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Ujjain Gayakota: उज्जैन के प्राचीन गयाकोटा तीर्थ में पितृ पक्ष के दौरान श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है. मान्यता है कि यहां तर्पण, पिंडदान और 16 चरणों पर दूध-जल अर्पित करने से पितरों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है.
Ujjain Gayakota: पितृ पक्ष शुरू होते ही धर्मनगरी उज्जैन में पितरों के तर्पण और पिंडदान के लिए श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ गई है. महाकाल की नगरी में कई ऐसे प्राचीन तीर्थ और मंदिर हैं, जिन्हें पितृ कर्म के लिए विशेष महत्व प्राप्त है. इन्हीं में खाक चौक क्षेत्र स्थित प्राचीन गयाकोटा तीर्थ भी शामिल है. मान्यता है कि यहां पितरों के निमित्त तर्पण, पूजन और पिंडदान करने से उन्हें शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है. पितृ पक्ष के 16 दिनों में गयाकोटा में विशेष धार्मिक गतिविधियां होती हैं. उज्जैन के अलावा आसपास के जिलों और दूसरे राज्यों से भी श्रद्धालु यहां पहुंचकर अपने पूर्वजों के लिए तर्पण करते हैं.
गया के समान माना जाता है गयाकोटा
गयाकोटा तीर्थ को लेकर मान्यता है कि इसका धार्मिक महत्व बिहार के गया तीर्थ के समान है. धार्मिक विश्वास के अनुसार गया में श्राद्ध और तर्पण करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है. इसी तरह उज्जैन के गयाकोटा में किए गए पितृ कर्म को भी विशेष फलदायी माना जाता है. यही कारण है कि पितृ पक्ष में यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है.
16 चरणों से जुड़ी है विशेष मान्यता
गयाकोटा मंदिर परिसर में बने 16 चरण यहां के प्रमुख आकर्षण हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार प्रत्येक चरण पितृ पक्ष की एक-एक तिथि का प्रतीक माना जाता है. श्रद्धालु इन चरणों पर दूध, जल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित कर पितरों का स्मरण करते हैं. मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक किए गए इस तर्पण से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है.
भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ी मान्यता
गयाकोटा तीर्थ को भगवान श्रीकृष्ण से जोड़कर भी धार्मिक कथा प्रचलित है. मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने गुरु के दिवंगत पुत्रों के निमित्त इसी स्थान पर तर्पण कराया था. इसी धार्मिक प्रसंग के कारण यहां बने 16 चरणों को विशेष महत्व दिया जाता है. पितृ पक्ष में श्रद्धालु इन चरणों पर विधि-विधान से पूजा और तर्पण कर अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हैं. पितृ पक्ष के दौरान गयाकोटा में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ शुरू हो जाती है. यहां पहुंचने वाले लोग अपने परिवार के दिवंगत सदस्यों का स्मरण कर तर्पण और पिंडदान करते हैं. उज्जैन में महाकाल दर्शन के साथ पितृ कर्म की परंपरा इस प्राचीन तीर्थ को धार्मिक दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण बनाती है.