BJD Joins Rahul Gandhi Opposition March: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार का मसला काफी गरमा गया है. विपक्ष ज्ञानेश कुमार से इस्तीफे की मांग कर रहा है. इस मांग को लेकर 6 अक्तूबर को दिल्ली में विपक्ष दलों के सांसदों ने संसद भवन से निर्वाचन भवन तक मार्च निकाला. इस दौरान पुलिस ने उनको बीच में ही रोक दिया. फिर विपक्ष के नेता राहुल गांधी इस मार्ग पर स्थित आकाशवाणी भवन परिसर में धरने पर बैठ गए. करीब नौ घंटे तक यह राजनीतिक ड्रामा चलता रहा. फिर दिल्ली पुलिस ने राहुल गांधी को हिरासत में ले लिया. इस दौरान विपक्षी सांसदों के मार्च में लंबे समय तक ओडिशा की सत्ता में रहे बीजू जनता दल (बीजेडी) भी शामिल हुआ. पार्टी चीफ नवीन पटनायक ने इस मार्च के लिए अपने दो राज्यसभा सांसदों को भेजा था. बीजेडी वही पार्टी से जिसका लंबे समय से भाजपा के साथ मित्रवत संबंध रहा है. केंद्र में पार्टी मुद्दों के हिसाब से एनडीए सरकार को समर्थन देती रही है. लेकिन, 2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के हाथों मिली बुरी हार के बाद पार्टी का रुख बदलने लगा है. इंडिया गठबंधन के सदस्यों के मार्च में बीजेडी के सांसदों के शामिल होने को इसी नजरिये से देखा जा रहा है.
भाजपा-बीजेडी की दोस्ती की कहानी
बीजेडी और भाजपा की दोस्ती करीब तीन दशक पुरानी है. बीजेडी की स्थापना 1997 में नवीन पटनायक ने अपने पिता और ओडिशा के दिग्गज नेता बीजू पटनायक की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए की थी. इसके कुछ ही समय बाद पार्टी ने भाजपा के साथ हाथ मिला लिया. 1998 और 1999 के लोकसभा चुनाव में दोनों दलों ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा. अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में बीजेडी भी शामिल हुई. ओडिशा में भी दोनों दलों का गठबंधन बना और 2000 के विधानसभा चुनाव में इस गठबंधन को बड़ी सफलता मिली. नवीन पटनायक पहली बार मुख्यमंत्री बने.
इसके बाद करीब 11 साल तक ओडिशा की राजनीति में भाजपा और बीजेडी साथ रहे. दोनों दलों ने मिलकर विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़े. केंद्र में भी बीजेडी ने एनडीए सरकार का समर्थन किया. लेकिन 2009 में रिश्तों में दरार आई. सीट बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच बात नहीं बनी और बीजेडी ने भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया. इसके बाद नवीन पटनायक ने अपनी राजनीति को कांग्रेस और भाजपा दोनों से बराबर दूरी बनाए रखने वाली राह पर आगे बढ़ाया. यही वह रणनीति थी जिसे बीजेडी ने लंबे समय तक समान दूरी की नीति के तौर पर कायम रखा. हालांकि इस दौरान जरूरत के हिसाब से पार्टी केंद्र की भाजपा सरकार के कुछ फैसलों का समर्थन करती रही.
दोस्ती टूटी, लेकिन रिश्तों में दूरी नहीं
भाजपा से औपचारिक गठबंधन खत्म होने के बावजूद नवीन पटनायक और नरेंद्र मोदी के रिश्तों में लंबे समय तक एक सहजता दिखी. संसद में कई अहम मौकों पर बीजेडी ने मोदी सरकार का साथ दिया. बीजेडी के लिए यह रणनीति राजनीतिक रूप से भी फायदेमंद थी. ओडिशा में पार्टी भाजपा और कांग्रेस दोनों से अलग अपनी पहचान बनाए रखती थी, जबकि केंद्र में जरूरत पड़ने पर सरकार के साथ खड़ी हो जाती थी. लेकिन 2024 के चुनाव ने ओडिशा की पूरी राजनीति बदल दी.
नवीन पटनायक सत्ता से बेदखल
2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बीजेडी के 24 साल लंबे शासन को खत्म कर दिया. भाजपा ने राज्य में सरकार बनाई और नवीन पटनायक मुख्यमंत्री की कुर्सी से उतर गए. इसी चुनाव में लोकसभा स्तर पर भी बीजेडी को बड़ा झटका लगा. पार्टी एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी. ओडिशा की 21 लोकसभा सीटों में भाजपा ने 20 सीटें जीत लीं. यह बीजेडी के लिए सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं था. पहली बार उसे यह एहसास हुआ कि जिस भाजपा को वह लंबे समय से राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के साथ-साथ सहयोगी भी मानती रही, वही अब ओडिशा में उसकी सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है. इसके बाद नवीन पटनायक की रणनीति धीरे-धीरे बदलने लगी.
क्यों बढ़ रही दूरियां?
2024 के चुनाव के बाद बीजेडी ने संकेत दिया कि वह अब केंद्र की एनडीए सरकार को पहले की तरह मुद्दे के आधार पर समर्थन देने की नीति पर नहीं चलेगी. इसके बाद कई ऐसे मौके आए जब बीजेडी विपक्ष के साथ खड़ी दिखाई दी. जुलाई 2024 में पार्टी ने नीट के मुद्दे पर विपक्ष के साथ राज्यसभा से वॉकआउट किया. परिसीमन के मुद्दे पर भी नवीन पटनायक ने दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रीय दलों के साथ बैठक में हिस्सा लिया. बीजेडी ने केंद्र की नीतियों को लेकर भी सीधे सवाल उठाने शुरू किए. खनन से जुड़े कानून को लेकर नवीन पटनायक ने आरोप लगाया कि इससे ओडिशा के हित प्रभावित होंगे. उन्होंने इसके खिलाफ प्रदर्शन भी किया. यानी 2024 के बाद बीजेडी की राजनीति में एक बदलाव साफ दिखाई देने लगा. पहले जो पार्टी केंद्र के साथ टकराव से बचती थी, अब वह ओडिशा के अधिकार और क्षेत्रीय हितों के नाम पर भाजपा को घेरने लगी.
नवीन पटनायक करीब 24 सालों तक ओडिशा के सीएम रहे. फोटो- पीटीआई
चुनाव आयोग पर भी बीजेडी नाराज
बीजेडी के लिए चुनाव आयोग का मुद्दा भी अहम है. पार्टी ने 2024 के विधानसभा और लोकसभा चुनाव के दौरान मतदान और मतगणना से जुड़े कुछ आंकड़ों को लेकर सवाल उठाए थे. बीजेडी नेताओं ने बूथ पर पड़े वोटों और ईवीएम में गिने गए वोटों के आंकड़ों के बीच अंतर, लोकसभा और विधानसभा चुनाव में मतदान के आंकड़ों में अंतर और मतदान के दिन जारी आंकड़ों तथा बाद में जारी अंतिम आंकड़ों के बीच अंतर जैसे मुद्दे उठाए थे. पार्टी का कहना रहा कि उसने चुनाव आयोग से इन मामलों पर जवाब मांगा, लेकिन उसे संतोषजनक जवाब नहीं मिला.
अब जब विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल रहा है और एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहा है, तो बीजेडी का इसमें शामिल होना उसके पुराने रुख से बड़ा बदलाव माना जा रहा है. नवीन पटनायक ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग का भी समर्थन किया है. इसी के बाद उन्होंने राज्यसभा में पार्टी के नेता मनस मंगराज और सांसद सुलता देव को विपक्ष के मार्च में भेजा.
बीजेडी के राज्यसभा नेता मनस मंगराज ने साफ किया कि उनकी पार्टी इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं बनी है. उनका कहना है कि बीजेडी एक जिम्मेदार विपक्षी दल के तौर पर इस प्रदर्शन में शामिल हुई है. यानी बीजेडी ने राहुल गांधी और विपक्षी दलों के साथ कदम जरूर मिलाया, लेकिन अभी उसने खुद को कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा घोषित नहीं किया है.
क्या कांग्रेस का साथ आएगी बीजेडी?
यही सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है. बीजेडी का मौजूदा रुख देखकर इतना जरूर कहा जा सकता है कि भाजपा से उसकी दूरी बढ़ रही है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि नवीन पटनायक ने कांग्रेस या इंडिया गठबंधन के साथ स्थायी गठजोड़ का फैसला कर लिया है. नवीन पटनायक की राजनीति की सबसे बड़ी खासियत यही रही है कि उन्होंने लंबे समय तक भाजपा और कांग्रेस दोनों से दूरी बनाए रखकर अपनी अलग राजनीतिक जगह बनाई. इसलिए मौजूदा घटनाक्रम को सीधे कांग्रेस के साथ गठबंधन की शुरुआत मानना जल्दबाजी होगी. हालांकि संकेत जरूर बदल रहे हैं. बीजेडी ने कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के साथ कई मुद्दों पर कदम मिलाना शुरू कर दिया है. राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ मिलकर उम्मीदवार उतारने की कोशिश भी इसी बदले हुए रुख का संकेत थी. इसका एक बड़ा कारण ओडिशा की बदली हुई राजनीति भी है. 2024 में भाजपा ने बीजेडी को सत्ता से बाहर कर दिया. अब नवीन पटनायक के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पार्टी की राजनीतिक जमीन बचाने की है.