Success Story: 3 बार सरकारी नौकरी ठुकराई, 1 लीटर पानी से उगा दिए 2 लाख पौधे, चौंका देगी पद्मश्री सुंडाराम की कहानी

Success Story: 3 बार सरकारी नौकरी ठुकराई, 1 लीटर पानी से उगा दिए 2 लाख पौधे, चौंका देगी पद्मश्री सुंडाराम की कहानी


सीकर: राजस्थान के सीकर जिला अंतर्गत दांतारामगढ़ में जन्मे पद्मश्री सुंडाराम वर्मा ने खेती को सिर्फ पेशा नहीं बनाया, बल्कि पानी की कमी से जूझ रहे राजस्थान के लिए नई राह तलाशने का काम किया. उन्होंने ऐसी तकनीक विकसित की, जिसमें महज 1 लीटर पानी से पौधे को स्थापित किया जा सकता है. खास बात यह है कि जीवन की शुरुआत में ही तीन बार सरकारी विज्ञान शिक्षक के पद पर चयन होने के बावजूद उन्होंने नौकरी ज्वाइन नहीं की और कृषि को अपना रास्ता चुना. आज उनके नवाचारों से लाखों पौधों को बंजर जमीन पर जीवन मिला है.

सुंडाराम वर्मा की कहानी उन युवाओं के लिए मिसाल है, जो सरकारी नौकरी को ही सफलता का सबसे बड़ा रास्ता मानते हैं. सुंडाराम ने वर्ष 1972 में बीएससी की परीक्षा पास की. इसके बाद उनका चयन तीन बार सरकारी विज्ञान शिक्षक के पद पर हुआ, लेकिन उन्होंने किसी भी बार नौकरी ज्वाइन नहीं की. उन्होंने खेती को अपना कर्मक्षेत्र बनाया और कृषि में ऐसे प्रयोग शुरू किए, जिनका मकसद कम पानी में अधिक हरियाली विकसित करना था.

पौधरोपण के सामने सबसे बड़ी चुनौती पानी की थी

सुंडाराम वर्मा ने बताया कि उस दौर में राजस्थान के शुष्क और अर्धशुष्क क्षेत्रों में खेती और पौधरोपण के सामने सबसे बड़ी चुनौती पानी की थी. सुंडाराम ने इसी समस्या को अपने प्रयोगों का आधार बनाया. उन्होंने स्थानीय परिस्थितियों, बारिश की नमी और देशी पौधों की जरूरतों को समझते हुए ऐसी तकनीकों पर काम किया, जिनसे कम से कम पानी में पौधों को जीवित रखा जा सके.

1995 में विकसित की 1 लीटर पानी वाली तकनीक

सुंडाराम वर्मा ने वर्ष 1995 में एक ऐसी तकनीक विकसित की, जिसमें पौधे को शुरुआती अवस्था में सिर्फ एक लीटर पानी देकर स्थापित करने का प्रयास किया जाता है. यह तकनीक बारिश के पानी से जमीन में बनी नमी को लंबे समय तक बचाए रखने के सिद्धांत पर आधारित है. इसका उद्देश्य पौधे को बार-बार सिंचाई देने के बजाय खेत की नमी का अधिकतम उपयोग करना है. इस तकनीक के जरिए उन्होंने शेखावाटी सहित राजस्थान के कई इलाकों में पौधरोपण करवाया. सुंडाराम के अनुसार जयपुर, सीकर, नागौर, डीडवाना और झुंझुनूं जिले में 100 से ज्यादा स्थानों पर इस पद्धति से पौधे लगाए गए. कई स्थानों पर पौधों को एक बार पानी देने के बाद दोबारा सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ी. यही प्रयोग आगे चलकर उनके कृषि नवाचार की पहचान बन गया.

अब तक 2 लाख से ज्यादा पौधे लगवा चुके हैं

सुंडाराम वर्मा के अनुसार उनकी तकनीक के जरिए अब तक दो लाख से ज्यादा पौधे रोपित करवाए जा चुके हैं. इनमें से बड़ी संख्या ऐसे क्षेत्रों में लगाई गई, जहां पानी की उपलब्धता बेहद कम थी और सामान्य तरीके से पौधों को बचाए रखना मुश्किल होता था. इन पौधों ने धीरे-धीरे बंजर और कम उपजाऊ क्षेत्रों में हरियाली बढ़ाने में योगदान दिया. उनका मानना है कि राजस्थान जैसे कम बारिश वाले प्रदेश में पौधरोपण की सफलता केवल पौधा लगाने से नहीं, बल्कि उसके लिए उपलब्ध नमी को बचाने से तय होती है. इसी सोच के कारण उन्होंने पौधरोपण को पानी बचाने की तकनीक से जोड़ा और बारिश की हर बूंद को जमीन में रोकने पर जोर दिया.

खेत में बारिश की हर बूंद को बचाने का मॉडल विकिसित किया

सुंडाराम की तकनीक सिर्फ पौधे लगाने तक सीमित नहीं है. इसमें बारिश के पानी को खेत में रोकने और उसका उपयोग करने पर भी जोर दिया जाता है. इसके लिए पौधों की कतार तैयार करने के बाद दोनों तरफ लंबी कतारों में मल्च या प्लास्टिक की चादर बिछाने की व्यवस्था की जाती है. इससे बारिश का पानी इधर-उधर बहने के बजाय एक जगह एकत्रित किया जा सकता है. फलदार पौधों की कतार को खुला रखा जाता है, जबकि आसपास की संरचना बारिश के पानी को रोकने में मदद करती है. खेत में बने फार्म पॉन्ड में इस पानी को संग्रहित किया जा सकता है. इसके बाद संरक्षित पानी का उपयोग बूंद-बूंद सिंचाई के जरिए फसल या पौधों को जरूरत के मुताबिक देने में किया जा सकता है. यानी उनका मॉडल पौधरोपण के साथ जल संरक्षण को भी जोड़ता है.

पौधा लगाने से पहले जमीन की तैयारी सबसे जरूरी

सुंडाराम वर्मा बताते हैं कि एक लीटर पानी वाली तकनीक में सबसे अहम काम पौधा लगाने से पहले शुरू होता है. खेत में मौजूद खरपतवारों को पूरी तरह हटाना जरूरी है, क्योंकि खरपतवार जमीन की नमी और पोषक तत्वों के लिए पौधे से प्रतिस्पर्धा करते हैं. यदि खेत में अनावश्यक वनस्पति मौजूद रहेगी तो कम पानी वाली तकनीक का असर भी कम हो सकता है. उनके अनुसार मानसून की पहली बारिश और आखिरी बारिश के तुरंत बाद खेत में गहरी जुताई करनी चाहिए. इससे खरपतवार नियंत्रित होते हैं और जमीन में मौजूद नमी को लंबे समय तक संरक्षित करने में मदद मिलती है. पौधा लगाने के लिए करीब डेढ़ फीट गहरा और लगभग चार इंच चौड़ा गड्ढा तैयार कर उसमें पौधा रोपित किया जाता है. इसके बाद पौधे के आसपास खरपतवार नहीं उगने देना इस तकनीक का महत्वपूर्ण हिस्सा है.

देसी प्रजातियों को बढ़ावा देने पर भी उनका है जोर

सुंडाराम वर्मा ने सिर्फ पानी बचाने की तकनीक पर काम नहीं किया, बल्कि देसी पौधों और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल प्रजातियों को बढ़ावा देने के लिए भी लगातार प्रयोग किए. उन्होंने विभिन्न प्रकार की देसी प्रजातियों के संरक्षण और विकास पर काम किया. उनका जोर ऐसी प्रजातियों पर रहा, जो स्थानीय जलवायु और कम पानी की परिस्थितियों में बेहतर तरीके से विकसित हो सकें. उनके कृषि प्रयोगों में वर्षा जल संरक्षण भी महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. उन्होंने अपने स्तर पर करीब 20 लाख लीटर वर्षा जल का संग्रहण किया. उनका मानना है कि राजस्थान में पानी की समस्या का समाधान केवल नए जलस्रोत बनाने में नहीं, बल्कि बारिश की बूंद को खेत में रोकने और उसका वैज्ञानिक उपयोग करने में भी है.

कनाडा से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक सुंडाराम को मिला सम्मान

कृषि में उनके प्रयोगों को देश-विदेश में पहचान मिली. वर्ष 1997 में उन्हें कनाडा में एग्रोबायोडायवर्सिटी बायो अवार्ड से सम्मानित किया गया. इसके बाद वर्ष 1998 में उन्हें जगजीवन राम किसान पुरस्कार मिला. राज्य सरकार की ओर से उन्हें वन पंडित पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया. इसके अलावा जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें कई पुरस्कार मिले. उनके कृषि नवाचारों और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में किए गए काम को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2020 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया. इसके बाद उनकी एक लीटर पानी में पौधा तैयार करने की तकनीक और कम पानी में हरियाली विकसित करने के प्रयोगों की चर्चा देशभर में हुई.



Source link