दोनों पैर गंवाए और बेटों को भी खोया, फिर भी नहीं हारे रमेश का हौसला
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Inspirational Story: हैदराबाद के वी. रमेश नायक की कहानी हौसले और संघर्ष की मिसाल है. चौथी मंजिल से गिरने के बाद उनकी कमर के नीचे का हिस्सा सुन्न हो गया और डॉक्टरों ने उन्हें जिंदगीभर बिस्तर तक सीमित रहने की बात कही। दो बेटों को खोने के गम के बावजूद रमेश ने हार नहीं मानी. आज वह व्हीलचेयर पर जोमैटो के लिए फूड डिलीवरी करते हैं और पैरा-स्पोर्ट्स में भी अपनी पहचान बना रहे हैं.
हैदराबाद. जिंदगी जब सबसे कठिन इम्तिहान लेती है तो कई लोग टूट जाते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो मुश्किलों को अपनी हिम्मत के आगे घुटने टेकने पर मजबूर कर देते हैं. ऐसी ही एक मिसाल हैं हैदराबाद के वी. रमेश नायक. एक गंभीर हादसे में अपनी दोनों टांगों की ताकत गंवाने के बाद भी रमेश आज किसी के आगे हाथ फैलाने के बजाय अपनी मेहनत से परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं. रमेश नायक पहले निर्माण क्षेत्र में मिस्त्री के तौर पर काम करते थे, एक दिन काम के दौरान वह अचानक चौथी मंजिल से नीचे गिर पड़े. इस हादसे में उनकी रीढ़ की हड्डी यानी स्पाइनल कॉर्ड में गहरी चोट आई. काफी समय तक चले इलाज और फिजियोथेरेपी के बावजूद उनकी कमर के नीचे का हिस्सा पूरी तरह सुन्न और बेजान हो गया. डॉक्टरों ने स्पष्ट कह दिया कि अब उनकी जिंदगी बिस्तर तक ही सीमित रहेगी.
रमेश की मुश्किलें सिर्फ शारीरिक तकलीफ़ तक सीमित नहीं रहीं, शादी के बाद उनके दो बेटों का बीमारियों के कारण निधन हो गया. दूसरे बेटे को दिल में छेद और गंभीर इन्फेक्शन था, जो लंबे समय तक वेंटिलेटर पर रहने के बाद चल बसा. इस गहरे सदमे ने रमेश को मानसिक रूप से तोड़ दिया था लेकिन बेटी के भविष्य और अपनी पत्नी के अटूट समर्थन को देखकर उन्होंने दोबारा खड़े होने का फैसला किया. पुणे के एक डोनर द्वारा रेट्रोफिटेड व्हीलचेयर वाहन मिलने के बाद रमेश ने फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म ज़ोमैटो के साथ डिलीवरी पार्टनर के रूप में काम शुरू किया.
वह रोजाना दो शिफ्टों में काम करते हैं, ऊंची इमारतों में लिफ्ट न होने या सीढ़ियां होने पर भारी दिक्कतों का सामना करने के बावजूद वह मुस्कुराते हुए अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं. डिलीवरी के काम के साथ-साथ रमेश पैरा-स्पोर्ट्स में भी अपनी पहचान बना रहे हैं. उन्होंने गच्चीबाउली और शादनगर स्टेडियम में आयोजित प्रतियोगिताओं में व्हीलचेयर क्रिकेट, भाला फेंक यानी जेवलिन थ्रो और व्हीलचेयर मैराथन में हिस्सा लिया है. जेवलिन थ्रो में वह कांस्य पदक भी जीत चुके हैं. रमेश का मानना है कि दूसरों पर आश्रित रहने से कहीं बेहतर है कि इंसान अपनी मेहनत की कमाई खाए और आखिरी सांस तक जिंदगी की चुनौतियों से लड़े.