शुरुआती समय में हमारा ब्रह्मांड आज से काफी अलग दिखता था. उस वक्त हमारी आकाशगंगा मिल्की वे का वजूद भी ऐसा नहीं था. आज हम जिस मिल्की वे को देखते हैं, वह हजारों छोटी गैलेक्सी का कलेक्शन हुआ करती थी. इनमें से कुछ गैलेक्सी भारी मात्रा में नए स्टार्स बना रही थीं. वहीं कुछ गैलेक्सी सिर्फ गैस से भरी हुई थीं. कई गैलेक्सी में डेड स्टार्स और ब्लैक होल्स मौजूद थे. समय के साथ ये सभी गैलेक्सी आपस में मिल गईं. इनके मिलने से वह स्पाइरल डिस्क बनी जिसे आज हम मिल्की वे कहते हैं. यह जानकारी एक नए सिमुलेशन में सामने आई है. इसे यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के एस्ट्रोनॉमी और एस्ट्रोफिजिक्स के असिस्टेंट प्रोफेसर हार्ले काट्ज की टीम ने तैयार किया है. इस सिमुलेशन ने ब्रह्मांड के शुरुआती दिनों की एक साफ तस्वीर पेश की है.
सुपरकंप्यूटर पर तीन साल तक चले सिमुलेशन से साइंटिस्ट्स को क्या पता चला?
इस सिमुलेशन प्रोजेक्ट को मेगाट्रॉन (MEGATRON) का नाम दिया गया है. इसे तैयार करने में सुपरकंप्यूटर को भी लगातार तीन साल का समय लगा. यह अब तक का सबसे डिटेल मॉडल माना जा रहा है. इसमें साफ तौर पर दिखाया गया है कि मिल्की वे जैसी गैलेक्सी अपने शुरुआती अरबों सालों में कैसे विकसित हुई होगी.
प्रोफेसर हार्ले काट्ज ने कहा, ‘हम पहली बार यह सीधे बता सकते हैं कि शुरुआती मिल्की वे टेलीस्कोप को कैसी दिखी होगी.’
जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप के नए डेटा ने क्या बताया?
हम ब्रह्मांड की शुरुआत को देखने के लिए समय में पीछे नहीं जा सकते. स्पेस कैसे विकसित हुआ यह समझने का एकमात्र तरीका कंप्यूटर मॉडल बनाना है. प्रोफेसर काट्ज ने बताया कि उन्होंने ग्रेविटी और रेडिएशन जैसी सभी जरूरी फिजिक्स को इस मॉडल में डाला है. शक्तिशाली जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप से आने वाले नए डेटा ने इस समझ को और बेहतर किया है.
साइंटिस्ट्स की एक टीम ने तीन साल पहले इस प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी. उनका मकसद यह जानना था कि हमारी गैलेक्सी अपने पहले एक अरब साल में कैसी दिखती थी. अब वे वेब टेलीस्कोप के मौजूदा डेटा की तुलना अपने मॉडल से कर सकते हैं. इससे यह समझना बहुत आसान हो गया है कि पुराने अनुमानों में क्या सही था और क्या मिसिंग है.
यह तस्वीर दिखाती है कि 12 अरब साल पहले हमारी गैलेक्सी कैसी दिखती होगी. (Image Credit: Harley Katz/MEGATRON Collaboration)
बिना स्टार वाली चमकदार गैलेक्सी के बारे में मेगाट्रॉन सिमुलेशन से क्या जानकारी मिली?
इस नए मॉडल को पीछे ले जाने पर हर तरह की छोटी-बड़ी गैलेक्सी का एक बड़ा जाल नजर आता है. यही जाल अंत में मिलकर मॉडर्न मिल्की वे बन गया. प्रोफेसर काट्ज के मुताबिक इस मॉडल में हजारों सिस्टम को फॉलो किया गया है. इनमें एक अद्भुत विविधता देखने को मिलती है. कुछ गैलेक्सी में स्टार्स तेजी से बन रहे हैं और कुछ मरने की कगार पर हैं.
इस स्टडी में एक अनोखी बात सामने आई है. यह मॉडल ऐसी गैलेक्सी के होने की भविष्यवाणी करता है जिनमें कोई स्टार नहीं है. इसके बावजूद ये गैलेक्सी स्पेस में लगातार चमकती रहती हैं. इनमें से कुछ में ऐसे स्टार्स रहे होंगे जो एक्सप्लोड हो गए या सीधे ब्लैक होल में बदल गए. वहीं कुछ गैलेक्सी ऐसी भी हो सकती हैं जिनमें हमेशा सिर्फ गैस ही मौजूद रही हो.
छोटे सिस्टम में आयरन का लेवल हमेशा एक समान क्यों रहता है?
इस रिसर्च से एस्ट्रोफिजिक्स की एक बहुत पुरानी पहेली भी सुलझ गई है.
- आमतौर पर मिल्की वे में छोटी और धुंधली गैलेक्सी में आयरन कम होता है. लेकिन बेहद धुंधले सिस्टम में यह ट्रेंड अचानक टूट जाता है. वहां आयरन की मात्रा मास या वजन के बावजूद एक समान नजर आती है. अब तक कोई भी सिमुलेशन इस व्यवहार को रीप्रोड्यूस नहीं कर पाया था.
- नए मॉडल के मुताबिक इसका कारण बिग बैंग के ठीक बाद बचे हुए स्टार्स का भयानक विस्फोट है. इन स्टार्स को साइंटिस्ट्स पॉपुलेशन III स्टार्स कहते हैं. ये स्टार्स इतने पुराने हैं कि केवल ब्रह्मांड के पहले एलिमेंट्स हाइड्रोजन और हीलियम से बने हैं.
- जब ये फटते हैं तो दूसरे सुपरनोवा की तुलना में अधिक आयरन पैदा कर सकते हैं. बड़ी गैलेक्सी में इसे रोकने के लिए पर्याप्त ग्रेविटी होती है. छोटी गैलेक्सी से यह आयरन स्पेस में खो जाता है.
पॉपुलेशन III स्टार्स को खोजना क्यों मुश्किल है?
ये पॉपुलेशन III स्टार्स असल में इतने पुराने हैं कि इन्हें कभी किसी टेलीस्कोप से सीधे नहीं देखा जा सका है. मेगाट्रॉन प्रोजेक्ट का एक और पेपर पूरी तरह से इसी पर आधारित है. यह पेपर पहली बार दिखाता है कि मिल्की वे जैसे वातावरण में ये स्टार्स आखिर कैसे बनते हैं. यह नया मॉडल साफ तौर पर भविष्यवाणी करता है कि अगर ये स्टार्स अभी भी मौजूद हैं तो वे कहां हो सकते हैं. इससे एस्ट्रोनॉमर्स को इन प्राचीन स्टार्स की खोज करने में बहुत बड़ी मदद मिल सकती है.
यह रिसर्च ब्रह्मांड के इतिहास और आकाशगंगा के निर्माण को समझने में मील का पत्थर साबित हो सकती है. साइंटिस्ट्स का मानना है कि आने वाले समय में टेलीस्कोप टेक्नोलॉजी और बेहतर होगी. तब इन पुरानी गैलेक्सी को खोजना और उनका एनालिसिस करना ज्यादा आसान हो जाएगा.