अमेरिकी एडमिरल सैमुएल जी पपारो का भारत दौरा क्यों अहम? चीन को संदेश या जापान-US संग मजबूत होगा गठजोड़

अमेरिकी एडमिरल सैमुएल जी पपारो का भारत दौरा क्यों अहम? चीन को संदेश या जापान-US संग मजबूत होगा गठजोड़


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अमेरिकी एडमिरल का दौरा क्यों अहम? चीन को संदेश या जापान-US संग मजबूत रिश्ते

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Why US Admiral Visit Is Important: अमेरिकी इंडो-पैसेफिक कमान के प्रमुख एडमिरल सैमुअल जे. पपारो भारत दौरे पर हैं. उन्होंने विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात कर सुरक्षा साझेदारी और हिंद-प्रशांत में समुद्री सहयोग पर चर्चा की. वह पांच दिवसीय दौर पर भारत आए हैं. इस दौरान वह सैन्य अधिकारियों से खासतौर पर मीटिंग करने वाले हैं. उनके इस दौरे पर भारत और अमेरिका के बीच हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत करने का प्रयास माना जा रहा है.

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अमेरिकी एडमिरल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर. फोटो- पीटीआई

Why US Admiral Visit Is Important:  भारत और अमेरिका के बीच सैन्य संबंधों को मजबूती देने के लिए अमेरिका के इंडो-पैसेफिक कमान के प्रमुख एडमिरल सैमुअल जे. पपारो भारत दौरे पर हैं. रविवार को उनकी विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ सुरक्षा से जुड़े कई मसलों पर अहम बातचीत हुई. इसमें दोनों देशों के बीच सुरक्षा साझेदारी के साथ समंदर में सहयोग बढ़ाने को लेकर चर्चा हुई. इस बातचीत में नई दिल्ली में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर भी मौजूद थे. अमेरिकी एडमिरल के इस दौरे को लेकर कई सवाल भी किए जा रहे हैं. पहला सवाल यही है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन में भारत और अमेरिका की सामरिक साझेदारी किस दिशा में बढ़ रही है. दूसरा, यह कि अगर दोनों देश सुरक्षा और समुद्री साझेदारी बढ़ा रहे हैं तो इसका उद्देश्य क्या है. क्या ये दोनों देश चीन को साधने के लिए ऐसा कर रहे हैं. और तीसरा अहम सवाल यह है कि क्या भारत, अमेरिका और जापान इंडो-पैसेफिक में एक नई साझेदारी बना रहे हैं?

कौन हैं एडमिरल सैमुअल पपारो?

एडमिरल सैमुअल जे. पपारो अमेरिकी सेना में बेहद महत्वपूर्ण पद पर हैं. वह अमेरिका की इंडो-पैसेफिक कमान के प्रमुख हैं. यह कमान अमेरिका के लिए दुनिया के उस हिस्से की सैन्य गतिविधियों को देखती है जिसमें हिंद महासागर से लेकर प्रशांत महासागर तक का विशाल क्षेत्र आता है. यही वजह है कि पपारो का भारत दौरा महज दो देशों के सैन्य अधिकारियों की मुलाकात नहीं है. उनके स्तर का अधिकारी जब नई दिल्ली आता है और समुद्री सुरक्षा तथा हिंद-प्रशांत पर बातचीत करता है तो उसके पीछे पूरे क्षेत्र की रणनीतिक तस्वीर भी जुड़ी होती है. पपारो 3 से 8 अक्टूबर तक भारत में हैं. इस दौरान वह भारतीय रक्षा मंत्रालय और सशस्त्र बलों के वरिष्ठ अधिकारियों से बातचीत कर रहे हैं. बातचीत में उभरती तकनीक, डिजिटल बदलाव, क्षेत्रीय रणनीतिक स्थिरता और रक्षा क्षेत्र में ऊर्जा सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल हैं.

पपारो की जयशंकर से मुलाकात में क्या हुआ?

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पपारो से मुलाकात के बाद कहा कि दोनों पक्षों ने सुरक्षा साझेदारी और हिंद-प्रशांत में समुद्री सहयोग को आगे बढ़ाने पर चर्चा की. यहां समुद्री सहयोग शब्द सबसे महत्वपूर्ण है. भारत और अमेरिका दोनों हिंद-प्रशांत में समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने, समुद्री क्षेत्र की जानकारी साझा करने और अपनी सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने पर लगातार काम कर रहे हैं. भारत के लिए हिंद महासागर बेहद महत्वपूर्ण है. इसी रास्ते भारत का तेल आयात और व्यापार होता है. वहीं अमेरिका के लिए हिंद महासागर, पश्चिमी प्रशांत और दक्षिण चीन सागर एक ही व्यापक रणनीतिक क्षेत्र का हिस्सा हैं. इसलिए भारत की समुद्री क्षमता और अमेरिका की हिंद-प्रशांत मौजूदगी एक-दूसरे के लिए उपयोगी हो सकती है.

क्या चीन को सीधा संदेश है?

यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि हिंद-प्रशांत में चीन की नौसैनिक ताकत लगातार बढ़ी है. चीन दक्षिण चीन सागर में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है और हिंद महासागर क्षेत्र में भी उसकी गतिविधियों को भारत और अमेरिका दोनों बारीकी से देखते हैं. लेकिन पपारो के दौरे को सीधे चीन के खिलाफ किसी गठजोड़ की तरह देखना अभी सही नहीं होगा. भारत की नीति यहां थोड़ी अलग है. नई दिल्ली अमेरिका के साथ रणनीतिक और सैन्य सहयोग बढ़ा रहा है, लेकिन वह किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं है. भारत की कोशिश अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखते हुए अलग-अलग देशों के साथ सहयोग बढ़ाने की रही है. फिर भी संदेश जरूर जाता है. अगर भारत और अमेरिका समुद्री निगरानी, तकनीक, सैन्य अभ्यास और सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाते हैं तो हिंद-प्रशांत में किसी भी संभावित चुनौती के सामने दोनों देशों की क्षमता बढ़ती है.

क्या भारत-अमेरिका-जापान का नया गठजोड़ बन रहा है?

भारत, अमेरिका और जापान पहले से ही एक बड़े बहुपक्षीय ढांचे में साथ काम कर रहे हैं. इसमें ऑस्ट्रेलिया भी शामिल है और इसे क्वाड कहा जाता है. क्वाड का एजेंडा सिर्फ सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं है. समुद्री सुरक्षा, महत्वपूर्ण और उभरती तकनीक, आपदा राहत, साइबर सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला और हिंद-प्रशांत में स्थिरता जैसे मुद्दे भी इसके केंद्र में हैं. अमेरिका और भारत के साथ जापान और ऑस्ट्रेलिया इस व्यवस्था के सदस्य हैं. इसलिए पपारो की यात्रा को भारत-अमेरिका-जापान का कोई नया सैन्य गठजोड़ बनाने की शुरुआत कहना अभी जल्दबाजी होगी. ज्यादा सही तस्वीर यह है कि पहले से मौजूद सहयोग के अलग-अलग हिस्सों को ज्यादा मजबूत किया जा रहा है. खास बात यह है कि भारत और अमेरिका के बीच सैन्य तालमेल सिर्फ क्वाड तक सीमित नहीं है. दोनों देशों की सेनाएं नियमित रूप से संयुक्त अभ्यास करती हैं. सितंबर के अंत में युद्ध अभ्यास का 22वां संस्करण भी पूरा हुआ, जिसमें दोनों देशों की सेनाओं ने संयुक्त संचालन और तालमेल का अभ्यास किया.

अमेरिका के लिए भारत इतना महत्वपूर्ण क्यों?

अमेरिका के लिए भारत की अहमियत सिर्फ इसलिए नहीं है कि भारत एक बड़ी सैन्य शक्ति है. भारत की भौगोलिक स्थिति भी इसे खास बनाती है. भारत हिंद महासागर के बीचों बीच स्थित है. फारस की खाड़ी, अरब सागर, अफ्रीका और मलक्का स्ट्रेट की ओर जाने वाले समुद्री रास्ते भारत के आसपास से गुजरते हैं. दुनिया के व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से इन रास्तों की बड़ी भूमिका है. यही कारण है कि अमेरिका भारत को हिंद-प्रशांत में एक महत्वपूर्ण सुरक्षा साझेदार के तौर पर देखता है. अमेरिकी दृष्टिकोण में भारत के साथ सहयोग समुद्री सुरक्षा से आगे बढ़कर तकनीक, रक्षा उत्पादन और सैन्य तालमेल तक पहुंच चुका है.



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