क्या करके मानेगा चीन? समंदर से खींच लेगा यूरेनियम, खारे पानी से बना देगा साफ
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China New Plant Extract Uranium: साइंस और टेक्नोलॉजी के मामले में चीन का जवाब नहीं है. कभी तो वो पानी से पेट्रोल बनाने के प्रयोग करता है, तो कभी नेचर को चुनौती देते हुए समंदर के खारे पानी को भी मीठा बनाने का इंतजाम कर लेता है. इस वक्त उसका एक ऐसा ही प्रयोग सुर्खियों में है, जिसके तहत न सिर्फ खारा पानी साफ हो जाएगा, बल्कि इससे मिलने वाला बाय-प्रोडक्ट भी कमाल करेगा.
समंदर से चीन निकाल लेगा यूरेनिम, पानी को बना देगा साफ.
China New Plant Extract Uranium: चीन के वैज्ञानिकों ने एक और कमाल कर दिया है. उन्होंने ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसमें समुद्र के पानी का इस्तेमाल करके एक ही प्रोसेस से हाइड्रोजन और मीठा पानी तैयार किया जा सकता है. इससे भी ज्यादा खास बात ये है कि इस प्रक्रिया के दौरान समुद्री पानी में मौजूद यूरेनियम, ब्रोमीन और नमक जैसे संसाधनों को भी अलग किया जा सकेगा. वैज्ञानिकों का दावा है कि इसके जरिये पारंपरिक तकनीक के मुकाबले बिजली के इस्तेमाल को करीब 14.4 प्रतिशत तक बेहतर बनाया जा सकेगा.
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज के डालियान इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल फिजिक्स के वैज्ञानिकों डेंग देहुई और लियू यानटिंग के नेतृत्व में किया गया है. शोध को नेचर एनर्जी में प्रकाशित किया गया है. वैज्ञानिकों के आर्थिक आकलन के मुताबिक अगर बिजली की कीमत कम रहे तो इस तकनीक से हाइड्रोजन उत्पादन की लागत अब तक मौजूद तकनीक के मुकाबले ज्यादा कम होगी.
समुद्र के पानी से हाइड्रोजन बनाना मुश्किल क्यों?
- ग्रीन हाइड्रोजन को भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा का महत्वपूर्ण विकल्प माना जाता है. इसे नवीकरणीय बिजली की मदद से पानी को अलग करके बनाया जा सकता है, लेकिन सीधे समुद्री पानी से हाइड्रोजन बनाना आसान नहीं है.
- समुद्री पानी में मौजूद क्लोराइड इलेक्ट्रोड को नुकसान पहुंचा सकता है. वहीं कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे तत्व इलेक्ट्रोड पर परत जमा कर देते हैं, जिससे पूरी प्रक्रिया की क्षमता घट जाती है.
- एक दूसरा तरीका समुद्री पानी को पहले साफ करना और फिर उससे हाइड्रोजन बनाना है, लेकिन इसमें डिसेलिनेशन प्लांट के लिए ज्यादा बिजली और महंगे उपकरणों की जरूरत पड़ती है.
बेकार गर्मी का भी इस्तेमाल
चीनी वैज्ञानिकों ने इसी समस्या को हल करने की कोशिश की है. उन्होंने हाइड्रोजन बनाने वाली प्रक्रिया से निकलने वाली गर्मी को बर्बाद होने देने के बजाय उसका इस्तेमाल समुद्री पानी को साफ करने में किया. आमतौर पर 80 से 90 डिग्री सेल्सियस तापमान पर प्रक्रिया के दौरान पैदा होने वाली करीब 30 प्रतिशत बिजली कम उपयोगी गर्मी में बदल जाती है. नई व्यवस्था में इसी गर्मी को वैक्यूम डिस्टिलेशन सिस्टम तक पहुंचाया जाता है. वहां समुद्री पानी को करीब 40 से 50 डिग्री सेल्सियस पर इवैपोरेट किया जाता है और फिर भाप को ठंडा करके मीठा पानी हासिल किया जाएगा.
250 किलोवाट का प्लांट तैयार
वैज्ञानिकों ने पहले 2023 में 25 किलोवाट की छोटी इकाई तैयार की थी. इसके बाद उन्होंने इसे बढ़ाकर 250 किलोवाट की प्रणाली बनाई. शोध के अनुसार ये प्लांट सालाना करीब 3.8 लाख घन मीटर हाइड्रोजन पैदा कर सकता है. हाइड्रोजन की शुद्धता 99.9999 प्रतिशत तक बताई गई है. इसके साथ करीब 256 टन मीठा पानी भी तैयार होता है. प्रयोग के दौरान यह सिस्टम लगातार 40 दिनों तक रोजाना शुरू और बंद किए जाने के बावजूद स्थिर रहा और इसकी क्षमता में गिरावट नहीं देखी गई. वैज्ञानिकों का अगला लक्ष्य बेहतर कैटेलिस्ट विकसित करना, बची हुई गर्मी का और प्रभावी इस्तेमाल करना तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से पूरी प्रक्रिया को अधिक कुशल बनाना है.