देहरादून: उत्तराखंड के समृद्ध और घने वन क्षेत्र पर इन दिनों एक बेहद सूक्ष्म लेकिन विनाशकारी कीट का भीषण साया मंडरा रहा है. इस कीट के घातक जैविक संक्रमण के कारण राज्य में लगभग बीस हजार बेशकीमती पेड़ों को काटने की नौबत आ गई है. यह कीट पेड़ों को भीतर से सुखाकर पूरी तरह खोखला कर रहा है. पर्यावरण और वन संपदा के इस गंभीर संकट से निपटने के लिए वन विभाग ने पूरी ताकत झोंक दी है. विभाग ने भारी संख्या में वन कर्मियों को जंगलों में तैनात किया है, जो कीटों को चुन-चुनकर नष्ट करने के काम में लगे हैं. मैदानी स्तर पर चल रहे इस व्यापक अभियान के तहत वन कर्मी अब तक करीब चार लाख कीड़ों को पकड़ने में सफल हो चुके हैं.
साल के बेशकीमती वनों पर मंडरा रहा जैविक संकट
उत्तराखंड के कुल भूभाग के लगभग 71 फीसदी क्षेत्र में वन क्षेत्र फैला हुआ है. इस विस्तृत हरित आवरण में से लगभग 12 फीसदी हिस्से में साल (शोरिया रोबस्टा) के घने जंगल मौजूद हैं. साल की लकड़ी अपनी अद्वितीय मजबूती, गुणवत्ता और टिकाऊपन के कारण सबसे कीमती इमारती लकड़ियों में शुमार की जाती है. उत्तराखंड के इन्हीं ऐतिहासिक और कीमती साल के वनों पर मौजूदा समय में अस्तित्व का संकट आ खड़ा हुआ है. इस जैविक तबाही की मुख्य वजह ‘होप्लो’ नाम का एक खतरनाक कीड़ा है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में साल बोरर (Hoplocerambyx spinicornis) कहा जाता है. वर्तमान में देहरादून और कालसी वन प्रभाग के साल जंगलों में इस कीट ने भीषण हमला किया है.
भीतर से तने को पाउडर बना देता है साल बोरर
देहरादून और कालसी के जंगलों में फैला होप्लो का संक्रमण वन महकमे के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन चुका है. यह कीड़ा साल के हरे-भरे पेड़ों के तने के भीतर घुसकर लकड़ी को अंदर ही अंदर चबा जाता है और उसे बारीक पाउडर में तब्दील कर देता है. बाहर से सामान्य दिखने वाला मजबूत पेड़ भीतर से पूरी तरह बेजान हो जाता है. अब तक करीब बीस हजार से अधिक पेड़ इस जानलेवा कीट की जद में आ चुके हैं. वन विभाग के अधिकारियों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि समय रहते इस कीट के फैलाव पर सख्त नियंत्रण नहीं पाया गया, तो यह संक्रमण अनियंत्रित होकर समूचे राज्य के साल वनों को अपूरणीय क्षति पहुंचा सकता है. संक्रमण को रोकने के लिए वन विभाग तेजी से प्रभावित पेड़ों की वैज्ञानिक पहचान कर रहा है और अत्यधिक संक्रमित पेड़ों को हटाने के साथ-साथ ‘ट्रैप ट्री ऑपरेशन’ चला रहा है.
क्या है ‘ट्रैप ट्री ऑपरेशन’ और कैसे पकड़े जाते हैं कीट?
संक्रमण के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए वन विभाग पारंपरिक और प्रभावी वैज्ञानिक पद्धति का सहारा ले रहा है. देहरादून वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी वैभव सिंह के अनुसार, इस अभियान के तहत होप्लो से संक्रमित 30 से 40 सेंटीमीटर व्यास (डाया) वाले पेड़ों का चयन कर उन्हें काटा जाता है. इसके पश्चात पेड़ की छाल (बार्क) को हथौड़े से अच्छी तरह पीटा जाता है. इस दबाव प्रक्रिया के दौरान पेड़ के तने से एक विशेष प्राकृतिक गाढ़ा तरल पदार्थ निकलता है, जिसे रेजिन कहते हैं.
होप्लो कीट रेजिन की गंध से आकर्षित होकर उसे खाने के लिए तने से बाहर निकलता है. जैसे ही यह कीड़ा रेजिन का सेवन करता है, वह कुछ समय के लिए सुस्त और पूरी तरह निष्क्रिय हो जाता है. कीड़े के अचेत होते ही तैनात वन कर्मी उसे तुरंत पकड़कर नष्ट कर देते हैं. इस प्रक्रिया से कीटों के प्रजनन और संक्रमण के नए फैलाव पर सीधा अंकुश लगता है.
चार लाख बीटल पकड़े गए, ढाई हजार पेड़ काटे
डीएफओ वैभव सिंह ने जानकारी दी कि वन विभाग अब तक लगभग चार लाख होप्लो बीटल को पकड़ने में सफलता हासिल कर चुका है. कीटों के बढ़ते फैलाव को थामने के लिए अब तक ढाई हजार से अधिक गंभीर रूप से संक्रमित साल के पेड़ काटे जा चुके हैं. डीएफओ के मुताबिक, यदि इन गंभीर संक्रमित पेड़ों को तत्काल नहीं काटा जाता, तो पूरे वन क्षेत्र में होप्लो संक्रमण के तीव्र गति से फैलने का जानलेवा जोखिम निरंतर बना रहता.
विशेषज्ञों की विशेष टास्क फोर्स गठित
अभियान को वैज्ञानिक और प्रभावी दिशा देने के लिए सरकार ने एक उच्च स्तरीय विशेष टास्क फोर्स का गठन किया है. इस संयुक्त कार्यबल में वन विभाग, उत्तराखंड वन विकास निगम और वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून के अनुभवी कीट वैज्ञानिकों एवं वन विशेषज्ञों को शामिल किया गया है. यह विशेष टास्क फोर्स प्रतिदिन प्रभावित वन क्षेत्रों में सघन गश्त कर रही है, डेटा संकलित कर रही है और कीट नियंत्रण के आधुनिक उपायों को धरातल पर क्रियान्वित कर रही है.
एक सदी पुराना है होप्लो और वन विभाग का संघर्ष
वन विभाग के ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, साल बोरर का यह प्रकोप कोई नया संकट नहीं है, बल्कि विभाग और इस कीट के बीच का संघर्ष दशकों पुराना है. देहरादून की वर्ष 1934-35 की स्वीकृत वन कार्ययोजनाओं में भी होप्लो के संक्रमण और उससे होने वाले नुकसान का स्पष्ट ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है. पुराने सरकारी रिकॉर्ड दर्शाते हैं कि देहरादून में वर्ष 1916 से 1924 तक, तिमली क्षेत्र में 1958 से 1960 तक तथा थानो वन क्षेत्र में 1964-65 के दौरान इस कीट का अत्यंत विनाशकारी और व्यापक प्रकोप दर्ज किया गया था.
उत्तराखंड में कहां-कहां फैले हैं साल के वन?
उत्तराखंड राज्य में साल के जंगलों का विस्तार मुख्य रूप से निम्न क्षेत्रों में पाया जाता है. देहरादून, कालसी, हल्द्वानी, रामनगर और हरिद्वार वन प्रभाग. तराई केंद्रीय, तराई पूर्वी और तराई पश्चिमी वन प्रभाग. साथ ही, पौड़ी गढ़वाल का रथुवाढाब क्षेत्र, विश्वप्रसिद्ध कॉर्बेट नेशनल पार्क, राजाजी टाइगर रिजर्व, सीताबानी तथा पावलगढ़ संरक्षण रिजर्व क्षेत्र.