पटना की लक्ष्मी देवी की जज्बे को सलाम, 72 साल की उम्र में सजा रहीं पापड़ बड़ी की दुकान, कहती हैं- जब तक शरीर साथ देगा काम करूंगी

पटना की लक्ष्मी देवी की जज्बे को सलाम, 72 साल की उम्र में सजा रहीं पापड़ बड़ी की दुकान, कहती हैं- जब तक शरीर साथ देगा काम करूंगी


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Patna Saras Mela 72 Year Old Woman Entrepreneur: दुकान पर सलीके से सजे पापड़, बड़ी, तिलौरी और अचार जैसे घरेलू प्रोडक्ट देखकर शायद ही कोई अंदाजा लगा पाए कि इसके पीछे जिस महिला की मेहनत है, उनकी उम्र 72 साल है. ग्राहक आते हैं, सामान पसंद करते हैं, खरीदारी करते हैं और आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन जब उम्र पूछते हैं तो ठिठक जाते हैं. पटना की लक्ष्मी देवी पिछले 25 साल से इस कारोबार को संभाल रही हैं. घर से शुरू हुआ उनका छोटा-सा काम आज कमाई का जरिया बन चुका है. पटना के गांधी मैदान में लगे सरस मेले में उन्होंने अपने उत्पाद का स्टॉल लगाया है. इस उम्र में भी लक्ष्मी देवी अपने परिवार को चला रहीं हैं. उम्र के इस पड़ाव पर भी वह पूरे आत्मविश्वास के साथ कहती हैं कि जब तक शरीर साथ देगा, काम करती रहेंगी.

लक्ष्मी देवी पटना के कुर्जी इलाके की रहने वाली हैं. लोकल 18 के साथ बातचीत में बताती हैं कि करीब 25 साल से पापड़, बड़ी और दूसरे घरेलू खाद्य उत्पाद तैयार कर रही हैं. सरस मेले में उन्होंने साल 2006 से दुकान लगाना शुरू किया. शुरुआती दिनों में उनके सामान की बिक्री सीमित थी, लेकिन धीरे-धीरे लोगों को उनके प्रोडक्ट पसंद आने लगे.

पहली बार मेले में करीब 10 हजार रुपये का सामान बेचने वाली लक्ष्मी देवी ने इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा. कभी 6 हजार, कभी 5 हजार तो कभी 8 हजार रुपये की बिक्री हुई. समय के साथ उनके सामान की मांग बढ़ती गई. अब उनके बनाए सामान पटना से बाहर तक जाने लगे हैं. दिल्ली, मुंबई और यहां तक कि विदेश जाने वाले लोग भी उनके सामान खरीदकर ले जाते हैं.

लक्ष्मी देवी बताती हैं कि उनके सामान की मांग इतनी बढ़ी कि होटल संचालक भी बड़ी मात्रा में सामान मांगने लगे. कई बार दो-दो और चार-चार क्विंटल तक की मांग आती थी, लेकिन सीमित संसाधनों के कारण इतनी बड़ी मात्रा में सामान तैयार कर पाना संभव नहीं होता था. उनका कहना है कि जितना संभव होता है, उतना सामान तैयार करके मेले में लेकर आती हैं. पिछले साल भी मेले में करीब 15 से 20 हजार रुपये तक की बिक्री हुई थी.

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लक्ष्मी देवी को दूसरे शहरों में भी लगने वाले सरकारी मेले में दुकान लगाने के मौके मिलते हैं, लेकिन वो नहीं जाती हैं. उनका कहना है कि मैं पटना छोड़कर बाहर जाना नहीं चाहती. पटना में रहकर ही अपना काम करना पसंद करती हूं. यहां मेले में आठ, दस या बारह दिन दुकान लगाने पर करीब 30 से 40 हजार रुपये तक की कमाई हो जाती है. साल में दो अच्छे मेले मिल जाएं तो करीब 50 हजार रुपये तक की कमाई हो जाती है.

लक्ष्मी देवी के तीन बेटियां और 5 बेटों को मिलाकर कुल 8 बच्चे हैं. इनके पति सरकारी अधिकारी थे. अचानक निधन के बाद सारी जिम्मेदारियों का बोझ इनके ऊपर ही आ गया. जबतक पति जिंदा थे, तबतक बच्चों की पढ़ाई हुई. नौकरी नहीं लगने के बाद किसी ने किराना दुकान शुरू कर ली तो किसी ने टेंपो चलाना शुरू कर दिया. जो बेरोजगार रह गए उनको आज भी लक्ष्मी देवी कमाकर खिलाती हैं. परिवार की जिम्मेदारियां निभाते-निभाते लक्ष्मी देवी ने भी अपने काम को आगे बढ़ाया. वह बताती हैं कि उनके पति नेशनल सीड कॉरपोरेशन में अच्छे पद पर काम करते थे. पति चाहते थे कि वह घर और बच्चों को संभालें और नौकरी न करें. लेकिन उन्हें काम करना था.

उम्र के इस पड़ाव पर भी लक्ष्मी देवी खुद दुकान संभालती हैं. सामान की बिक्री से लेकर हिसाब-किताब तक का काम वह खुद करती हैं. बच्चे अब उन्हें आराम करने के लिए कहते हैं, लेकिन लक्ष्मी देवी अभी काम छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं. उनका साफ कहना है कि जब तक शरीर साथ देगा, तब तक काम करती रहेंगी. लक्ष्मी देवी की जिंदगी का सफर सिर्फ कारोबार की कहानी नहीं है. उन्होंने परिवार में कई दुख भी झेले हैं. पति और बेटी को खोने के बाद उनकी तबीयत पर भी असर पड़ा.

वह बताती हैं कि जब मेरी बेटी के मरने के दसवें दिन ही पति का अचानक निधन हो गया. इस सदमे की वजह से मुझे शुगर और बीपी की समस्या हुई. इससे मेरा शरीर बहुत कमजोर हो गया. इतने दुखों के बावजूद उन्होंने खुद को घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं किया. आज भी मेले में दुकान लगाकर ग्राहकों से बातचीत करती हैं, सामान बेचती हैं और अपना हिसाब खुद रखती हैं.जब उनसे पूछा गया कि 72 साल की उम्र में अब काम छोड़ देने का मन नहीं करता? तो उनका जवाब बेहद सीधा था, “जब तक शरीर स्वस्थ है, तब तक काम करूंगी, जब शरीर थक जाएगा, तब काम छोड़ दूंगी.”

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