दिमाग का सर्किट ऑन-ऑफ… 3 वैज्ञानिकों की वह खोज, जिसके लिए मिला चिकित्सा का नोबेल

दिमाग का सर्किट ऑन-ऑफ… 3 वैज्ञानिकों की वह खोज, जिसके लिए मिला चिकित्सा का नोबेल


मेडिकल क्षेत्र में इस बार का नोबेल पुरस्कार ऑप्टोजेनेटिक्स पर रिसर्च के लिए दिया गया है. यह ऐसी तकनीक है, जिसमें वैज्ञानिक रोशनी की मदद से दिमाग के नर्व सेल्स यानी तंत्रिका कोशिकाओं को ऑन या ऑफ कर सकते हैं. इसीलिए इस रिसर्च को दिमाग का रिमोट भी कहा जा रहा है. नोबेल पुरस्कार पाने वाले कार्ल डीसेरोथ, पीट हेगेमैन और जॉर्ज नागेल लंबे समय से इस विषय पर रिसर्च कर रहे थे.

नोबेल चिकित्सा समिति के सचिव थॉमस पर्लमैन ने सोमवार को फोन के जरिए तीनों ही विजेताओं को इसकी जानकारी दी. डीसेरोथ कैलिफोर्निया की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में कार्यरत हैं, जबकि हेगेमन बर्लिन की हम्बोल्ट यूनिवर्सिटी और जॉर्ज नागेल जर्मनी की वुट्रजबर्ग यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं.

क्या है ऑप्टोजेनेटिक्स?

ऑप्टोजेनेटिक्स को दिमाग का रिमोट कंट्रोल भी कहते हैं. यह एक ऐसी तकनीक है जिससे दिमाग की तंत्रिका कोशिकाओं यानी न्यूरॉन्स को ऑन या ऑफ किया जा सकता है. आसान भाषा में समझें तो हमारे दिमाग में अरबों न्यूरॉन होते हैं. ये एक दूसरे को संकेत भेजकर काम करते हैं. इन्हीं में से एक न्यूरॉन में वैज्ञानिक खास प्रोटीन पहुंचाते हैं. ऐसा प्रोटीन जो रोशनी के प्रति बहुत ही सेंसिटिव होता है. उसी न्यूरॉन पर नीली रोशनी डाली जाती है. ऐसा करने से प्रोटीन का चैनल खुलता है आयन अंदर जाते हैं और न्यूरॉन एक्टिव हो जाते हैं.

वैज्ञानिकों ने कैसे की रिसर्च

रिसर्च में शामिल हेगेमन और नागेल ने मुख्य रिसर्च उस प्रोटीन पर की जो न्यूरॉन के लिए दरवाजा बना. दरअसल पहले उन्होंने एक कोशिका वाले शैवाल को खोजा जो रोशनी की दिशा में तैर सकता था. वैज्ञानिकों के मन में सवाल था कि आखिर ऐसा कैसे होता है. उन्होंने रिसर्च की तो शैवाल की सतह पर उन्हें चैनलरोडॉप्सिन नाम का प्रोटीन मिला. वैज्ञानिकों ने जब इस पर नीली रोशनी डाली तो प्रोटीन ने दरवाजे का काम किया. आयन इसके अंदर गए. इससे संकेत मिला और ये रोशनी की तरफ तैरने लगा.

वैज्ञानिक कार्ल डीसेरोथ ने इसे आगे बढ़ाया. अब तक ये पता चल चुका था कि प्रोटीन ही शैवाल में जादुई दरवाजे का काम करता है. ऐसे में मन में सवाल आया कि क्या दिमाग की कोशिकाओं में भी इसे लगाया जा सकता है. यहीं से मुख्य रिसर्च शुरू हुई और उसी प्रोटीन को न्यूरॉन्स तक भेजा गया. इसके बाद नीली रोशनी डाली गई. न्यूरॉन्स खुले और आयन अंदर गए, जिससे ये सक्रिय हो गए. यानी अब वैज्ञानिकों के हाथ में ऐसा रिमोट था जो दिमाग को ऑन कर सकता था. इस रिसर्च से पहले तक वैज्ञानिक सिर्फ ये देख सकते थे कि न्यूरॉन्स काम कर रहे हैं या नहीं. मगर अब वे उन्हें एक्टिव भी कर सकते हैं.

आयन क्या है, जो न्यूरॉन को करता है एक्टिव?

आयन असल में एक अणु यानी मॉलीक्यूल होता है जिसके पास इलेक्ट्रिक चार्ज होता है. आसान भाषा में कहें तो जब कोई परमाणु इलेक्ट्रॉन को खोता है या पाता है तो वह आयन बन जाता है. हमारे शरीर और दिमाग की कोशिकाओं में सोडियम, पोटेशियम, कैलशियम और क्लोराइड जैसे आयन होते हैं. इन्हें बिजली ले जाने वाले छोटे छोटे कण मान सकते हैं. जब ये किसी तंत्रिका कोशिका यानी न्यूरॉन के अंदर या बाहर जाते हैं तो इसके साथ जाने वाली इलेक्ट्रसिटी दिमाग को संकेत देती है. यही संकेत एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन तक पहुंचते हैं. ऑप्टोजेनेटिक्स में जब यही आयन न्यूट्रॉन में जाता है तो दिमाग ऑन हो जाता है.

शैवाल क्या होता है जिस पर मिलता है प्रोटीन?

शैवाल पानी में रहने वाला एक हरे पौधे जैसा जीव होता है. यह तालाब या लंबे समय तक एक जगह पर भरे रहे पानी में हरी परत के तौर पर दिखता है जो बेहद छोटा जलीय पौधा होता है. हेगेमन और नागेल ने इसी पर रिसर्च से शुरुआत की थी.

रिसर्च से क्या फायदा हुआ?

रिसर्च को दिमाग को समझने में सफलता मिली. अब तक वैज्ञानिक सिर्फ ये देख सकते थे कि कौन से न्यूरॉन सक्रिय हैं. ऑप्टोजेनेटिक्स तकनीक से वैज्ञानिक किसी भी न्यूरॉन को एक्टिव कर जान सकते हैं कि उनकी वजह से किसी इंसान के व्यवहार में क्या बदलाव आ रहा है. कैसे न्यूरॉन, याददाश्त, डर, नींद, भूख और शरीर की अन्य गतिविधियों को प्रभावित कर रहे हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक न्यूरोलॉजिकल और मानसिक बीमारियों के उपचार के लिए भी ये तकनीक काम आ सकती है.



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