संन्यास लेते ही हो जाता है पिंडदान, फिर भी पितृ पक्ष में श्राद्ध क्यों जरूरी?
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Sanyasi Shraddha Pitru Paksha : हिंदू धर्म में इन दिनों पितृ पक्ष चल रहा है. यह भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन अमावस्या तक चलेगा, जो पूर्वजों के प्रति समर्पण और श्रद्धा का सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाता है. पितरों का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि पर करने की परंपरा है, लेकिन कई आत्माओं के लिए दूसरी तिथियां निर्धारित की गई हैं. सांसारिक मोह-माया त्यागकर संन्यास ग्रहण करने वाले पूर्वजों के लिए भी अलग विधान है. लोकल 18 से हरिद्वार के पंडित सचिन शर्मा बताते हैं कि गरुड़ पुराण में संन्यास ले चुके पितरों के श्राद्ध की तिथि आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वादशी निर्धारित की गई है.
हरिद्वार. हिंदू धर्म में भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन अमावस्या तक चलने वाला पितृ पक्ष पूर्वजों के प्रति समर्पण और श्रद्धा का सबसे महत्वपूर्ण समय माना गया है. पितरों का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि पर करने की परंपरा है, लेकिन कई विशेष आत्माओं के लिए शास्त्र में निश्चित तिथियां निर्धारित की गई हैं. जिस प्रकार सुहागिन महिलाओं के लिए मातृ नवमी और अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए पितरों का श्राद्ध चतुर्दशी तिथि में निर्धारित किया गया है, वैसे ही सांसारिक मोह-माया त्यागकर संन्यास ग्रहण करने वाले पूर्वजों के लिए भी शास्त्रों में एक विशेष तिथि निर्धारित की गई है. लोकल 18 से हरिद्वार के पंडित सचिन शर्मा बताते हैं कि गरुड़ पुराण समेत दूसरे धार्मिक ग्रंथों में संन्यास ले चुके पितरों के श्राद्ध की तिथि आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि का निर्धारित की गई है. सन्यास ले चुके पितरों का धार्मिक परंपरा से द्वादशी तिथि को श्राद्ध करने का अलग महत्व है.
कहते हैं ऋषि श्राद्ध
पंडित सचिन शर्मा के मुताबिक इस श्राद्ध को ऋषि श्राद्ध भी कहा जाता है. जब कोई संन्यास की दीक्षा लेता है तो उस समय व्यक्ति के केश मुंडन कराकर जीते-जी पिंडदान करा दिया जाता है, जिससे उसका सांसारिक अस्तित्व खत्म होना मान लिया जाता है. देहावसान के बाद आत्मा की पूर्ण तृप्ति और ऋषि ऋण से मुक्ति के लिए वंशजों की ओर से आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को किया गया तर्पण महत्वपूर्ण माना गया है.
हरिद्वार में करना क्यों जरूरी
पंडित सचिन शर्मा बताते हैं कि अगर किसी के पूर्वज संन्यासी या साधु बन गए थे तो उनका श्राद्ध उनके शरीर त्यागने की तिथि पर करने की भूल नहीं करनी चाहिए. धार्मिक ग्रंथों के अनुसार सही तिथि पर तर्पण नहीं होने से पितरों की आत्मा अतृप्त रहकर भटकती रहती है, जिससे घर-परिवार में पितृ दोष लगता है. ऐसा होने पर वंश वृद्धि में रुकावट, कलह और आर्थिक समस्याएं आती रहती हैं. द्वादशी के दिन गंगा तट पर तर्पण और पूजन करने से संन्यासी पितृ तृप्त होकर अपने धाम चले जाते हैं और परिवार को सुख-शांति का आशीर्वाद देते हैं. द्वादशी का श्राद्ध हरिद्वार में करने पर विशेष लाभ प्राप्ति की भी मान्यता है.