Women Safety: महिला सुरक्षा के लिए छात्राओं ने PMO को भेजा प्रस्ताव, 10 दिन का अल्टीमेटम

Women Safety: महिला सुरक्षा के लिए छात्राओं ने PMO को भेजा प्रस्ताव, 10 दिन का अल्टीमेटम


Women Safety:दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा और बढ़ती यौन हिंसा के खिलाफ छात्राओं का आंदोलन अब एक नए रूप में आगे बढ़ रहा है. सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करने के बाद अब छात्राएं सीधे सरकार तक अपनी मांगें पहुंचाने की तैयारी में हैं. इसी सिलसिले में गुरुवार शाम दिल्ली के YMCA हॉस्टल में महिला सुरक्षा और कानूनों में बदलाव को लेकर एक विशेष बैठक आयोजित की गई. इसमें दिल्ली विश्वविद्यालय समेत राजधानी के अलग-अलग शिक्षण संस्थानों की छात्राओं ने हिस्सा लिया. बैठक का आयोजन रेप के खिलाफ काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता और PARI (People Against Rape in India) की संस्थापक योगिता भयाना तथा पूर्व IPS अधिकारी यशोवर्धन आजाद ने किया.

इस दौरान करीब 100 छात्राओं ने कानूनी विशेषज्ञों के साथ मिलकर महिला सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एक प्रस्ताव तैयार करने पर चर्चा की.इस प्रस्ताव में तीन से पांच प्रमुख मांगें शामिल होंगी जिन्हें हस्ताक्षरित याचिका के रूप में सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को सौंपा जाएगा. आयोजकों ने साफ कहा है कि अगर 10 दिनों के भीतर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो दिल्ली के जंतर-मंतर पर देशव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू किया जाएगा.

महिला सुरक्षा पर केवल चर्चा नहीं, ठोस कानून बनाने की मांग

बैठक में छात्राओं को संबोधित करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता योगिता भयाना ने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा केवल बातचीत और आश्वासन तक सीमित नहीं रहना चाहिए. इसके लिए कानून और व्यवस्था में वास्तविक बदलाव करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि महिला सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सालों से चर्चा होती आ रही है, लेकिन इसके बावजूद हालात में पर्याप्त सुधार नहीं हुआ है. इसलिए अब केवल बैठकों और बहस से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने होंगे.

Women Safety Protest in Delhi: महिला सुरक्षा के लिए करेंगे प्रोटेस्‍ट.

योगिता भयाना ने तत्काल एक विशेष दो दिवसीय संसदीय सत्र बुलाने की मांग रखी. उन्होंने इसके लिए नवरात्रि का समय सुझाया और कहा कि इस चर्चा में सभी राजनीतिक दलों को शामिल होने का मौका मिलना चाहिए. उनका कहना था कि महिला सुरक्षा किसी एक राजनीतिक दल या संगठन का मुद्दा नहीं है. इसे सभी को मिलकर एक बड़े आंदोलन का रूप देना चाहिए.

उन्होंने छात्राओं से कहा कि इस पहल का मकसद किसी तरह का ड्रामा करना या लोगों का ध्यान भटकाना नहीं है. महिला सुरक्षा जैसे गंभीर विषय पर अब तक बहुत बातें हो चुकी हैं, लेकिन जरूरत ऐसे फैसलों की है जिनका असर जमीन पर दिखाई दे. उन्होंने इस अभियान को ऑपरेशन सिंदूर से भी ज्यादा मजबूत और आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाने की बात कही. साथ ही छात्राओं से अपने सुझाव और मांगें लिखकर देने को कहा, ताकि आम नागरिकों और सरकार के बीच एक प्रभावी संवाद का माध्यम तैयार किया जा सके.

राज्यों से महिला सुरक्षा के बजट का हिसाब मांगें छात्राएं

बैठक में पूर्व IPS अधिकारी यशोवर्धन आजाद ने छात्राओं से महिला सुरक्षा के मामले में राज्य सरकारों को जवाबदेह बनाने की अपील की. उन्होंने कहा कि सरकारों पर दबाव बनाने के लिए छात्राओं को अपने नागरिक अधिकारों का इस्तेमाल करना चाहिए. इसके तहत उन राज्यों के खिलाफ सूचना के अधिकार यानी RTI के तहत आवेदन दाखिल करने की जरूरत है, जिन्होंने महिलाओं की सुरक्षा के लिए निर्धारित बजट में कटौती की है.

आजाद ने कहा कि महिलाओं को भी देश के किसी दूसरे नागरिक की तरह सार्वजनिक स्थानों पर बिना किसी डर के आने-जाने का अधिकार है. वे बुद्धा पार्क या लोधी गार्डन जैसे सार्वजनिक स्थानों पर बेखौफ जा सकें, यह सुनिश्चित करना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है.

उन्होंने बिहार में महिलाओं के खिलाफ लगातार सामने आ रही घटनाओं पर भी चिंता जताई. बिहार उनका गृह राज्य है. उन्होंने कहा कि महिला सुरक्षा को लेकर देश के कई राज्यों में बजट और उसके इस्तेमाल से जुड़ी गंभीर समस्याएं हैं. केवल योजनाओं की घोषणा कर देने से महिलाओं को सुरक्षा नहीं मिल सकती, बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि उन योजनाओं के लिए जारी पैसा सही जगह खर्च हुआ या नहीं.

निर्भया फंड पर उठाया सवाल

यशोवर्धन आजाद ने महिला सुरक्षा के लिए बजट आवंटन और उसके वास्तविक इस्तेमाल पर सवाल उठाए. उन्होंने बताया कि निर्भया आंदोलन के तहत करीब 8,000 करोड़ रुपये की घोषणा की गई थी, लेकिन इसमें से लगभग 6,000 करोड़ रुपये ही जारी किए गए. उन्होंने सवाल किया कि बाकी रकम कहां गई और महिला सुरक्षा के लिए घोषित धन का पूरा इस्तेमाल क्यों नहीं हुआ.

उन्होंने आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में महिला सुरक्षा के बजट में कटौती किए जाने पर भी सवाल उठाया. उनका कहना था कि अगर महिलाओं को अपने ही शहरों और सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षित महसूस नहीं होता तो लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ अधूरा रह जाता है.

आजाद ने महिला सुरक्षा से जुड़े सभी उपायों का 90 दिनों के भीतर ऑडिट कराने का प्रस्ताव भी रखा. इसके लिए उन्होंने दो दिवसीय विशेष संसदीय सत्र का खाका सुझाया. उनके मुताबिक, पहले दिन महिला सुरक्षा के लिए अब तक उठाए गए कदमों और योजनाओं की समीक्षा होनी चाहिए. इसमें यह देखा जाए कि सरकारों ने क्या काम किया, कितना बजट खर्च हुआ और उसका कितना फायदा महिलाओं को मिला. वहीं, दूसरे दिन ऐसे ठोस और सुधारात्मक उपाय तय किए जाने चाहिए, जिनसे महिलाओं के खिलाफ अपराध करने वालों को दोबारा ऐसा करने से रोका जा सके.

महिला सुरक्षा और कानून में बदलाव की मांगें

बैठक के दौरान छात्राओं ने महिला सुरक्षा को लेकर कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए. उनकी मांगों का मुख्य जोर जवाबदेही तय करने, कानून में जरूरी बदलाव करने और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर रहा.

छात्राओं ने सबसे पहले मीडिया और सरकारी आंकड़ों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों को दिखाने के तरीके में बदलाव की मांग की. उनका कहना था कि खबरों और आंकड़ों में महिलाओं को उस हिंसा के आधार पर पहचानने के बजाय अपराध करने वाले पुरुषों की जिम्मेदारी पर ध्यान दिया जाना चाहिए. उदाहरण के तौर पर रेप की घटना के बाद पीड़िता की पहचान या उसके साथ हुई हिंसा को केंद्र में रखने के बजाय अपराध करने वाले व्यक्ति को प्रमुखता से सामने लाया जाना चाहिए. इससे अपराधियों की जवाबदेही तय करने पर जोर दिया जा सकेगा.

दूसरी प्रमुख मांग सार्वजनिक स्थानों पर महिला पुलिसकर्मियों की संख्या बढ़ाने की थी. छात्राओं का कहना था कि सड़कों, पार्कों और दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर अधिक महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती होनी चाहिए. इससे महिलाओं को सुरक्षा का भरोसा मिलेगा. साथ ही पुलिस व्यवस्था में महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे.

BNS में बदलाव करने की मांग

छात्राओं ने भारतीय न्याय संहिता यानी BNS में भी बदलाव करने की मांग उठाई. उनका कहना था कि महिलाओं के कॉलेजों के आसपास और दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर कई तरह की अश्लील हरकतें देखने को मिलती हैं. इनमें सार्वजनिक रूप से किसी के सामने अश्लील तरीके से अपने शरीर का प्रदर्शन करना और हस्तमैथुन जैसी हरकतें शामिल हैं.

छात्राओं की मांग थी कि ऐसी घटनाओं को कानून में स्पष्ट रूप से यौन उत्पीड़न के अपराध के रूप में शामिल किया जाए. उनका मानना है कि कानून में इन गतिविधियों की साफ परिभाषा और उनके खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए, ताकि ऐसी हरकतों को रोकने में मदद मिल सके.

इसके अलावा छात्राओं ने पहले से मौजूद महिला सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावी तरीके से लागू करने पर भी जोर दिया. उन्होंने मेट्रो स्टेशनों पर पुलिस की सक्रिय निगरानी सुनिश्चित करने की मांग की. खासतौर पर महिलाओं के लिए आरक्षित मेट्रो कोच में अनधिकृत तरीके से प्रवेश करने वालों को रोकने के लिए नियमित पुलिस निगरानी की जरूरत बताई.



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