पहले समझिए कि 10% को-पेमेंट का मतलब क्या है? मान लीजिए आपके अस्पताल का 5 लाख रुपये का खर्च आता है और बीमा कंपनी ने पूरे 5 लाख रुपये को ‘एडमिसिबल क्लेम’ यानी बीमा के तहत मान लिया. अगर आपकी पॉलिसी में 10% को-पेमेंट है, तो 5 लाख का 10% यानी 50 हजार रुपये आपको अपनी जेब से देने होंगे. बाकी 4.5 लाख रुपये बीमा कंपनी देगी. यानी बीमा होने के बावजूद पूरा इलाज मुफ्त नहीं होगा. आपको इलाज के खर्च का एक हिस्सा खुद उठाना पड़ेगा.
बिल बढ़ा तो आपकी जेब का खर्च भी बढ़ेगा
अब मामला बड़े इलाज का हो तो यह रकम काफी ज्यादा हो सकती है. मान लीजिए किसी गंभीर बीमारी के इलाज या बड़ी सर्जरी का 25 लाख रुपये का एडमिसिबल बिल बन गया. 10% को-पेमेंट होने पर आपको 2.5 लाख रुपये खुद देने होंगे. बीमा कंपनी बाकी 22.5 लाख रुपये देगी. यही वजह है कि सिर्फ यह देखना काफी नहीं होगा कि आपके पास 25 लाख, 50 लाख या 1 करोड़ रुपये का हेल्थ कवर है. यह भी देखना होगा कि उस कवर पर को-पेमेंट कितना है.
सस्ता प्रीमियम देखकर खुश होने से पहले समझें गणित
को-पेमेंट का सबसे बड़ा फायदा पॉलिसीधारक को प्रीमियम में मिल सकता है. अगर बीमा कंपनी को पता है कि क्लेम का कुछ हिस्सा ग्राहक खुद उठाएगा, तो कंपनी का जोखिम कम होता है. इसका फायदा कम प्रीमियम के रूप में मिल सकता है. लेकिन दूसरी तरफ बीमारी या अस्पताल में भर्ती होने के समय आपकी जेब पर बोझ बढ़ सकता है. यानी आज कम प्रीमियम, लेकिन कल क्लेम के समय ज्यादा भुगतान करना पड़ सकता है.
10% सुनने में कम, लेकिन लाखों में बड़ी रकम
10% का आंकड़ा सुनने में बहुत बड़ा नहीं लगता. लेकिन अस्पताल का बिल जितना बढ़ेगा, आपकी हिस्सेदारी भी उतनी बढ़ती जाएगी. एक और बात- पूरा अस्पताल बिल हमेशा एडमिसिबल नहीं होता. को-पेमेंट आमतौर पर एडमिसिबल क्लेम अमाउंट पर लागू होता है. यानी पॉलिसी की शर्तों के हिसाब से जितनी रकम बीमा कंपनी क्लेम के लिए मानती है, को-पेमेंट उसी पर लगाया जाता है. अस्पताल का कुल बिल और बीमा कंपनी द्वारा स्वीकार किया गया क्लेम अलग हो सकता है. इसलिए पॉलिसी खरीदते समय सिर्फ सम इंश्योर्ड देखकर फैसला करना ठीक नहीं है. कमरे का किराया, बीमारी से जुड़े खर्च, लिमिट, एक्सक्लूजन, डिडक्टिबल और को-पेमेंट जैसी शर्तें भी देखनी जरूरी हैं.
असली सवाल अब प्रीमियम नहीं, ‘जेब से कितना’ होगा
अगर को-पेमेंट हेल्थ इंश्योरेंस में ज्यादा आम या अनिवार्य होता है, तो ग्राहकों के लिए बीमा चुनने का तरीका भी बदल सकता है. पहले सवाल होता था- 10 लाख का कवर कितने में मिलेगा? अब सवाल होना चाहिए- 10 लाख का इलाज हुआ तो मुझे अपनी जेब से कितना देना पड़ेगा? यही अंतर हेल्थ इंश्योरेंस को सिर्फ एक सस्ते प्रीमियम वाली पॉलिसी और वास्तव में काम आने वाली पॉलिसी के बीच अलग कर सकता है.
इसलिए अगर आप नई हेल्थ पॉलिसी लेने जा रहे हैं या पुरानी पॉलिसी रिन्यू कराने वाले हैं, तो सिर्फ कम प्रीमियम देखकर फैसला न करें. को-पेमेंट की शर्त को सबसे पहले समझें. बीमारी के समय बीमा का असली फायदा तभी मिलेगा, जब आपको पहले से पता हो कि अस्पताल के बिल में आपकी हिस्सेदारी कितनी हो सकती है.