशकों में वही जापान अमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिमी आर्थिक और सुरक्षा ढांचे का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया.

फिर आज तकरार क्यों

यही इस रिश्ते का सबसे दिलचस्प पहलू है. अमेरिका और जापान आज रणनीतिक साझेदार हैं, लेकिन जापान में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को लेकर असंतोष कभी खत्म नहीं हुआ. खासकर ओकिनावा में अमेरिकी सैनिकों और स्थानीय आबादी के बीच तनाव की कहानी पुरानी है. जापान को अमेरिकी सुरक्षा की जरूरत है, लेकिन स्थानीय लोग अमेरिकी सैन्य अड्डों की वजह से होने वाली परेशानियों का विरोध करते रहे हैं. इसलिए मौजूदा हत्या का मामला सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं है. यह उस पुराने सवाल को फिर सामने ला रहा है कि जापान अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर कितना निर्भर रहे और इस सैन्य साझेदारी की कीमत स्थानीय लोगों को कितनी चुकानी पड़े.



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