लालू यादव के बुलावे पर सिंगापुर से लौटीं रोहिणी, तेजस्वी से दूरी के बीच साधु यादव का साथ… क्या है सियासी संकेत?

लालू यादव के बुलावे पर सिंगापुर से लौटीं रोहिणी, तेजस्वी से दूरी के बीच साधु यादव का साथ… क्या है सियासी संकेत?


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Rohini Acharya News: राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य की राजनीतिक सक्रियता बढ़ती नजर आ रही है. रविवार को उन्होंने अपने मामा और पूर्व सांसद साधु यादव से मुलाकात की. इस मुलाकात के बाद साधु यादव ने बड़ा बयान दिया है, जिससे बिहार की सियासत में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है. पूरी खबर विस्तार से आगे पढ़िये.

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रोहिणी-साधु मुलाकात के सियासी मायने

रोहिणी आचार्य जब करीब 11 महीने बाद सिंगापुर से पटना लौटीं तो उन्होंने खुद कहा था कि उनके आने को राजनीतिक रंग न दिया जाए. उनका कहना था कि पिता लालू यादव ने बुलाया है और वह अपने मां-बाप से मिलने आई हैं. लेकिन पटना लौटने के कुछ ही दिनों में घटनाक्रम जिस दिशा में बढ़ रहा है, उसने बिहार की राजनीति में नई चर्चा जरूर छेड़ दी है. पहले लालू यादव का बुलावा, फिर परिवार के बीच उनकी वापसी और अब लंबे अरसे बाद मामा साधु यादव से मुलाकात. ऊपर से साधु यादव का यह कहना कि रोहिणी चुनाव लड़ेंगी और अगर छपरा से लड़ती हैं तो उन्हें उनका पूरा समर्थन रहेगा.

साधु यादव से मुलाकात और बयान की चर्चा क्यों?

रोहिणी आचार्य ने अपने मामा और पूर्व सांसद साधु यादव से मुलाकात की. इस मुलाकात के बाद साधु यादव ने ऐसा बयान दिया, जिसने आरजेडी को लेकर बिहार की सियासत में नई राजनीति की चर्चा छेड़ दी है. उन्होंने दावा किया कि आने वाले दिनों में रोहिणी आचार्य चुनाव लड़ेंगी और लोकसभा पहुंचेंगी. मुलाकात के बाद साधु यादव ने कहा कि रोहिणी आचार्य से उनकी कभी दूरी नहीं रही. उन्होंने कहा कि रोहिणी अगर छपरा से लोकसभा चुनाव लड़ती हैं तो उनका पूरा समर्थन रहेगा. साधु यादव ने साफ तौर पर कहा कि वह रोहिणी के साथ खड़े रहेंगे.

सिंगापुर से पटना तक, वापसी के पीछे सिर्फ परिवार?

बता दें कि रोहिणी आचार्य पिछले करीब एक साल से सिंगापुर में थीं. 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के बाद उनके और तेजस्वी यादव के बीच कथित राजनीतिक और पारिवारिक मतभेद की चर्चा ने जोर पकड़ा था. उस दौरान रोहिणी ने सोशल मीडिया पर राजनीति और परिवार से दूरी बनाने से जुड़े पोस्ट भी किए थे. इस साल जुलाई में भी उन्होंने सारण के एक राजद नेता के निलंबन को लेकर पार्टी के भीतर के लोगों पर सवाल उठाए थे. यानी पटना से दूरी के बावजूद उनकी राजनीतिक दिलचस्पी पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी. इस बीच लालू यादव स्वयं सिंगापुर पहुंचे थे और इसके बाद सितंबर के आखिर में लालू यादव के बुलावे पर उनके पटना आने की बात सामने आई. रोहिणी ने भी कहा कि पिता के बुलावे से बढ़कर उनके लिए कोई आदेश नहीं है. खास बात यह कि पटना एयरपोर्ट पर लालू यादव और राबड़ी देवी खुद उन्हें लेने पहुंचे. इसके साथ एक बड़ी बात यह भी कि उस मौके पर तेजस्वी यादव मौजूद नहीं थे, जिसको लेकर राजनीतिक हलकों में फिर चर्चाएं हुईं. हालांकि, राजद की ओर से इसका कारण तेजस्वी का दिल्ली में होना बताया गया.

तेजस्वी से दूरी की पुरानी कहानी अभी खत्म हुई या नहीं?

दरअसल, रोहिणी की मौजूदा सक्रियता को समझने के लिए तेजस्वी यादव के साथ उनके पुराने मतभेदों की पृष्ठभूमि महत्वपूर्ण है. रोहिणी को लेकर यह चर्चा पहले भी होती रही है कि परिवार और पार्टी के कुछ फैसलों को लेकर उनकी नाराजगी थी. वहीं तेजस्वी लालू यादव के राजनीतिक उत्तराधिकारी और राजद के मौजूदा कार्यकारी अध्यक्ष हैं. ऐसे में रोहिणी की राजनीतिक सक्रियता को केवल परिवार के एक सदस्य की सामान्य गतिविधि मानकर छोड़ देना राजनीतिक रूप से अपरिपक्वता होगी. हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि रोहिणी और तेजस्वी के बीच मतभेद फिर किसी राजनीतिक टकराव का रूप लेने जा रहे हैं. रोहिणी ने खुद अपनी पटना वापसी को राजनीतिक यात्रा नहीं बताया है. लेकिन, दूसरी ओर रोहिणी के राजनीतिक संकेतों को पढ़ना भी जरूरी है.

फिर साधु यादव से मुलाकात क्यों अहम?

दरअसल, यहीं से कहानी का एक दूसरा पहलू सामने आता है. रोहिणी आचार्य लंबे अरसे बाद अपनी मां राबड़ी देवी के भाई और पूर्व सांसद साधु यादव से मिलने पहुंचीं. उन्होंने मामा-मामी के पैर छूकर आशीर्वाद लिया. मुलाकात के बाद साधु यादव ने कहा कि रोहिणी से उनकी कभी दूरी नहीं रही. इसके साथ ही उन्होंने दावा किया कि रोहिणी आने वाले दिनों में चुनाव लड़ेंगी और लोकसभा पहुंचेंगी. उन्होंने यह भी कहा कि अगर रोहिणी छपरा से चुनाव लड़ती हैं तो उनका पूरा समर्थन रहेगा. साधु यादव का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रोहिणी 2024 का लोकसभा चुनाव सारण सीट से ही लड़ चुकी हैं. उस चुनाव में उन्हें भाजपा के राजीव प्रताप रूडी से हार मिली थी. ऐसे में साधु यादव का अचानक छपरा यानी सारण से चुनाव लड़ने की स्थिति में समर्थन का ऐलान उस सीट को लेकर नई राजनीतिक चर्चा को जन्म देता है.

क्या बन रहा है कोई नया राजनीतिक समीकरण?

फिलहाल तीन घटनाओं को एक साथ रखकर देखने पर कई सवाल उठते हैं. पहला, लालू यादव ने रोहिणी को सिंगापुर से वापस बुलाया. दूसरा, तेजस्वी से कथित दूरी की पृष्ठभूमि के बावजूद रोहिणी बिहार में फिर सक्रिय दिखाई दे रही हैं. तीसरा, परिवार से लंबे समय से अलग रहे माने जाने वाले साधु यादव से उनकी मुलाकात हुई और उन्होंने सार्वजनिक तौर पर रोहिणी को चुनाव लड़ने तथा छपरा से लड़ने पर समर्थन देने की बात कह दी. इन घटनाओं को जोड़कर राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा होना स्वाभाविक है कि क्या रोहिणी के लिए बिहार की राजनीति में कोई नई भूमिका तैयार हो रही है. खासकर तब, जब उनकी सबसे मजबूत राजनीतिक पहचान सारण से जुड़ी हुई है.

लेकिन अभी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं

फिलहाल रोहिणी आचार्य की ओर से छपरा से अगला लोकसभा चुनाव लड़ने की कोई घोषणा नहीं हुई है. साधु यादव का बयान भी उनकी ओर से की गई किसी औपचारिक राजनीतिक घोषणा के बजाय उनका समर्थन और दावा है. इसलिए इसे अभी चुनावी फैसले के तौर पर नहीं बल्कि बिहार की राजनीति में उभरते एक संभावित संकेत के रूप में देखना अधिक उचित होगा. फिर भी सवाल अपनी जगह है- क्या लालू के बुलावे पर सिंगापुर से लौटी रोहिणी सिर्फ परिवार के पास आई हैं, या बिहार की राजनीति में उनकी दूसरी पारी की जमीन भी तैयार हो रही है? साधु यादव की मुलाकात और छपरा को लेकर उनका बयान इस सवाल को पहले से कहीं ज्यादा बड़ा जरूर बना देता है.



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