India America Trade Deal News : अमेरिका की धौंस पड़ी उल्टी, भारत-रूस के रिश्ते खराब करने चले थे ट्रंप, अपने पैरों पर मार ली कुल्हाड़ी

India America Trade Deal News : अमेरिका की धौंस पड़ी उल्टी, भारत-रूस के रिश्ते खराब करने चले थे ट्रंप, अपने पैरों पर मार ली कुल्हाड़ी


अमेरिका का भारत पर कूटनीतिक और आर्थिक दबाव बनाने का दांव पूरी तरह से नाकाम साबित हुआ है. रूस और ईरान पर शिकंजा कसने के बहाने भारत-रूस संबंधों को निशाना बनाने चले ट्रंप की नीतियों ने खुद भारत-अमेरिका फ्री ट्रेड डील की बलि ले ली है. पाबंदियों की तलवार लटकाकर ट्रेड समझौते की उम्मीद कर रहे अमेरिका को भारत ने तगड़ा मैसेज दिया है और दबाव में डील करने से साफ मना कर दिया है. जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट ब्रह्मा चेलानी ने बताया है कि भारत को धमकियों से झुकाने की वाशिंगटन की पुरानी नीति अब कैसे उल्टी पड़ती दिखाई दे रही है?

अमेरिका ने भारत पर कैसे की दबाव बनाने की कोशिश?

ट्रंप प्रशासन ने रूस और ईरान पर शिकंजा कसने के बहाने एक नया दांव चला है, ‘लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’, इस कानून को अमेरिकी संसद में लाने का असली मकसद भारत और रूस की दशकों पुरानी रणनीतिक और आर्थिक दोस्ती में दरार डालना है. अमेरिका चाहता है कि भारत किसी भी कीमत पर रूस से कच्चा तेल और हथियार खरीदना बंद कर दे.

इस नए एक्ट के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को ये असीमित अधिकार मिल गया है कि वो रूस से तेल खरीदने वाले देशों के सामान पर 100% तक का भारी-भरकम पेनल्टी टैरिफ लगा सकते हैं. वाशिंगटन को लगता था कि वह 100% टैरिफ का डर दिखाकर भारत को झुका लेगा. अमेरिका लगातार नई ट्रेड पाबंदियों, जुर्माने और पेनल्टी की धमकियां देकर अपनी कूटनीतिक धौंस जमाने की कोशिश कर रहा है. इस बिल के पास होने के कुछ दिनों के भीतर ही अमेरिका को समझ आ गया है कि नई दिल्ली अपनी संप्रभुता के मामले में कोई समझौता नहीं करेगी.

अमेरिका का दोहरा रवैया: चीन पर चुप्पी, भारत पर निशाना

अमेरिका का ये दबाव न केवल बेतुका है, बल्कि उसकी कूटनीतिक नाकामी और दोहरे रवैये को भी बेनकाब करता है. अगर आंकड़ों और जमीनी हकीकत को देखें, तो हाल के संकट के समय भारत ने ही अमेरिकी ऊर्जा बाजार को बहुत बड़ा सहारा दिया है. हाल के महीनों में भारत अमेरिकी लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) का एक बहुत बड़ा खरीदार बनकर उभरा है. इसके साथ ही, अमेरिका के नियंत्रण वाले वेनेजुएला के तेल को खरीदने में भी भारतीय रिफाइनरी कंपनियों ने काफी दिलचस्पी दिखाई है.

इतना सब करने के बाद भी अमेरिका भारत पर निशाना साधने से बाज नहीं आ रहा है. सबसे मजेदार और बेतुकी बात तो ये है कि रूस से सबसे ज्यादा कच्चा तेल और गैस भारत नहीं, बल्कि चीन खरीद रहा है. लेकिन अमेरिका चीन पर नकेल कसने के बजाय अपनी पूरी ताकत भारत को दबाने में लगा रहा है. भारत के इतने बड़े व्यापारिक फैसलों के बावजूद अमेरिका का ये अड़ियल रवैया उसकी विदेश नीति की सबसे बड़ी कमजोरी को साफ दिखाता है.

आखिर क्यों ठप्प पड़ गई भारत-अमेरिका ट्रेड डील?

अमेरिका की मंशा बेहद आक्रामक है. वो चाहता है कि भारत अपने इंडस्ट्रियल, एग्रीकल्चरल और डिजिटल सेक्टर्स को अमेरिकी कंपनियों के लिए बिना किसी रुकावट के पूरी तरह खोल दे. अमेरिकी डेयरी उत्पाद, पोल्ट्री और टेक कंपनियां भारत के विशाल बाजार पर कब्जा करना चाहती हैं लेकिन भारत के लिए अपने करोड़ों किसानों, छोटे व्यापारियों और घरेलू उद्योगों के हितों की रक्षा करना सबसे बड़ी प्राथमिकता है.

ऊपर से स्थिति ये है कि एक तरफ अमेरिका बातचीत की मेज पर बड़े-बड़े वादे करता है, और दूसरी तरफ भारत के सिर पर 100% पाबंदियों और भारी टैरिफ की तलवार लटका कर रखता है. ऐसे दबाव वाले माहौल में किसी भी लंबे व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करना भारत के लिए सीधे-सीधे अपने आर्थिक हितों का ताक पर रखने जैसा होगा.

भारत सरकार के लिए ऐसे माहौल में समझौता करना देश के साथ खिलवाड़ करने जैसा होता. यही वजह है कि सिर पर बंदूक रखकर वार्ता करने की अमेरिकी कोशिश पूरी तरह नाकाम रही और दोनों देशों के बीच चल रही बहुप्रतीक्षित ट्रेड डील पूरी तरह ठप्प पड़ गई.

रूस-भारत का अटूट रिश्ता: वाशिंगटन की सबसे बड़ी खीज

अमेरिका की सबसे बड़ी बौखलाहट ये है कि तमाम पश्चिमी पाबंदियों और दबाव के बावजूद भारत और रूस के संबंध रत्ती भर भी कमजोर नहीं हुए हैं. भारत ने अपनी एनर्जी की जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदना जारी रखा, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को महंगाई से बचाने में मदद मिली, रूस भारत का न सिर्फ सबसे बड़ा ऊर्जा साझेदार बना हुआ है, बल्कि रक्षा और सैन्य उपकरणों के मामले में भी दोनों देशों का भरोसा अटूट है.

ट्रंप प्रशासन को लग रहा था कि अमेरिका अपने बड़े बाजार का लालच देकर भारत को रूस से अलग कर देगा. लेकिन भारत ने साफ कह दिया कि उसकी विदेश नीति किसी तीसरे देश के इशारे पर नहीं चलती. वाशिंगटन की इस नासमझी का नतीजा ये हुआ कि वो भारत-रूस की दोस्ती तो तोड़ नहीं पाया, उल्टा भारतीय बाजार में मिलने वाले बड़े मौकों से खुद ही हाथ धो बैठा.

भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर ब्रह्मा चेलानी का विश्लेषण (Chellaney/X)

भारत की बहुपक्षीय कूटनीति की ताकत

ब्रह्मा चेलानी का विश्लेषण साफ बताता है कि भारत को अपनी सुरक्षा, विदेश नीति और फायदे से रत्ती भर भी समझौता नहीं करना चाहिए. अगर वाशिंगटन सोचता है कि वो पाबंदियों, जुर्माने और भारी टैरिफ का डर दिखाकर भारत जैसे बड़े देश को दबा लेगा, तो ये उसकी बहुत बड़ी भूल है.

भारत अपनी बहुपक्षीय कूटनीति पर मजबूती से टिका हुआ है. अब भारत अपने फायदे के हिसाब से खुद तय करेगा कि उसे किससे तेल खरीदना है, किसके साथ हथियारों का सौदा करना है और किसके साथ व्यापार बढ़ाना है. नई दिल्ली ने साफ कर दिया है कि वो वाशिंगटन के इशारे पर कोई फैसला नहीं लेने वाला.

धमकियों से नहीं, बराबरी से बनेगी भारत-अमेरिका की बात

इस पूरी कूटनीतिक जंग से ये साबित हो गया है कि अमेरिका का ‘प्रेशर टैक्टिक्स’ अब भारत पर काम करने वाला नहीं है. भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक वार्ता का ठप्प होना वाशिंगटन के लिए एक बड़ा सबक है. अमेरिका को ये समझना होगा कि भारत एक 1.4 अरब आबादी वाला विशाल और आत्मनिर्भर बाजार है.

अगर अमेरिकी कंपनियों को भारत में व्यापार करना है और एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में एक मजबूत रणनीतिक साझेदार चाहिए, तो उसे धमकियों की भाषा छोड़नी होगी. वाशिंगटन को अपनी पुरानी हुक्म चलाने वाली मानसिकता से बाहर निकलकर भारत के साथ बराबरी और सम्मान के साथ मेज पर बैठना होगा. जब तक अमेरिका चाबुक लहराना बंद नहीं करेगा, तब तक कोई भी ट्रेड डील संभव नहीं होगी.



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